बालश्रम कानून व किशोर न्याय अधिनियम को भाजपा प्रत्याशी रोहित साहू ने रखा अपने जूते की नोक पर?

गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा नाबालिग व स्कूली बच्चों से चुनावी प्रचार करवाने का मामला प्रकाश में आया है। जब से 2023 के लिए चुनाव प्रचार शुरू हुआ है, तभी से राजिम  विधान सभा क्षेत्र में बालश्रम कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।यह सब तब भी हो रहा है जब चुनाव आयोग पूरी सख्ती के साथ बच्चों को चुनाव प्रचार में नहीं लगाने का स्पष्ट आदेश जारी कर चुका है। लेकिन राजिम विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी रोहित साहू  को जब से भाजपा का टिकट मिला है तब भाजपा के कई कद्दावर नेताओं ने इनका खुले आम विरोध किया था और आज इनके प्रचार प्रसार में कार्यकर्ता भाग नहीं ले रहे है और भाजपा प्रत्याशी रोहित साहू द्वारा चुनाव आयोग के उक्त आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए खुलेआम बच्चों से चुनाव का प्रचार-प्रसार करवा रहे हैं। रोहित साहू द्वारा  इन मासूम बच्चों से रैलियों में अपनी और पार्टियों का प्रचार-प्रसार की दृष्टि से झंडे बैनर उठवाने का काम करवाया जा रहा है। जबकि सभी प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग ने निर्देश जारी करने के बाद पकड़े जाने पर बालश्रम कानून व किशोर न्याय अधिनियम के तहत कार्रवाई करने का स्पष्ट आदेश जारी किया हुआ है। ऐसा ही एक मामला राजिम विधान सभा में देखने को मिला हैं। जन्हा   भाजपा प्रत्याशी रोहित साहू अपने चुनाव प्रचार के दौरान बच्चे अपने हाथों पर पाम्पलेट, बैनर व पार्टी का झंडा लिए राजिम विधान सभा के विकास खंड फिंगेस्वर के ग्रामों की सड़कों पर गली-गली खुलेआम दस्तक दे रहे थे। जब गांव के कुछ लोगों से बातचीत की तो उन्होंने अपना नाम नहीं छापने के आग्रह पर बताया कि गांवों की सड़कों पर इन दिनों छोटे-छोटे बच्चों को कुछ पैसे और चॉकलेट देकर  प्रत्याशी रोहित साहू व उनके कार्यकर्ता अपनी पार्टियों का प्रचार करवा रहे हैं। चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद खुलेआम सड़कों पर मासूम बच्चों के सर पर भाजपा की टोपी और बैनर पोस्टर और हाथों में पाम्पलेट लिए इन बच्चों पर प्रशासन भी पूरी तरह मेहरबान है।तभी तो इन्हें रोकने अब तक ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसलिए मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल भाजपा के प्रत्याशी के प्रचार और पाम्पलेट बांटने की कमान इन बच्चों के हाथों में ही है। जबकि चुनाव आयोग ने इन पार्टियों को नोटिस जारी कर हिदायत दे चुका है कि 18 साल से कम उम्र के लोगों से श्रम न करवाएं।

भीड़ बढ़ाने और चुनाव प्रचार में नहीं होगा बच्चों का उपयोग: आयोग

गौरतलब हो कि विधानसभा चुनाव के दौरान भीड़ बढ़ाने या फिर प्रचार-प्रसार के लिए बच्चों का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जा सकेगा। बच्चों को माध्यम बनाकर इस तरह के आयोजन करने वालों पर अब सख्त कार्रवाई होगी। इसके लिए बाल कल्याण समिति और एनजीओ की भी मदद ली जाएगी। इस संबंध में निर्वाचन आयोग ने गाइड लाइन जारी कर दी है। बाल संरक्षण से जुड़े कुछ संगठनों द्वारा अन्य जिलों में प्रत्याशियों द्वारा स्कूल व आंगनवाड़ी के बच्चों का रैलियों एवं प्रचार-प्रसार के दौरान भीड़ बढ़ाने के लिए उपयोग नहीं किया जाना है।
ज्ञात हो की संगठनों की ओर से प्राप्त शिकायतों पर आयोग ने 21 फरवरी 2017 के परिपत्र का हवाला देते कहा गया है कि  चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं। चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा बच्चों के अधिकारों का तो उल्लंघन किया ही जा रहा है, इसके अलावा मतदाता जागरूकता के नाम पर गैर राजनीतिक संगठन और सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। शिकायत के बाद संयुक्त मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के हस्ताक्षर से जारी पत्र में सभी कलेक्टरों को निर्देश जारी किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि चुनावों में बच्चों के इस्तेमाल को रोकने के लिए भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशों का सख्ती से पालन कराया जाए और इनका उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जाएं।

