छुरा (गंगा प्रकाश)। जिला गरियाबंद के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र छुरा से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। महज़ 14 वर्षीय जिज्ञासा की मौत ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया है। परिजनों ने आरोप लगाया है कि प्रशिक्षु डॉक्टर की लापरवाही और ओवरडोज दवा ही इस मौत की असली वजह है। अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर कब तक स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाहियों की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी होगी?

क्या है पूरा मामला?
वार्ड नं. 12, झूलेलाल पारा, छुरा निवासी जिज्ञासा (14 वर्ष) को 15 जुलाई 2025 की रात अचानक पेट दर्द, गैस, सीने में जलन और पीठ में तेज दर्द की शिकायत हुई। घबराए परिजन उसे रातों-रात सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र छुरा लेकर पहुँचे।
परिजनों के अनुसार, वहाँ ड्यूटी पर मौजूद प्रशिक्षु डॉक्टर अभिषेक ने मरीज को बिना गंभीरता से देखे केवल प्राथमिक इलाज दिया और रायपुर रेफर कर दिया। इस दौरान डॉक्टर ने जो दवाएँ दीं, उसे लेकर परिजनों का बड़ा आरोप है – “डॉक्टर ने ओवरडोज़ दवा दे दी, जिससे हालत और बिगड़ गई।”
16 जुलाई की रात करीब 3 बजे, जिज्ञासा को कुर्रा आयुष्मान हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
“जिज्ञासा जिंदा है” – परिजनों का रोना, डॉक्टरों के बयान में विरोधाभास
परिजन शव को लेकर गोबरा-नयापारा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुँचे। वहाँ भी डॉक्टरों ने स्पष्ट कहा कि “मौत ओवरडोज़ से हुई है, पोस्टमार्टम जरूरी है।”
परिजन पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहते थे और सीधे घर चले आए। घर पहुँचकर परिजनों का दर्द और बढ़ गया। वे बार-बार कहते रहे – “जिज्ञासा अभी जिंदा है, उसकी नस-नाड़ी चल रही है।”
इस पर स्थानीय डॉक्टर को बुलाया गया, जिसने जांच के बाद साफ कहा – “जिज्ञासा की मौत को लगभग 1 घंटा हो चुका है।”
यानी एक ही प्रकरण में अलग-अलग डॉक्टरों के विरोधाभासी बयान सामने आए।
अब उठ रहे हैं बड़े सवाल –
- क्यों प्रशिक्षु डॉक्टर ने गंभीर मरीज को बिना उचित इलाज सिर्फ रेफर कर दिया?
- क्या दवाओं का ओवरडोज़ ही मौत का कारण बना?
- आयुष्मान हॉस्पिटल और स्थानीय डॉक्टरों के बयान में इतना विरोधाभास क्यों है?
- जब तक परिजन कहते रहे कि जिज्ञासा जीवित है, तब तक स्वास्थ्य तंत्र ने स्पष्टता क्यों नहीं दी?
परिजनों का आक्रोश – “हमारी बेटी व्यर्थ न जाए”
जिज्ञासा के पिता प्रकाश कुमार यादव (पत्रकार) ने आक्रोशित होते हुए कहा – “हमारी बेटी अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसकी मौत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। एक प्रशिक्षु डॉक्टर की लापरवाही ने उसकी जान ले ली। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और भविष्य में किसी अन्य बेटी को ऐसी लापरवाही का शिकार न होना पड़े।”
जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी
इस मामले पर अब तक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र छुरा और जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि “अगर अस्पतालों में प्रशिक्षु डॉक्टरों को इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी तो आने वाले दिनों में और भी ऐसी त्रासदी सामने आ सकती है।”
जिज्ञासा की मौत सिर्फ एक बच्ची की मौत नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल है। छुरा अस्पताल की लापरवाही ने एक परिवार की हँसी-खुशी छीन ली। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर कार्रवाई करता है या इसे भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबा देता है।