गरियाबंद में फोर-लेन सड़क निर्माण के नाम पर नियमों की अनदेखी, हरे-भरे पेड़ों की कटाई पर गंभीर सवाल
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-130 सी पर गरियाबंद–मजरकटा–केशोडार–डोंगरीगांव मार्ग के शहरी क्षेत्र में प्रस्तावित फोर-लेन सड़क चौड़ीकरण कार्य अब पर्यावरणीय और प्रशासनिक विवादों में घिरता नजर आ रहा है। सड़क निर्माण के दौरान बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों की कटाई किए जाने से नगर में आक्रोश और चर्चाओं का माहौल है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने वन विभाग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, लेकिन वन विभाग के जवाब ने संदेह को कम करने के बजाय और गहरा कर दिया है।

जिला प्रशासन को दिया गया जवाब
वन विभाग की ओर से भेजे गए स्पष्टीकरण में कहा गया है कि सम्पूर्ण कटाई प्रक्रिया नियमों और अनुमतियों के दायरे में की जा रही है। वनमंडलाधिकारी द्वारा अवगत कराया गया कि अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) गरियाबंद द्वारा कुल 307 वृक्षों की कटाई की विधिवत अनुमति प्रदान की गई है। अनुमति मिलने के बाद पेड़ों की मार्किंग कराई गई और फिर कटाई कार्य शुरू किया गया।
जवाब में यह भी उल्लेख किया गया कि निर्माण कार्य के दौरान कुछ समीपवर्ती वृक्षों से तकनीकी कारणों एवं सुरक्षा की दृष्टि से क्षति की आशंका उत्पन्न हो गई थी, इसलिए उन्हें भी हटाना आवश्यक हो गया।
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जमीनी हकीकत ने खड़े किए सवाल
वन विभाग के इस जवाब के विपरीत, जमीनी स्थिति कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार जिन चार बड़े हरे-भरे पेड़ों को काटा गया, वे सड़क निर्माण स्थल से लगभग 40 फीट दूर स्थित थे। ये पेड़ न तो निर्माण सीमा के भीतर बताए जा रहे हैं और न ही किसी प्रकार के तत्काल खतरे की स्थिति में थे। इसके बावजूद उनका कट जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि नियमों को ताक पर रखकर कार्रवाई की गई।
नियमों के अनुसार किसी भी पेड़ को काटने से पहले उसकी स्थिति, अनिवार्यता, वैकल्पिक उपाय और प्रतिपूरक पौधारोपण जैसी शर्तों का स्पष्ट परीक्षण जरूरी होता है। लेकिन यहां बिना ठोस कारण बताए पूर्ण विकसित और हरे-भरे पेड़ों को काट दिया गया।

सूखे पेड़ खड़े, हरे पेड़ कटे
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शहर और सड़क किनारे कई सूखे और जर्जर पेड़ आज भी खड़े हैं, जो हल्की हवा में गिरकर कभी भी जान-माल का नुकसान कर सकते हैं। ऐसे संभावित खतरनाक पेड़ों को हटाने की दिशा में कोई गंभीर पहल नहीं की गई, जबकि स्वस्थ और हरियाली से भरपूर पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला दी गई। यह विरोधाभास विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दबाव में कटाई का आरोप
मामले को और अधिक संवेदनशील बनाता है परिक्षेत्र अधिकारी का वह कथित बयान, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि एक जनप्रतिनिधि के दबाव में उक्त पेड़ों की कटाई कराई गई। हालांकि उन्होंने उस जनप्रतिनिधि का नाम सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया। यदि यह कथन सही है, तो यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव और संभावित मिलीभगत की ओर भी संकेत करता है।
नगरवासियों में आक्रोश, जांच की मांग
नगरवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में इस कटाई को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जिन पेड़ों को काटा गया, वे वर्षों से शहर की हरियाली, पर्यावरण संतुलन और सौंदर्य का हिस्सा थे। सड़क निर्माण जैसे विकास कार्यों में पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, लेकिन यहां विकास की आड़ में प्रकृति के साथ मनमानी की गई।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि 307 पेड़ों की अनुमति दी भी गई थी, तो उसकी आड़ में तय सीमा से बाहर जाकर कटाई करना गंभीर अनियमितता है। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच, दोषियों पर कार्रवाई और अवैध रूप से काटे गए पेड़ों के बदले बड़े पैमाने पर पौधारोपण की मांग की है।
प्रशासन की भूमिका पर निगाहें
फिलहाल सड़क निर्माण की आड़ में हुई इस कथित अवैध कटाई को लेकर पूरे गरियाबंद में चर्चा तेज है। आम नागरिकों से लेकर जागरूक वर्ग तक यह सवाल उठा रहा है कि क्या जिला प्रशासन केवल फाइलों में दिए गए जवाबों से संतुष्ट होगा या जमीनी सच्चाई सामने लाकर जिम्मेदार अधिकारियों और दबाव बनाने वालों पर ठोस कार्रवाई करेगा। पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक पारदर्शिता के लिहाज से यह मामला अब एक बड़ी कसौटी बन चुका है।

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