आज फिर किसी ने
दर्द का पत्थर फेका
आह निकली मगर
हिया पे दबते देखा
आज फिर………
लोग समझते है क्या
दिल खिलौंना हैं
उनकी बचकानी हरकतों में
मेरी सोच लगे बौना हैं
कुछ नहीं कह पाते
कुछ मर्यादित रेखा हैं..
आज फिर ……..
कुछ देकर चैन लूटने वालें
अहसास हमेशा रहता है
है घुंटन भरी ये हवाएं
हर पल सांस घुटता है
जैसे माटी की गुड़ियाँ
दूर कहीं जा फेका हैं…….
आज फिर…….
साथी ये मुस्कुराहट तेरी
अहसान सदा माना है
चमक रही है चाँदनी अब तो
तुझको सखा सा जाना है
कुछ सिखाने के लिए
तूँ लगे जैसे शेरखाँ हैं……..
आज फिर किसी ने……….
स्वरचित पूनम दुबे “वीणा”
अम्बिकापुर छत्तीसगढ़
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