मोहेरा घाट में कलेक्टर की नजर पड़ी तो रेत के अवैध खदान शुरू होने से पहले चेन माउंटेन उठा ले आई प्रशासन

आधा दर्जन उन खदानों पर कार्यवाही क्यों नही..?कमजोर कड़ी कौन समझ से परे?



गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। सरकार किसी भी पार्टी की हो गरियाबंद जिला में अवैध रेत खनन को रोकना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया हैं।तत्कालीन भूपेश सरकार के समय रेत माफियाओं का नग्गा नाच पांच सालों तक चलते रहा और कर्ज में डूबे छत्तीसगढ़ का राजस्व की खुले आम लूट मचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा गया।अब छत्तीसगढ़ मोदी गारंटी के साथ भाजपा नीत “विष्णू” सरकार है सत्ता पर काबिज हुए दो माह भी पूरे नही हुए है और रेत माफियाओं का आतंक जिला गरियाबंद में फिर देखने को मिल रहा हैं।गरियाबंद जिले में अवैध रेत खदान धडल्ले से जारी है।राजिम से लेकर देवभोग तक अवैध रेत खनन से रोजाना प्रशासन को हजारों रुपए की रॉयल्टी का नुकसान हो रहा है।इसी बीच पैरी नदी पर अवैध रेत खदान शुरू करने निकासी मार्ग बनाने में लगी एक चेन माउंटेन पर कलेक्टर दीपक अग्रवाल को नजर पड़ी। शनिवार को शाम करीबन 7बजे कलेक्टर राजिम मेले की तयारी का जायजा लेकर लौट रहे थे। मोहेरा घाट में चल रहे अवैधानिक गतिविधि को देख रुक गए। उन्होंने तत्काल गठित टास्क फोर्स को कार्यवाही का निर्देश दिया।अमला रात को पहुंच आधी रात तक मशक्कत कर माउंटेन को कोतवाली पुलिस के हवाले किया।शुरू होने से पहले एक अवैध खदान पर कार्यवाही से रेत माफिया में हड़कंप मचा हुआ है। वन्हीं दूसरी ओर गरियाबंद जिले में लगातार नदी नालो से अवैध रेत खनन के साथ ही उनके  खिलाफ लगातार कार्यवाही जारी है, फिर भी अवैध खनन बन्द नहीं हो रहे है रेत तस्करों के हौसले बुलन्द नजर आ रहे है। इसी बीच जिला मुख्यालय के नजदीक पैरी नदी के मोहेरा, बारुका घाट में जिला प्रशासन की टास्क फोर्स ने एक चेन माउंटेन को जप्त कर कोतवाली पुलिस के हवाले कर दिया है।
दरअसल इस घाट पर एक और अवैध खदान चलाने रेत की निकासी के लिए कल की रात रास्ता बनाने का काम हो रहा थे। जिस पर राजिम मेला तैयारी से लौटते हुए कलेकटर दीपक अग्रवाल की नजर पड़ गई।कलेक्टर के निर्देश पर अवैध माइनिंग रोक थाम के लिए बनाई टास्क फोर्स आधी रात तक कार्यवाही कर, अवैध रेत खदान खुलने से पहले ही बंद कर दिया गया। अब सवाल यह है कि जहां एक खदान बंद किया जाता है वहां तीन नए खदान प्रारंभ भी हो रहे हैं इस पर भी प्रशासन को ध्यान रखकर कार्रवाई करनी होगी तभी इन अवैध खनन को रोका जा सकेगा। देखा जा रहा है कि अवैध खनन कर्ता लगातार अपनी राजनीतिक पहुंच और वर्तमान सरकार की बात कहकर प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं।
और उनकी दबदबा इतना भारी है कि वो लोग माइनिंग के कर्मचारियों पर भी हथियार दिखा कर उन पर हमला कर रहे है।

टास्क फोर्स जप्त कर रही वाहन, मशीन जप्त करने में नाकाम हो रही

जिले में कोपरा, हथखोज, परसदा,सरकडा में रेत के अवैध खदान जारी है। जबकि एनीकेट में पानी आने के कारण सिंधोरी, चोबेबंधा दो दिन पहले बंद हुआ है।धमतरी के डूमर पाली खदान से रेत की निकासी सरकडा से  धमतरी के परेवाडीग के लीगल खदान से देर रात जारी अवैध परिवहन राजिम नवीन मेला मार्ग से निकल रहा है ।सभी अवैध खदान में रेत का परिवाहन रात 10 बजे के बाद होता है।रोजाना    300 से ज्यादा हाईवा नदियों का सीना चीर दौड लगा रहे हैं।कार्यवाही के नाम पर हाईवा की जप्ति हो रही है।लेकिन खदान पुरी तरह से बंद नही हो पा रहा है।कार्यवाही के लिए टास्क फोर्स का गठन भी हुआ है जो वाहन पकड़ रहे,लेकिन ख़दानों में मौजूद मशीनों को बंद कराने में नाकाम साबित हो रहा है।

