Brekings : “राजिम बना मीडिया का रणक्षेत्र: रेत माफिया की गोलियों के खिलाफ गरजा पत्रकार समाज, तीन मांगें, एक चेतावनी — अब नहीं सहेंगे!”

 

राजिम/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)।राजिम बना मीडिया का रणक्षेत्र: गरियाबंद जिले में रेत माफिया के खिलाफ पत्रकारों का आक्रोश अब फूट पड़ा है। पितईबंद में रेत माफियाओं द्वारा पत्रकारों पर किए गए जानलेवा हमले के खिलाफ जिलेभर के पत्रकार एकजुट होकर आज राजिम के सुंदरलाल शर्मा चौक पर ऐतिहासिक धरने पर बैठ गए। पूरा चौराहा काले झंडों, बैनरों और ‘अब नहीं सहेंगे’ जैसे गगनभेदी नारों से गूंज उठा। हर आंख में रोष है, हर हाथ में न्याय की मांग। पत्रकारों का यह आंदोलन अब एक चेतावनी में बदल चुका है — यदि कार्यवाही नहीं हुई तो अगला पड़ाव राजधानी रायपुर होगा।

 माफिया की बंदूक बनाम कलम की ताकत

सोमवार के दोपहर को पितईबंद क्षेत्र में पांच पत्रकारों पर उस समय हमला हुआ जब वे अवैध रेत खनन की सच्चाई उजागर करने के लिए मौके पर पहुंचे थे। माफिया न केवल हथियारों से लैस था, बल्कि हमला भी पूर्वनियोजित और जानलेवा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक फायरिंग की गई, लाठी-डंडों से हमला हुआ और पत्रकारों की जान बचाना मुश्किल हो गया था।

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यह केवल एक हमला नहीं था — यह पत्रकारिता की आज़ादी पर हमला था, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को डराने का प्रयास था। लेकिन गरियाबंद के पत्रकार झुकने वाले नहीं। उन्होंने न केवल सड़कों पर उतरकर विरोध जताया, बल्कि तीन प्रमुख मांगों के साथ सरकार को खुली चुनौती दी।

तीन मांगें, जिन पर नहीं होगा कोई समझौता

1 हमले को हत्या के प्रयास की श्रेणी में लाया जाए:

पत्रकारों का कहना है कि यह हमला सामान्य नहीं था। यह सुनियोजित था, जिसमें हत्या की मंशा स्पष्ट थी। इसलिए मामूली धाराओं के बजाय IPC की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और Arms Act की धाराएं तत्काल जोड़ी जाएं।

2 खनिज अधिकारी रोहित साहू को तत्काल हटाया जाए:

पत्रकारों ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। बताया गया कि पत्रकारों पर हमला होते समय अधिकारी रोहित साहू को बार-बार फोन किया गया, लेकिन वे मौके पर नहीं पहुंचे। पत्रकारों को शक है कि अधिकारी की भूमिका इस पूरे माफिया नेटवर्क से जुड़ी हो सकती है। उनका निलंबन और जांच आवश्यक है।

3 जिले की सभी अवैध खदानें तत्काल बंद की जाएं:

गरियाबंद जिले में कई वर्षों से अवैध रेत खनन का कारोबार फल-फूल रहा है। पत्रकारों की रिपोर्टिंग में बार-बार यह तथ्य सामने आया कि इन खदानों पर माफिया का कब्ज़ा है और शासन-प्रशासन की आंखें बंद हैं। अब पत्रकारों की स्पष्ट मांग है — अवैध खदानें सील हों, दोषियों पर FIR हो और रेत परिवहन की निगरानी GPS ट्रैकिंग से की जाए।

धरना स्थल से लाइव रिपोर्ट: एकजुटता और चेतावनी

सुंदरलाल शर्मा चौक पर आज का दृश्य अभूतपूर्व था। गरियाबंद, राजिम, फिंगेश्वर, देवभोग, मैनपुर से लेकर अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकार भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। हाथों में तख्तियां, “पत्रकार पर हमला बंद करो”, “खनिज माफिया हटाओ”, “कलम की ताकत से डरता है माफिया” जैसे नारे लिए पत्रकारों ने शांतिपूर्ण लेकिन जोशीला आंदोलन किया।

प्रशासन की भूमिका इस विरोध के दौरान भी संदेहास्पद बनी रही। अब तक न तो कलेक्टर पहुंचे, न ही SP या अन्य वरिष्ठ अधिकारी। यह चुप्पी पत्रकारों के घाव पर नमक की तरह महसूस की जा रही है।

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राजनीतिक प्रतिक्रिया और अगला कदम

मंच से कई वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा,

“यदि एक सप्ताह के भीतर मांगें नहीं मानी गईं, तो यह लड़ाई राजधानी तक जाएगी।”

कलम चलाने वाले डरते नहीं, अब गरियाबंद की मिट्टी में नया इतिहास लिखा जाएगा।”

इस विरोध ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और गृह मंत्री विजय शर्मा के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। यदि राज्य सरकार समय रहते कार्रवाई नहीं करती, तो यह मामला न केवल प्रदेशभर में, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता का प्रश्न बन सकता है।

अब सवाल यह है:❓

क्या लोकतंत्र के प्रहरी माफिया की गोलियों से डर जाएंगे?क्या एक ईमानदार रिपोर्टर की जान की कीमत किसी अवैध ट्रैक्टर रेत से भी कम है?क्या शासन-प्रशासन अब भी चुप बैठा रहेगा?

 जनता से अपील:

पत्रकारों की इस लड़ाई में आपकी चुप्पी भी एक अपराध है। यदि आप स्वतंत्र पत्रकारिता में विश्वास करते हैं, यदि आप चाहते हैं कि सच्चाई उजागर होती रहे — तो इस लड़ाई में आवाज़ बनिए। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, कलम की ताकत को दबने न दीजिए।


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