छत्तीसगढ़ : गरियाबंद जल संसाधन विभाग बना भ्रष्टाचार का अड्डा, नहर लाइनिंग कार्य में करोड़ों का घोटाला! अधिकारी मौन, जवाबदेही से बचते नजर आए

 

छत्तीसगढ़ : गरियाबंद/छुरा (गंगा प्रकाश)। किसानों और आम जनता के हित में बनाई गई सरकार की योजनाएं गरियाबंद जिले के जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षों से लंबित नहर लाइनिंग व निर्माण कार्यों में करोड़ों का घोटाला उजागर हुआ है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने तक को तैयार नहीं हैं।

15 साल पुराने भ्रष्टाचार की पुनरावृत्ति, काम अधूरा और जहां हुआ वहां दरारें

ब्लॉक छुरा, पांडुका, और फिंगेश्वर क्षेत्र में लाइनिंग कार्य कछुआ गति से भी धीमे चल रहे हैं। टेंगनाही माइनर नाली, फिंगेश्वर मुख्य नहर और पीपरछेड़ी बांध जैसे स्थानों पर निर्माण कार्य एक साल भी नहीं टिक पाए हैं और पहले ही दरारें नजर आने लगी हैं। कार्य पूरी तरह से घटिया सामग्री और लापरवाह निर्माण का उदाहरण बन चुके हैं।

अधिकारी-ठेकेदार गठजोड़ की खुली पोल

सूत्रों की मानें तो विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और ठेकेदारों के बीच गहरी सांठगांठ है। कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार के चलते निर्माण कार्यों में स्टिमेट के विपरीत सामग्री और तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है। पीपरछेड़ी बांध, कनेशर, खरखरा जलाशय और अन्य माइनर नालियों के निर्माण कार्यों में भारी अनियमितताएं उजागर हुई हैं।

जब मीडिया ने संपर्क किया तो अधिकारी मौन

इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर बात यह है कि जब मीडिया द्वारा जवाबदेही तय करने हेतु विभागीय अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने जवाब देना तक उचित नहीं समझा।

  • छुरा एसडीओ पुनीत सिरमौर, जो हमेशा दफ्तर से गायब रहते हैं, से संपर्क करने पर उन्होंने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा।विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली है कि एसडीओ सिरमौर 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, शायद इसी कारण वे किसी भी जवाबदेही से बचना चाह रहे हैं। विभाग में इस बात को लेकर एक खुशी और उत्सव जैसा माहौल भी बना हुआ है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
  • वहीं उनके वरिष्ठ अधिकारी और कार्यपालन अभियंता (ईई) एसके बर्मन से भी संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने भी मीडिया कर्मी का कॉल रिसीव नहीं किया। इससे साफ है कि विभाग के आला अधिकारी न केवल लापरवाह हैं, बल्कि जवाबदेही से भी बचते नजर आ रहे हैं।

स्थाई पदस्थापना और राजनीतिक संरक्षण बना कारण

इन अधिकारियों की वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थापना, और ऊपर तक की पकड़, तबादला नीति की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है। विभागीय वाहनों और संसाधनों का निजी लाभ के लिए उपयोग हो रहा है, और आम नागरिकों को समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।

ईडी और लोकायुक्त कब जागेंगे?

विभाग की कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार की गूंज अब जनमानस में गहराई से बैठ चुकी है। लेकिन न तो किसी जांच एजेंसी ने संज्ञान लिया है, और न ही कोई कार्रवाई हुई है। क्या ईडी और लोकायुक्त को इस स्तर तक मामला बिगड़ने के बाद ही हस्तक्षेप करना होगा?

निष्कर्ष:

गरियाबंद जल संसाधन विभाग में फैले इस सुनियोजित भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करना अब प्रशासन की गंभीर चूक मानी जाएगी। जब अधिकारी खुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगें और शासन की योजनाएं जेब भरने का साधन बन जाएं, तो ऐसी व्यवस्था पर कठोर कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है।


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