बकरों के अलावा मुर्गे, मोंगरी मछली, अंडे तथा देशी शराब का भी होता है उपयोग

जगदलपुर (गंगा प्रकाश)। रियासत कालीन ऐतिहासिक 75 दिवसीय बस्तर दशहरा के लंबे आयोजन में 80 से अधिक पूजा विधान संपन्न किए जाते हैं, वहीं इस पूजा विधान के दौरान 75 से अधिक बकरों की बलि भी दी जाती है। पर्व में 75 बकरों के अतिरिक्त भी अलग से 8-10 बकरों की व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है। बकरों के अलावा बस्तर दशहरा पर्व आयोजन के दौरान कोई 03 हजार नारियल, 05 हजार लीटर देशी शराब तथा 400 क्विंटल चावल का उपयोग औसतन प्रतिवर्ष खपत होता है।

बकरों के अलावा मुर्गे, मोंगरी मछली, अंडे तथा देशी शराब का भी उपयोग परपंरा अनुसार नियत अवसरों पर इस दौरान होता है। इस अवधि में दर्जन भर से अधिक पूजा विधानों में अलग-अलग निर्धारित संख्या में बकरों की बलि दी जाती है। दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी प्रेमलाल पाढ़ी ने बताया कि सर्वाधिक संख्या में 11 बकरों की बलि आश्विन शुक्ल पक्ष अष्टमी की मध्य रात्रि को निशा जात्रा पूजा विधान के मौके पर दी जाती है।

रियासत कालीन 75 दिवसीय बस्तर दशहरा को दुनिया की सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाले पर्व के रूप में जाना जाता है, जो सावन महीने की अमावस्या अर्थात हरियाली अमावस्या के दिन प्रारंभ होता है और आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन इस पर्व का समापन होता है, इसके तिथि के पश्चात भी आमंत्रित देवी-देवताओं की विदाई का आयोजन आदि संपन्न होते हैं। यहां यह उल्लेख करना सामयिक होगा कि बस्तर में दशहरा पर्व देश के अन्य हिस्सों में मनाये जाने वाले रावण वध की परंपरा से हटकर दंतेश्वरी देवी के शक्ति स्वरूप की आराधना एवं अर्चना के रूप में बनाया जाता है। इस पर्व के सबसे पहले दिन अर्थात हरियाली अमावस्या को लकड़ियों के लट्ठे जगदलपुर शहर स्थित देवी दंतेश्वरी के मंदिर के सिंहद्वार के सामने नियत स्थान तक लाये जाते हैं, जिनका उपयोग रथ निर्माण में किया जाता है। पाटजात्रा पूजा विधान के साथ ही बस्तर दशहरा शुरू होता है और देवी की दंतेवाड़ा विदाई के साथ ही बस्तर दशहरा का पर्व समाप्त होता है।


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