बस्तर में आदिकाल से निवासरत सर्व मूलनिवासि आदिवासियों को आज पर्यंत तक न्याय क्यों नहीं मिल पाया है क्या कारण है।

जय प्रकाश ठाकुर

दंतेवाड़ा (गंगा प्रकाश)। सामाजिक कार्यकर्ता संजय पंत प्रेस नोट जारी कर कहा कि। बस्तर संभाग में आदिकाल से निवासरत सर्व मूल निवासियों को आज पर्यंत तक न्याय क्यों नहीं मिल पाया है क्या कारण है। जबकि  आदिकाल से सर्व मूल निवासरत आदिवासियों के अधिकार एवं न्याय हित में।05-07 सितंबर, 1949 को संविधान सभा की बैठक में पांचवी एवं छठवीं अनुसूचियों पर चर्चा करके उन्हें पारित किया गया था। देशभर के आदिवासी कार्यकर्ताओं द्वारा इन तीन दिनों को आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करने हेतु याद किया जाता है। मैं देश एवं राज्य के नीति-निर्माताओं से निवेदन करना चाहता हूं कि वे सविधान निर्माताओं के  पवित्र सपनों को साकार करें एवं पांचवी अनुसूची, पेसा कानून तथा ग्राम सभा को और मजबूती प्रदान करके आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करें। 

छत्तीसगढ़ बस्तर के समस्त मूल वासियों भाइयों एवं बहनों, आप सभी को मेरा सेवा जोहार। आज के इस लेख की शुरुआत मैं जल, जंगल और जमीन के महत्व से करना चाहता हूं। जिस प्रकार किसी भी इंसान के लिए रोटी, कपड़ा और मकान एक बुनियादी जरूरत है ठीक उसी प्रकार एक आदिवासीयों के लिए जल, जंगल और जमीन एक बुनियादी जरूरत है। शहरी संस्कृति एवं सरकारों को यह समझना आवश्यक है कि बिना जल, जंगल एवं जमीन के रोटी, कपड़ा एवं मकान की आपूर्ति करना असंभव है। इंसान चंद्रमा पर कदम रखकर भी सर्वप्रथम जल, जंगल एवं जमीन की ही तलाश करता है किंतु यह कैसी विडंबना है कि देश के बीचों-बीच मौजूद जल, जंगल, जमीन एवं आदि काल से निवासरत मूल वासियों की सरकार को कोई परवाह ही नहीं है।

साथियों।संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि देश में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन जीने एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। साथियों, बस्तर क्षेत्र का यह दुर्भाग्य है कि यहां दशकों से व्याप्त हिंसा के कारण होने वाली मौतें कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अंतर्गत नहीं हुई है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अदालतों द्वारा आज तक बस्तर में व्याप्त हिंसा के कारण किसी  भी पक्ष के किसी भी व्यक्ति को मृत्यु दंड की सजा नहीं दी गई है किंतु पुलिस एवं माओवादियों के बीच हुए मुठभेड़ों में सभी पक्षों से ना जाने कितनी मौतें हुई हैं। मैं इस मुद्दे से जुड़े हुए सभी पक्षों से एक बार फिर अपील करता हूं की हिंसामुक्त एवं खुशहाल बस्तर ही यहां निवासरत मूल वासियों को उनके अधिकार दिला सकता है

          हाल ही में लाए गए पेसा नियम, 2022  के तहत यह व्यवस्था की गई है कि ग्राम सभा के अंतर्गत संसाधन, योजना और प्रबंधन समिति (RPMC) गौण खनिजों का प्रबंधन करेगी। मुख्य खनिज के अंतर्गत लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, टिन अयस्क  आदि खनिज आते हैं जबकि गौण खनिज के अंतर्गत पत्थर, मुरूम, रेत, मिट्टी आदि आते हैं। राज्य सरकार को मुख्य खनिज से सालाना राजस्व आय गौण खनिज से होने वाले सालाना राजस्व आय से लगभग 15 गुना   अधिक प्राप्त होता है। मैं बस्तर हित में केंद्र एवं राज्य सरकार से यह अपील करना चाहता हूं कि गौण खनिजों के साथ ही मुख्य खनिजों के प्रबंधन में भी ग्राम सभाओं को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए। ऐसा करने से सत्ता के विकेंद्रीकरण की भावना को बल मिलेगा साथ ही खनिज  उत्खनन की योजनाओं के निर्माण में स्थानीय आदिवासियों की भूमिका भी बढ़ेगी।

