गरियाबंद/छुरा/राजिम (गंगा प्रकाश)। आमतौर पर लोग सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाते हैं, आवेदन करते हैं, सिफारिश ढूंढते हैं। लेकिन गरियाबंद में मामला उल्टा हो गया है—यहां लोगों के खाते में बिना मांगे ही स्वेच्छा अनुदान पहुंच गया… और चौंकाने वाली बात ये कि कई लोगों ने इसे लेने से ही इंकार कर दिया !

हमने मांगा ही नहीं, फिर क्यों दिया?

जिले में जारी सूची ने कई लोगों को हैरान कर दिया। जिन लोगों ने कभी आवेदन नहीं किया, उनके नाम पर अनुदान राशि स्वीकृत हो गई। जब उन्हें जानकारी दी गई, तो पहला सवाल यही था— हमने मांगा ही नहीं, फिर ये पैसा हमारे नाम पर क्यों?

राजिम, गरियाबंद और छुरा के पार्षद से लेकर नगर के प्रतिष्ठित वकील तक—कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने साफ कहा कि उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं थी।

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सम्मान की जगह अपमान का एहसास

इस पूरे घटनाक्रम ने एक नया मोड़ तब लिया, जब कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने इस राशि को लेने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि वे पार्टी में सेवा भाव से काम करते हैं, किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं। एक कार्यकर्ता ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा— हमारे काम की कीमत 5 हजार रुपये लगा दी गई? यह मदद नहीं, अपमान है।

फोन कर-करके बताने लगे—मेरा भी नाम आया है !

वहीं दूसरी तरफ, कुछ ऐसे लोग भी सामने आए जो बिना आवेदन के मिली राशि से इतने उत्साहित हो गए कि अपना नाम सूची में देखकर परिचितों को फोन लगाकर पूछने लगे—अरे, ये पैसा कैसे मिलेगा? यानी एक ही योजना में खुशी, हैरानी और नाराजगी—तीनों रंग साफ दिखे।

सांसद पुत्र तक पहुंचे बिन मांगे अनुदान

मामले ने तब और तूल पकड़ा, जब एक पूर्व सांसद चंदू लाल साहु के पुत्र (शैलेन्द्र साहु मंडल कोषाध्यक्ष) के नाम पर भी राशि जारी होने की बात सामने आई। उन्होंने साफ कहा—मैंने कोई आवेदन नहीं किया। यह कैसे हुआ, मुझे नहीं पता। अगर मिला है तो किसी जरूरतमंद को दिया जाए।

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एक ही परिवार में डबल फायदा?

सूची की पड़ताल में यह भी सामने आया कि कुछ जगहों पर एक ही परिवार के दो-दो लोगों को अनुदान दिया गया है। इतना ही नहीं, नगर पालिका और नगर पंचायत के पार्षद—जो पहले से मानदेय पा रहे हैं—वे भी इस सूची में शामिल हैं।

योजना या चयन का खेल?

मुख्यमंत्री स्वेच्छा अनुदान का उद्देश्य आमतौर पर जरूरतमंदों की मदद करना होता है। लेकिन गरियाबंद/राजिम/छुरा तहसील क्षेत्रों में जो तस्वीर सामने आई है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—

  • बिना आवेदन नाम कैसे जुड़ गए?
  • पात्रता की जांच हुई या नहीं?
  • क्या सिर्फ कार्यकर्ता होना ही मापदंड बन गया?

राजनीतिक सुगबुगाहट तेज

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि राजिम विधानसभा क्षेत्र के कुछ खास लोगों को प्राथमिकता दी गई। यदि ऐसा है, तो यह योजना की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल बन सकता है।

अब जवाब किसके पास?

एक तरफ लोग बिना मांगे मिले पैसे को ठुकरा रहे हैं, दूसरी तरफ असली जरूरतमंद शायद अब भी इंतजार में हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या यह योजना जरूरतमंदों के लिए थी या नामों की सूची भरने के लिए?

फिलहाल, गरियाबंद में स्वेच्छा अनुदान अब मदद से ज्यादा एक बहस और सवाल का विषय बन चुका है।


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