अरविन्द तिवारी
जगन्नाथपुरी (गंगा प्रकाश) – ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर एवं हिन्दू राष्ट्र के प्रणेता अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज यन्त्र, तन्त्र तथा मन्त्र की महत्ता की चर्चा करते हुये संकेत करते हैं कि अन्न मयात्मक स्थूल शरीर प्राणमय, मनोमय, विज्ञान मयात्मक सूक्ष्म शरीर का अभिव्यञ्जक संस्थान है। तद्वत् सूक्ष्म शरीर आनन्द मयात्मक कारण शरीर का और कारण शरीर जीव का एवम् जीव शिव का अभिव्यञ्जक संस्थान है। जीव सविकार तथा शिव निर्विकार है। जागरादि अवस्थाओं के प्रवर्तक कोश जीव के विकार हैं। जिस प्रकार रसतन्मात्र में रस नामक गुण में तथा जल नामक द्रव्य में नाम मात्र भेद है ; उसी प्रकार मौलिक धरातल पर शक्ति तथा शक्तिमान् शिव में नाममात्र भेद है। इस दृष्टि से शक्तिधाम सहस्रार का सर्वोत्कृष्ट महत्त्व है। शक्तिमार्ग रूप मूलाधार, स्वाधिष्ठान और शक्तिद्वार मणिपूरक में देवी की आराधना करने वाले अभिमत भोगों को प्राप्त करते हैं। शक्तिनगर अनाहत में देवी का भजन करने वाले सालोक्य सुख प्राप्त करते हैं। शक्ति भवन विशुद्ध में भगवती का ध्यान करने वाले शक्ति सामीप्य सम्भव ऋद्धि – सिद्धियों को सुलभ करते हैं। शक्ति समकक्ष आज्ञा चक्र में अम्बा के समर्चक सार्ष्टि मोक्ष ( विपुल ऐश्वर्य, तुल्य भोग) प्राप्त करते हैं। शक्तिकक्ष सहस्रार में परा चिति का समर्चक क्रमशः स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण संज्ञक उपाधि भूमि में सायुज्य – लाभकर तुरीय भूमि में ऐक्यानुभव के बल पर सूतसंहिता में निगदित कैवल्यात्मक सायुज्य मुक्ति को प्राप्त करता है। देवराजन और देवप्रसादन में यन्त्र का उपयोग और महत्त्व अद्भुत है। यन्त्र, तन्त्र तथा मन्त्र देवता का अभिव्यञ्जक संस्थान रूप शरीर है। देवता का यन्त्र स्थूल, तन्त्र सूक्ष्म और मन्त्र कारण शरीर है। बिन्दु, रेखा, कोण तथा वृत्त – समवेत मातृका यन्त्र है , मन्त्र को यन्त्र का रूप प्रदान करने वाला गणित प्रक्रम तन्त्र है। ब्रह्मादि देव का वाचक मन्त्र अन्वर्थ होता है। श्रीगुरुदेवके द्वारा विधिवत् प्राप्त मन्त्र का अभ्यास रूप जप के बिना देवता का प्रसन्न होना असम्भव है। जिस प्रकार, वाचक नाम के श्रवण से नामी पुकारने वाले के सम्मुख हो जाता है ; उसी प्रकार बीजात्मक मन्त्र मन्त्री को जापक के अभिमुख कर देता है। क्रिया, कर्म, कर्ता का वाचक मन्त्र के जप से कल्याण सुनिश्चित है। जिसके मनन से त्राण हो, वह मन्त्र है। विधि सम्मत गुरु के द्वारा प्रदत्त वेद विधि के अविरूद्ध मन्त्र का विधिवत् अभ्यास जप है। मातृकादियुत मन्त्र बारह वर्षों तक जो जपता है , वह अणिमादि से सम्पन्न ज्ञान को अवश्य प्राप्त करता हैl प्रणवाक्षर के जप से परमाक्षर परब्रह्म की समुपलब्धि सुनिश्चित है। शब्दाक्षर रूप मन्त्र परमाक्षर के ज्ञान में प्रयुक्त तथा विनियुक्त होकर मन्त्रार्थ रूप परमाक्षर मात्र शेष रहता है।
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