साथियों ध्यान आकर्षित हो की बैलाडीला की पहाड़ियों से लौह अयस्क के खनन के बदले बस्तर के मूल वासियों के कल्याण के लिए NMDC द्वारा DMF एवं CSR फंड में सैकड़ों करोड़़ की राशि प्रदान की जाती है किंतु जापान को लौह अयस्क का निर्यात करने वाले बस्तर के जिला  अस्पतालों के सोनोग्राफी कक्ष में  तड़़पते मरीजों की कतार देखकर शासन-प्रशासन की नजरों में मूल वासियों की जान की कीमत समझी जा सकती है। भाइयों एवं बहनों, यदि राज्य सरकार सही मायनों में बस्तर एवं यहां निवासरत मूल निवासियों का कल्याण करना चाहती है तो पेसा कानून के अंतर्गत DMF एवं CSR फंडों का सीधा वितरण ग्राम पंचायतों के खातों में करने का प्रावधान करना चाहिए। ऐसा करने से ग्राम पंचायतें आर्थिक रूप से मजबूत एवं स्वतंत्र होंगे तथा मूल वासियों का सही मायने में विकास होगा। साथियों NMDC द्वारा DMF एवं CSR फंडों में इतनी राशि दी जाती है कि बस्तर संभाग के हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोला जा सके। बस्तर क्षेत्र द्वारा निर्यात किए गए लौह अयस्क से देश- दुनिया में न जाने कितने विश्व स्तरीय स्कूलों एवं अस्पतालों का निर्माण हुआ होगा किंतु बस्तर क्षेत्र के स्कूलों एवं अस्पतालों की दूर्दशा देखकर सरकार एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता का अंदाजा लगाया जा सकता है। बस्तर क्षेत्र के सही मायनों में विकास के लिए DMF  एवं CSR फण्डों के आय-व्यय में पारदर्शिता का होना अत्यंत आवश्यक है।

सरकार एवं प्रशासन में उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा बार-बार यह दावा किया जाता है कि बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद बैकफुट एवं हाशिये पर है। मैं जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों से यह सवाल करना चाहता हूं कि नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों से लूटे गए कितने हथियारों की वापस बरामदगी हुई है। नक्सलियों द्वारा सुरक्षाबलों से लूटे गए हथियारों की बरामदगी के बिना ही बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद को बैकफुट पर कहना एक खोखला दावा साबित होगा।

           अंत में मैं केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं बस्तर क्षेत्र में व्याप्त हिंसा से जुड़े़ सभी पक्षों से एक बार पुन: अपील करना चाहता हूं कि बस्तर क्षेत्र में दशकों से व्याप्त हिंसा की समाप्ति एवं खुशहाल तथा नये बस्तर के निर्माण के लिए जल्दी से जल्दी बातचीत की शुरुआत करें एवं मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा करें।

साथियों भाइयों एवं बहनों, बस्तर क्षेत्र में रहने वाले मूल निवासियों के कल्याण के लिए स्थानीय एवं गैर स्थानीय व्यक्तियों के बीच अंतर को समझना अत्यंत आवश्यक है। यहां स्थानीय शब्द से तात्पर्य बस्तर क्षेत्र में आदि काल से निवासरत मूल वासियों से है जबकि गैर स्थानीय शब्द से तात्पर्य बस्तर क्षेत्र में आदिकाल से निवासरत मूल वासियों से है जबकि गैर स्थानीय शब्द से तात्पर्य जीविकोपार्जन के लिए बाहरी क्षेत्र से बस्तर में आये हुए व्यक्तियों से है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं NMDC की भर्तियों में अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए पदों में आरक्षण की व्यवस्था की जाती है किंतु आरक्षण का सही मायनों में लाभ बस्तर क्षेत्र में आदिकाल से निवासरत मूल वासियों को नहीं मिल पाता है जिन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अपने जल, जंगल एवं जमीन की कुर्बानी दी है। मैं केंद्र एवं राज्य सरकारों से यह निवेदन करना चाहता हूं की UPSC, PSC व्यापम एवं  NMDC की भर्ती परीक्षाओं में बस्तर क्षेत्र में आदिकाल से निवासरत मूल वासियों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की जाए। साथियों यही कारण है की  PSC, व्यापम एवं NMDC की नौकरियों में अनुसूचित जनजाति  (ST) कोटे में स्थानीय मूल वासियों का अनुपात बहुत ही कम है तथा इसका लाभ प्रदेश के अन्य हिस्सों में रहने वाले आदिवासी भाइयों को ही मिल पा रहा है। इससे रोजगार असंतुलन की स्थिति निर्मित हो गई है जो बस्तर में आदिकाल से निवासरत मूल वासियों के असंतोष का प्रमुख कारण है।


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