- बंधक कांड: गरियाबंद बॉर्डर से सटे ओडिशा के ‘मां भंडारणी क्लिनिक’ में 6 दिनों तक कैद रहा पीड़ित परिवार।
- वजह: डिलीवरी के 20 हजार के बिल में से 15 हजार रुपये बकाया होने पर अस्पताल प्रबंधन ने बरती बेरहमी।
- रिहाई: मीडिया के हस्तक्षेप और पत्रकारों के पहुंचने के बाद संचालक ने आनन-फानन में एंबुलेंस से घर भेजा।
गरियाबंद/धर्मगढ़ — छत्तीसगढ़ और ओडिशा की सीमा पर स्थित एक निजी अस्पताल से संवेदनहीनता की पराकाष्ठा सामने आई है। गरियाबंद जिले के मैनपुर की रहने वाली एक आदिवासी महिला और उसके दो मासूम बच्चों को महज 15 हजार रुपये के बकाया बिल के लिए 6 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया। पीड़ित परिवार विशेष पिछड़ी जनजाति ‘भुजिया’ समुदाय से ताल्लुक रखता है।
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डिलीवरी के बाद शुरू हुआ शोषण का खेल
मैनपुर निवासी नवीना चींदा (23 वर्ष) को लेबर पेन होने पर परिजनों ने धर्मगढ़ स्थित ‘मां भंडारणी क्लिनिक’ में भर्ती कराया था। अस्पताल में नवीना की नॉर्मल डिलीवरी हुई, जिसके बाद प्रबंधन ने 20,000 रुपये का बिल थमा दिया। गरीब परिवार केवल 5,000 रुपये ही जमा कर पाया। परिजनों ने हाथ-पैर जोड़कर बाकी के 15,000 रुपये बाद में देने की मोहलत मांगी, लेकिन अस्पताल टस से मस नहीं हुआ।
- बुजुर्ग सास पहुंची गांव: पैसों का इंतजाम करने के लिए पीड़िता की सास अपनी बहू और बच्चों को अस्पताल में छोड़कर गांव वापस लौटी, ताकि कर्ज मांग सके।
- तीन साल का मासूम भी कैद: अस्पताल प्रबंधन ने न केवल प्रसूता और नवजात, बल्कि उसके साथ आए 3 साल के बड़े बेटे को भी बाहर नहीं जाने दिया।
मीडिया के पहुंचते ही बदले अस्पताल के सुर
जब यह मामला स्थानीय मीडिया के संज्ञान में आया और पत्रकारों की टीम अस्पताल पहुंची, तो संचालक चैतन्य मेहेर के हाथ-पांव फूल गए। कैमरे के सामने सफाई देते हुए संचालक ने कहा कि अगर परिवार ने परेशानी बताई होती तो वे पहले ही जाने देते। हालांकि, हकीकत यह थी कि 6 दिनों से परिवार वहां गिड़गिड़ा रहा था।
“संचालक ने पत्रकारों के सवाल सुनते ही कैमरा बंद करवाने की कोशिश की और आनन-फानन में एंबुलेंस बुलाकर मां और दोनों बच्चों को उनके गांव रवाना किया।”
— मौके पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी
सवालों के घेरे में स्वास्थ्य व्यवस्था
यह घटना सीमावर्ती इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चल रही ‘वसूली’ की पोल खोलती है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद और ओडिशा के कालाहांडी जिले के बीच हजारों लोग इलाज के लिए इधर-उधर भटकते हैं, जिसका फायदा निजी क्लिनिक उठाते हैं। फिलहाल, पीड़ित परिवार सुरक्षित अपने गांव पहुंच गया है, लेकिन इस अमानवीय व्यवहार ने स्वास्थ्य महकमे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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