कूटेना में हुई कुटाई पर कार्यवाही नही

बताते चलें कि गरियाबंद में अवैध रेत खनन पूरे चरम सीमा पर है।जिले के कूटेना रेत घाट पर तीन चेन माउंटेन मशीन से हो रहे अवैध खनन को रोकने 29 जनवरी की रात जिला खनिज विभाग का अमला एक निजी स्कॉर्पियो में सवार होकर कूटेना पहुंचे हुए थे।टीम कार्यवाही करती उससे पहले रेत माफिया के गुर्गे खनिज अमला पर हमला कर दिया था।बताया जाता है की अवैध खनन से जुड़े लोग हाई प्रोफाइल है, जिन्हें राजनैतिक सरंक्षण प्राप्त हैं।स्कॉर्पियो पर तोड़ फोड़ के बाद चालक व कर्मी की पिटाई की, डर इतना की तोड़ फोड़ किए गए वाहन को झाड़ियों में छुपा रखा गया था।मामले में 15 से ज्यादा लोगो के खिलाफ कई धाराओं के तहत मामला भी दर्ज किया गया पर,गिरफ्तारी की कार्यवाही बाकी है।सरकारी अमले पर हमले के बाद सीधी घाट में दबिश देने प्रशासनिक अमला असुरक्षित महसूस कर रही है।

रोजाना 200 हाइवा निकल रहा रेत

महानदी के कोपरा,चौबेबांधा व कूकदा घाट में 7 से ज्यादा मशीन लगी हुई हैं,जो दिन रात रेत का अवैध परिवहन कर रही है।बताया जाता है की इन घाटों की वैधता खत्म होने के बावजूद यहा लगातार अवैध खनन जारी है। कहा जाता है काम में जुड़े सरगना वही है बस सत्ता बदलते ही सेटिंग व सेटिंग के बाद देने वाले कलेकशन का पता बदल गया है।

नदियों के लिए काल बनता अवैध रेत खनन

प्रकृति ने हमें नदी दी थी जल के लिए लेकिन समाज ने उसे रेत उगाहने का जरिया बना लिया और उसके लिए नदी का रास्ता बदलने से भी परहेज नहीं किया हैं ।उत्तर और मध्य भारत की अधिकांश नदियों का उथला होते जाना और थोड़ी सी बरसात में उफन जाना, तटों के कटाव के कारण बाढ़ आना और नदियों में जीव-जंतु कम होने के कारण पानी में ऑक्सीजन की मात्र कम होने से पानी में बदबू आना, ऐसे ही कई कारण हैं जो मनमाने रेत उत्खनन से जल निधियों के अस्तित्व पर संकट की तरह मंडरा रहे हैं। आज हालात यह है कि कई नदियों में ना तो जल प्रवाह बच रहा है और ना ही रेत।
सभी जानते हैं कि देश की बड़ी नदियों को विशालता देने का कार्य उनकी सहायक छोटी नदियां ही करती हैं। बीते एक-डेढ़ दशक में देश में कोई तीन हजार छोटी नदियां लुप्त हो गईं। इसका असल कारण ऐसी मौसमी छोटी नदियों से बेतहाशा रेत को निकालना था, जिसके चलते उनका अपने उद्गम व बड़ी नदियों से मिलन का रास्ता बंद हो गया। देखते ही देखते वहां से पानी रूठ गया। खासकर नर्मदा नदी को सबसे ज्यादा नुकसान उनकी सहायक नदियों के रेत के कारण समाप्त होने से हुआ है। इसका ही असर है कि बड़ी नदियों में जल प्रवाह की मात्र साल दर साल कम हो रही है।