सीडब्ल्यूसी करेगी सुनवाई

आयोग द्वारा जारी निर्देशों में उल्लेख है किराजनीतिक दल और निर्वाचन अधिकारी निर्वाचन प्रक्रिया में बाल श्रमिकों को नहीं लगाएंगे। साथ ही निर्वाचन अधिकारियों या राजनैतिक दलों द्वारा बच्चों को निर्वाचन संबंधी किसी भी प्रकार की गतिविधि में शामिल नहीं किया जाएगा। जिले में किसी भी राजनैतिक दल या संगठन द्वारा ऐसा करने पर सीडब्लयूसी एवं कलेक्टर के समक्ष मामला रखा जाएगा। आयोग के अनुसार बच्चों और किशोरों को राजनैतिक पार्टियां किसी भी रूप में उपयोग नहीं कर सकतीं, जब तक वे मताधिकार का प्रयोग करने की उम्र तक न पहुंच जाएं। इस दिशा में स्वयंसेवी संगठन सक्रियता रखेंगे की सारे नियम और कानून को भाजपा प्रत्याशी रोहित साहू ने अपने जूते की नोक पर रखा हैं और प्रशासन पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।

टिकट वितरण के बाद से ही है भाजपा के कार्यकर्ता नाराज?

बताते चले की राजिम विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को मनाने समझाने के लिए प्रदेश भाजपा के बड़े चेहरे धरम लाल कौशिक, राष्ट्रीय संगठन मत्री अजय जामवाल, प्रदेश प्रभारी ओम माथुर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण साव, पश्चिम बंगाल के विधायक सुशांत घोष, बिहार के दिलीप जायसवाल, प्रदेश कोषाध्यक्ष नंदन जैन जैसे नेताओं ने डेमज कंट्रोल करने का भरपूर प्रयास प्रयास किया  लेकिन दो महीने के बाद भी फुंसी से अब फोडा़ हो गया है,अंदर खाने में चर्चा है कि विश्व हिन्दू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भाजपा के अधिकांश कार्यकर्ताओं को आज भी घोषित प्रत्याशी स्वीकार नहीं है? भाजपा जीतीं बाजी सिर्फ पैराशूट उम्मीदवार के कारण मुगेरीलाल के सपने देखने में लगी हुई है, राजिम विधानसभा में जोगी कांग्रेस से चुनाव लडकर हारने वाले को टिकट दिया जाना भाजपा कार्यकर्ताओं के समझ से परे है दलबदल कर आये रोहित साहू को प्रत्याशी बनाया जाना  वह समझ नहीं आता है?  कांग्रेस के घोषित प्रत्याशी के विरोध में अभी तक एक भी कार्यकर्ता ने मुंह नहीं खोला, लेकिन भाजपा में ठीक विपरीत है मौन रहकर बडे़ नेताओं के सभाओं का बायकाट कर विरोध जता रहे हैं?
फिगेश्वर में विधानसभा स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन में भाजपा के अधिकांश नेताओं की अनुपस्थिति, एंव उपस्थित संख्याओं पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वाक ओवर समझ रहे हैं?
राजिम विधानसभा के मतदाता बहुत समझदार है  दलबदल करने वाले नेताओं को स्वीकार नहीं करते जिसका उदाहरण है संत कवि पवन दीवान, विद्याचरण शुक्ल, संतोष उपाध्याय,
हालाकि दलबदलू नेता पाला बदलने के लिए भले ही विचारधारा की आड़ लेते हों, लेकिन असल में उनकी कोई विचारधारा ही नहीं होती
दलबदलू नेता यह कभी नहीं बताते कि वे जिन खामियों का उल्लेख करते हुए दल बदलते हैं उनका आभास उन्हें चुनावों की घोषणा होने के बाद ही क्यों होता है? साथ ही वह जिस दल को छोड़ते हैं और जिससे जुड़ते हैं उन दोनों की सिरदर्दी बढ़ाते हैं।उससे यही साफ हुआ कि भारतीय लोकतंत्र किस तरह अवसरवादी राजनीति से ग्रस्त है।
