घोर नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने ग्रामीणों से किया सीधा संवाद, बच्चों व बुजुर्गों को वितरित की गई सामग्री, सड़क–स्वास्थ्य–रोजगार के मुद्दों पर खुलकर हुई चर्चा
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ के घोर नक्सल प्रभावित अंचलों में भरोसे की नई इबारत लिखते हुए गरियाबंद पुलिस ने “संवाद” कार्यक्रम के अंतर्गत थाना मैनपुर क्षेत्र के दुर्गम ग्राम अमली एवं राजाडेरा में कम्युनिटी पुलिसिंग का विशेष आयोजन किया। इस दौरान पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर स्वयं अपनी टीम के साथ गांव पहुंचे और ग्रामीणों के बीच जमीन पर बैठकर उनकी समस्याएं सुनीं, बच्चों से बातचीत की और क्षेत्र के हालात को नजदीक से जाना।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और विकास के नए रास्ते खोलना रहा। लंबे समय तक नक्सल प्रभाव में रहे इन गांवों में पुलिस की यह उपस्थिति ग्रामीणों के लिए एक भावनात्मक और आश्वस्त करने वाला पल साबित हुई।

बच्चों के चेहरे पर मुस्कान, बुजुर्गों को मिला सहारा
संवाद कार्यक्रम के दौरान ग्राम अमली एवं राजाडेरा के बच्चों से उनकी पढ़ाई-लिखाई को लेकर विस्तार से चर्चा की गई। पुलिस अधीक्षक ने बच्चों से उनके स्कूल, विषयों और भविष्य के सपनों के बारे में सवाल किए। अभिभावकों को बच्चों को नियमित स्कूल भेजने और बेहतर शिक्षा देने के लिए प्रेरित किया गया।
इस अवसर पर बच्चों को स्कूल बैग, कॉपी-किताब, अन्य पाठ्य सामग्री, चप्पल एवं कंबल वितरित किए गए। वहीं बुजुर्गों को लूंगी, महिलाओं को साड़ी और जरूरतमंदों को उपयोगी वस्तुएं प्रदान की गईं। सामग्री पाकर बच्चों के चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी और बुजुर्गों ने पुलिस टीम के प्रति आभार जताया।
नक्सल प्रभाव घटा, शांति का माहौल – ग्रामीणों का बयान
ग्रामीणों से बातचीत के दौरान नक्सलवाद के प्रभाव और वर्तमान हालात पर भी खुलकर चर्चा हुई। ग्रामीणों ने बताया कि क्षेत्र में पहले की तुलना में नक्सल गतिविधियों का प्रभाव काफी कम हुआ है और अब गांवों में धीरे-धीरे शांति का वातावरण बन रहा है। लोगों ने यह भी कहा कि पुलिस की लगातार उपस्थिति और प्रशासनिक प्रयासों से वे खुद को पहले से अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने ग्रामीणों से अपील की कि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी बिना डर पुलिस तक पहुंचाएं और विकास की मुख्यधारा से जुड़ने में सहयोग करें।

सड़क और स्वास्थ्य बनी सबसे बड़ी चिंता
ग्रामीणों ने बातचीत में अपनी गंभीर समस्याएं भी सामने रखीं। उन्होंने बताया कि छोटी-मोटी बीमारी के इलाज के लिए भी उन्हें कई किलोमीटर दूर मैनपुर जाना पड़ता है। पक्की सड़क नहीं होने के कारण विशेषकर बरसात के दिनों में अस्पताल तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है। कई बार मरीजों को चारपाई या कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ता है, जिससे स्थिति और भी भयावह हो जाती है।
ग्रामीणों ने मांग की कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा और सड़क संपर्क को प्राथमिकता दी जाए, ताकि उन्हें बुनियादी इलाज के लिए जान जोखिम में न डालनी पड़े।
बांस शिल्प है हुनर, पर बाजार नहीं
इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में बांस शिल्पकार निवास करते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि वे परंपरागत रूप से बांस से टोकरी, सूप, चटाई और अन्य घरेलू सामग्री बनाते हैं, लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सड़क सुविधा के अभाव में बड़े बाजारों तक पहुंच नहीं हो पाती। नतीजतन उन्हें अपने उत्पाद बेहद कम दामों में स्थानीय स्तर पर बेचने पड़ते हैं, जिससे उनका व्यवसाय लाभदायक नहीं रह गया है।
ग्रामीणों ने उम्मीद जताई कि यदि परिवहन सुविधा और बाजार से जुड़ाव बढ़े, तो उनका हुनर ही उनकी आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
समस्याएं शासन तक पहुंचाने का आश्वासन
ग्रामीणों की बातों को गंभीरता से सुनते हुए पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने आश्वासन दिया कि सड़क, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी सभी समस्याओं को संबंधित विभागों और अधिकारियों तक शीघ्र पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि नक्सल मुक्त होते जा रहे क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए पुलिस हर संभव सहयोग करेगी।
उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक शासन की योजनाएं और सुरक्षा का भरोसा पहुंचाना भी उसका दायित्व है।
कम्युनिटी पुलिसिंग की मजबूत पहल
संवाद कार्यक्रम के माध्यम से गरियाबंद पुलिस ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि नक्सल प्रभावित इलाकों में अब बंदूक नहीं, बल्कि बातचीत, विश्वास और विकास की राह आगे बढ़ेगी। अमली और राजाडेरा जैसे गांवों में इस तरह के आयोजन न केवल नक्सल प्रभाव को कमजोर करते हैं, बल्कि ग्रामीणों को मुख्यधारा से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम के अंत में ग्रामीणों ने पुलिस टीम का आभार व्यक्त किया और उम्मीद जताई कि यह संवाद भविष्य में भी जारी रहेगा।
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