नदियों का रेत निर्माण कार्य के अनुकूल

देश की जीडीपी को गति देने के लिए सीमेंट और लोहे की खपत बढ़ाना नीतिगत निर्णय है। अधिक से अधिक लोगों को पक्के मकान देना और नए स्कूल-अस्पताल का निर्माण होना भी आज की जरूरत है, लेकिन इसके लिए रेत उगाहना अपने आप में ऐसी पर्यावरणीय त्रसदी का जनक है जिसकी क्षति-पूर्ति संभव नहीं है।देश में वैसे तो रेत की कोई कमी नहीं है, विशाल समुद्री तट है और कई हजार वर्ग किलोमीटर में फैला रेगिस्तान भी, लेकिन समुद्री रेत लवणीय होती है, जबकि रेगिस्तान की बालू बेहद गोल व चिकनी, लिहाजा इनका इस्तेमाल निर्माण में नहीं होता। प्रवाहित नदियों की भीतरी सतह में रेत की मौजूदगी असल में उसके प्रवाह को नियंत्रित करने का अवरोधक, जल को शुद्ध रखने का छन्ना और नदी में कीचड़ रोकने की दीवार भी होती है। तटों तक रेत का विस्तार नदी को सांस लेने का अंग होता है। नदी केवल एक बहता जल का माध्यम नहीं होती, बल्कि उसका अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है जिसके तहत उसमें पलने वाले जीव, उसके तट के सूक्ष्म बैक्टीरिया सहित कई तत्व शामिल होते हैं और उनके बीच सामंजस्य का कार्य रेत का होता है। नदियों की कोख को अवैध और अवैज्ञानिक तरीके से खोदने के चलते यह पूरा तंत्र अस्त-व्यस्त हो रहा है। तभी अब नदियों में रेत भी नहीं आ पा रही है, पानी तो है ही नहीं। रेत के लालची नदी के साथ-साथ उससे सटे इलाकों को भी खोदने से बाज नहीं आते।

..तो खत्म हो जाएगी रेत

छत्तीसगढ़ के लिए की गई चेतावनी अब सरकारी दस्तावेजों में भी दर्ज है। कुछ साल पहले रायपुर के आसपास रेत की 60 खदानें थी, प्रशासन ने उनकी संख्या घटा कर दस कर दी। ऐसे में यहां उत्पादन कम है और खपत अधिक है। रायपुर में विकास के कारण आए दिन रेत की मांग बढ़ती जा रही है। ऐसे में विशेषज्ञों की चेतावनी है कि समय रहते यदि चेता नहीं गया तो रायपुर से लगी शिवनाथ, खारुन और महानदी में आगामी कुछ वर्षो में रेत खत्म हो जाएगी।
कानून तो कहता है कि ना तो नदी को तीन मीटर से ज्यादा गहरा खोदो और ना ही उसके जल के प्रवाह को अवरुद्ध करो, लेकिन लालच के लिए कोई भी इनकी परवाह नहीं करता। रेत नदी के पानी को साफ रखने के साथ ही अपने करीबी इलाकों के भूजल को भी सहेजता है। कई बार एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट निर्देश दे चुके हैं। पिछले साल तो आंध्र प्रदेश सरकार को रेत का अवैध उत्खनन ना रोक पाने के कारण 100 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगा दिया गया था। इसके बावजूद मध्य प्रदेश की सरकार ने एनजीटी के निर्देशों की अवहेलना करते हुए रेत खनन की नीति बना दी। एनजीटी ने कहा था कि रेत ढोने वाले वाहनों पर जीपीएस अवश्य लगा हो, ताकि उन्हें ट्रैक किया जा सके, लेकिन आज भी पूरे प्रदेश में खेती कार्य के लिए स्वीकृत ट्रैक्टरों से रेत ढोई जा रही है। स्वीकृत गहराई से दोगुनी-तिगुनी गहराई तक पहुंच कर रेत खनन किया जाता है। जिन चिन्हित क्षेत्रों के लिए रेत खनन पट्टा होता है उनसे बाहर जाकर भी खनन होता है। बीच नदी में आधुनिक मशीनों के जरिये खनन आज आम बात है। यह भी दुखद है कि पूरे देश में जब कभी नदी से उत्खनन पर कड़ाई होती है तो सरकारें पत्थरों को पीस कर रेत बनाने की मंजूरी दे देती हैं, इससे पहाड़ तो नष्ट होते ही हैं, आसपास की हवा में भी धूल कण कोहराम मचाते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि पूरे देश में जिला स्तर पर व्यापक अध्ययन किया जाए कि प्रत्येक छोटी-बड़ी नदी में सालाना रेत आगम की क्षमता कितनी है और इसमें से कितनी को बगैर किसी नुकसान के उत्खनित किया जा सकता है। फिर उसी अनुसार निर्माण कार्य की नीति बनाई जाए। उसी के अनुरूप राज्य सरकारें उस जिले में रेत के ठेके दें। इंजीनियरों को रेत के विकल्प खोजने पर भी काम करना चाहिए। आज यह भी जरूरी है कि मशीनों से रेत निकालने, नदी के किस हिस्से में रेत खनन पर पूरी तरह पांबदी हो, परिवहन में किस तरह के मार्ग का इस्तेमाल हो, ऐसे मुद्दों पर व्यापक अध्ययन होना चाहिए। साथ ही नदी तट के बाशिंदों को रेत-उत्खनन के कुप्रभावों के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास भी होना चाहिए।


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