छुरा में आदिवासी ज़मीन घोटाले की गूंज — गंगा प्रकाश की पत्रकारिता ने किया कमाल, प्रशासन हरकत में

छुरा/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र छुरा के ग्राम हीराबतर में हुए ज़मीन घोटाले का खुलासा जैसे ही पत्रकार गंगा प्रकाश की रिपोर्ट के ज़रिए हुआ, पूरे जिले में प्रशासनिक हलचल मच गई।

यह वही मामला है जिसमें एक आदिवासी नागरिक गणेशी पिता विसराम की ज़मीन की दो बार रजिस्ट्री कर दी गई — वह भी OBC वर्ग के दो अलग-अलग लोगों के नाम!

पत्रकारिता की जीत — प्रशासन को लेना पड़ा संज्ञान

गंगा प्रकाश द्वारा प्रकाशित इस खबर ने वह कर दिखाया, जो सालों से दबे फाइलों में पड़ा था।

खबर के सामने आते ही:

  • एसडीएम छुरा ने जांच समिति गठित कर दी।
  • जिला प्रशासन ने विवादित जमीन की म्यूटेशन प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगा दी।
  • पटवारी, तहसीलदार और रजिस्ट्री ऑफिस से प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी गई है।
  • मामले की जानकारी सीधे जिला कलेक्टर तक भेजी गई है।

यह स्पष्ट है कि जब पत्रकारिता ईमानदारी से ज़मीन की सच्चाई सामने लाती है, तो सिस्टम को जवाब देना ही पड़ता है।

ग्राम में गूंजा एक ही स्वर — “धन्यवाद गंगा प्रकाश”

ग्राम हीराबतर और आस-पास के गाँवों में गंगा प्रकाश की रिपोर्ट को लेकर आदिवासी समाज ने सार्वजनिक रूप से धन्यवाद ज्ञापित किया।

ग्रामीण लोगों ने कहा:

“यदि यह खबर नहीं छपती, तो हमारी ज़मीन चुपचाप छीन ली जाती। मीडिया ने हमारे दर्द को शब्द दिए हैं।”

एसडीएम का बयान: “मामला संज्ञान में है, कार्यवाही तय है”

एसडीएम छुरा नेहा भेड़िया ने कहा:

“मीडिया के माध्यम से मामला सामने आया है, हमने तुरंत कार्रवाई शुरू की है। भूमि की म्यूटेशन प्रक्रिया रोक दी गई है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है।”

पत्रकार गंगा प्रकाश का यह प्रयास बना उदाहरण

यह घटना केवल एक घोटाले का पर्दाफाश नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता का उदाहरण है जो जनता की ज़मीन, अस्मिता और अधिकारों की प्रहरी बनकर खड़ी होती है।

गंगा प्रकाश ने ना सिर्फ ज़मीनी दस्तावेजों की पड़ताल की, बल्कि संवैधानिक प्रावधान, पेसा कानून और राजस्व संहिता का गहन विश्लेषण कर प्रशासन की नींव को हिला दिया।

आगे क्या?

  1. जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट 7 दिन में तैयार होनी है।
  2. पीड़ित आदिवासी को वापस ज़मीन दिलाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
  3. यदि प्रशासन की कार्यवाही संतोषजनक नहीं रही, तो मामला हाईकोर्ट या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक ले जाया जाएगा।

निष्कर्ष: पत्रकारिता जब ज़मीन से जुड़ती है, तो बदलाव आता है

छुरा के इस मामले ने साबित कर दिया है कि निष्पक्ष और जनपक्षधर पत्रकारिता आज भी बदलाव की सबसे मजबूत ताक़त है।

गंगा प्रकाश की यह रिपोर्ट एक चेतावनी है उन तंत्रों के लिए जो आदिवासियों की ज़मीनें कागज़ों में लूटते रहे हैं — अब चुप नहीं बैठा जाएगा।

“खबर सिर्फ खबर नहीं थी, वह एक अलार्म थी — जिसे अब प्रशासन ने सुन लिया है।”


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