फिंगेश्वर(गंगा प्रकाश)। पितृ पक्ष की शुरूवात हो गई है। अंचल के घर-घर में पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध तर्पण एवं आवभगत किया जा रहा है। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष का समय पितरों को समर्पित माना गया है। नदी तथा तालाबों में अर्ध्य देने के लिए लोगों की अच्छी खासी भीड़ देखने मिल रही है। पुण्य से लेकर पितरों के तिथियों के आधार पर ब्राहमणां को भोजन खिलाया जा रहा है। हिन्दू पंचाग के अनुसार भाद्रपक्ष के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष प्रारंभ होता है और अश्विन मास के कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को समापन होता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म से पितृ प्रसन्न होते है और अपने परिवार के लोगों को सुखद व समृद्धि का आर्शीवाद देते है। धार्मिक ग्रंथो में भी मनुष्य के लिए पूर्वजों की पूजा करने का विधान बताया गया है। पितरों का ऋण श्राद्ध के माध्यम से ही चुकाया जा सकता है। पितृ पक्ष के चलते जहां पितरों को प्रसन्न करने के लिए नदी तथा सरोवरों में श्राद्ध तर्पण किया जा रहा है तो वहीं पकवान तैयार कर गाय और कौओं को भी खिलाने जाने लगा है। आगामी 14 अक्टूबर तक पितृ पक्ष होने के चलते शुभ कार्यो पर भी पूरी तरह से विराम लगा हुआ है। पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध तर्पण के साथ साथ दान-पुण्य का कार्य भी किया जा रहा है। वहीं नई चीजों की खरीदारी नहीं करने के मान्यता के चलते बाजार मंदा पड़ा है। वहीं पितृपक्ष में ज्यादातर अपने पूर्वजों के आने के दिन लोग पिंडदान करते है तो टोकरी में खाने-पीने की वस्तुओं के अलावा कपड़ा और बर्तन आदि भी देते है। दान पुण्य के बर्तनों के अलावा उपयोग में आने वाली बर्तनों की डिमांड भी लोग करते है। ग्रामीण अंचल के लोग पीतल और कांसे के बर्तनों पर आज भी भरोसा करते है। पितृपक्ष में कौओं का महत्व भी बढ़ गया है। श्रद्धालु अपने पितरों का मनपसंद भोजन कौओ को खिलाने कौओं को ढुढ़ते देखे जा रहे है। मान्यता है कि कौआ खाले तो पीतर संतुष्ट हो जाते है।
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