आम तौर पर दलबदल करने वाले नेताओं के पास एक जैसे घिसे-पिटे तर्क होते हैं। कोई कहता है कि उनकी जाति-बिरादरी के लोगों की उपेक्षा हो रही थी तो कोई अपने क्षेत्र की अनदेखी का आरोप लगाता है। दलबदलू नेता यह कभी नहीं बताते कि वे जिन खामियों का उल्लेख करते हुए दल बदलते हैं, उनका आभास उन्हें चुनावों की घोषणा होने के बाद ही क्यों होता है? वे यह भी नहीं बताते कि क्या उन्होंने कभी उन मसलों को पार्टी के अंदर उठाया, जिनकी आड़ लेकर दलबदल किया? यह हास्यास्पद है ।यह एक तथ्य है कि दलबदल निजी स्वार्थ के लिए किया जाता है। कुछ को टिकट न मिलने का डर होता है तो कुछ को अपनी यह मांग पूरी होती नहीं दिखती कि उनके साथ-साथ उनके सगे संबंधी को भी टिकट मिले। कुछ अपने क्षेत्र की जनता की नाराजगी भांपकर अन्य क्षेत्र से चुनाव लडऩे की फिराक में नए दल की ओर रुख करते हैं। दलबदल करने वाले नेता भले ही विचारधारा की आड़ लेते हों, लेकिन सच यह है कि उनकी कोई विचारधारा नहीं होती। वे जिस दल में जाते हैं, उसकी ही विचारधारा का गुणगान करने लगते हैं, जबकि कुछ समय पहले तक उसकी निंदा-भत्र्सना कर रहे होते हैं। विडंबना यह है कि कई बार मतदाता भी उनके बहकावे में आ जाते हैं।दलबदलू नेता जिस दल को छोड़ते हैं, केवल उसे ही असहज नहीं करते, बल्कि वे जिस दल में जाते हैं वहां भी समस्या पैदा करते हैं, क्योंकि उसके चलते उसके क्षेत्र से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे नेता को झटका लगता है। कई बार वह नाराजगी में विद्रोह कर देता है या फिर किसी अन्य दल में शामिल हो जाता है। जिस तरह चुनाव की घोषणा होने के बाद दलबदल होता है, उसी तरह प्रत्याशियों की घोषणा होने के बाद भी। जिस दल के नेता का टिकट कटता है, वह दूसरे दल जाकर प्रत्याशी बनने की कोशिश करता है। शायद ही कोई दल हो, जिसे टिकट के दावेदारों के चलते खींचतान का सामना न करना पड़ता हो, लेकिन वे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं।

भाजपा की परिवर्तन यात्रा भी रही थी फीकी,भीड़ जुटाने सफल नहीं हुईं भाजपा

भाजपा ने वोटरों को साधने के लिए छत्तीसगढ़ में पिरवर्तन यात्रा की शुरूआत की था। जिसमें भाजपा के आधा दर्जन से अधिक दिग्गज नेता शामिल हुए थे ।तो वन्ही दूसरी ओर भाजपा द्वारा जिला गरियाबंद में कि गई परिवर्तन यात्रा में बीजेपी भीड़ जुटाने में नाकाम रही थी जबकि गरियाबंद पहुंची परिवर्तन यात्रा में अरुण साव सहित दो केंद्रीय राज्य मंत्री प्रदेश भाजपा के बड़े नेता शामिल थे, बावजूद इसके भीड़ नहीं जुटा पाना भाजपा के लिए एक नई परेशानी और चुनौती नजर आई थी।
भाजपा की परिवर्तन यात्रा गरियाबंद पहुंची इस दौरान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव के नेतृत्व में परिवर्तन यात्रा में शामिल होने केंद्रीय राज्य मंत्री भानुप्रताप वर्मा, अन्नापूर्णा देवी, सहित रायपुर महासमुंद के सांसद प्रदेश के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे,परिवर्तन यात्रा के दौरान गरियाबंद सभा में 800 कुर्सी लगाई गई थी जिसमे आधा से ज्यादा खाली रही ऐसे में क्या और कैसे परिवर्तन करेगी भाजपा इस विषय पर आत्मचिंतन जरूरी था।खाली कुर्सी भी इस बात का प्रमाण था।


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