Cgnews: सिंघिया पंचायत में विकास कार्यों का ‘भूत’! करोड़ों की योजनाएं सिर्फ कागजों में, ज़मीनी हकीकत शून्य

 

कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा (गंगा प्रकाश)। जनपद पंचायत पोड़ी उपरोड़ा अंतर्गत ग्राम पंचायत सिंघिया में बीते कुछ वर्षों में योजनाओं की घोषणाएं तो बहुत हुईं, लेकिन हकीकत में अधिकांश कार्य कभी धरातल पर उतरे ही नहीं। तत्कालीन सरपंच सहोद्रा पैकरा के कार्यकाल में विकास कार्यों में गड़बड़ियों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि ग्रामीण अब खुलेआम “राशि गबन” का आरोप लगा रहे हैं। इन आरोपों की गंभीरता तब और बढ़ जाती है, जब सामने आता है कि शिकायतों के बावजूद अब तक कोई प्रभावी जांच या कार्रवाई नहीं हुई है।

फर्जीवाड़ा कैसे हुआ उजागर?

ग्राम पंचायत सिंघिया में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। एक अपात्र व्यक्ति को पात्र घोषित कर दिया गया और 1.20 लाख रुपए की पूरी राशि फर्जी जियोटैगिंग के माध्यम से निकाल ली गई। जब मामला मीडिया में आया, तो रोजगार सहायक ने हड़बड़ी में निर्माण कार्य शुरू करवाया, ताकि लीपापोती की जा सके। इस एक मामले ने पंचायत में चल रहे अन्य कार्यों पर भी सवाल खड़े कर दिए।

राशि निकाली गई, लेकिन कार्य नहीं हुए

तत्कालीन सरपंच सहोद्रा पैकरा ने सचिव की मिलीभगत से पंचायत के विभिन्न मदों से लाखों रुपए की राशि आहरित की, लेकिन वह कार्य आज तक जमीन पर दिखाई नहीं देते। जांच में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं:

देवगुड़ी निर्माण (वर्ष 2023-24):

DMF मद से स्वीकृत ₹3 लाख में से ₹1.20 लाख निकाले गए – कार्य नहीं हुआ।

पचरी निर्माण (वर्ष 2024-25):

15वें वित्त आयोग से स्वीकृत ₹1.92 लाख में से ₹76,000 निकाले गए – स्थल पर कोई निर्माण नहीं।

अतिरिक्त कक्षा निर्माण (प्राथमिक शाला):

समग्र शिक्षा अभियान से स्वीकृत ₹8 लाख में से ₹2.16 लाख निकाले गए – कार्य अदृश्य।

स्वामी आत्मानंद विद्यालय में भी विभिन्न कार्यों के लिए लाखों की राशि आहरित हुई – कार्यस्थल पर कुछ नहीं।

आंगनबाड़ी भवन (वर्ष 2017-18):

स्वीकृति मिलने के बावजूद अब तक निर्माण शुरू नहीं।

वर्तमान सरपंच और पंचों में नाराजगी

जब वर्तमान सरपंच मनोज टेकाम ने कार्यभार संभाला, तो उन्होंने इन सभी तथ्यों की जानकारी हासिल की। जैसे-जैसे फाइलें खंगाली गईं, वैसे-वैसे गड़बड़ियों की परतें खुलती गईं। सरपंच सहित पंचायत के अन्य पंचों में भारी नाराजगी है। वे पूछ रहे हैं कि जब कार्य नहीं हुए, तो फिर राशि किसके खाते में और किसके आदेश से चली गई?

ग्रामीणों में भी आक्रोश

गांव के लोगों का कहना है कि बिना ग्राम सभा की स्वीकृति के योजनाएं स्वीकृत की गईं, और राशि सीधे निकाली जाती रही। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीण आज इस बात से निराश हैं कि फाइलों में करोड़ों के विकास कार्य तो दर्ज हैं, लेकिन गांव में उसकी छाया तक नहीं दिखाई देती।

मनरेगा में भी गड़बड़ी के संकेत

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में मनरेगा के तहत स्वीकृत लाखों रुपए के एक निर्माण कार्य में भी बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। इसकी विस्तृत जानकारी अगली रिपोर्ट में दी जाएगी।

अब सवाल यह है: जिम्मेदार कौन और कार्रवाई कब?

यह केवल भ्रष्टाचार की कहानी नहीं है – यह गांव के हक, भरोसे और विकास के साथ खिलवाड़ की कहानी है। पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करने वाली सरकारों के लिए यह मामला चुनौतीपूर्ण उदाहरण बन गया है। यदि अब भी निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह भविष्य में और अधिक ग्रामीण क्षेत्रों को भ्रष्टाचार की गर्त में धकेल सकता है।

ग्रामवासियों की मांग है कि:

  • तत्काल प्रभाव से उच्च स्तरीय जांच हो।
  • राशि गबन के दोषियों पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।
  • निर्माण कार्यों की सोशल ऑडिट हो और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

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