छुरा–राजिम मार्ग पर कथित उत्खनन को लेकर उठे सवाल, पंचायत की अनुमति से लेकर खनिज स्वीकृति और रॉयल्टी तक की जांच की मांग
छुरा (गंगा प्रकाश)। सड़क चौड़ीकरण का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसी विकास कार्य के बीच मुरम की खुदाई को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर सड़क निर्माण में इस्तेमाल हो रही मुरम कहां से आ रही है? जिन स्थानों पर खुदाई की चर्चा है, वहां उत्खनन की वैध अनुमति है या नहीं? और यदि मशीनों से बड़े पैमाने पर मुरम निकाली जा रही है, तो इसकी निगरानी कौन कर रहा है?
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि छुरा–राजिम सड़क चौड़ीकरण के नाम पर चैन माउंटेन मशीनों और हाइवा वाहनों के माध्यम से मुरम का उत्खनन किया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि कुछ स्थानों पर ग्राम पंचायतों से अनुमति लेकर खुदाई कराई जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन अभी आवश्यक है।

अनुमति की आड़ में कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं?
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि ग्राम पंचायत से मिली अनुमति और खनिज उत्खनन के लिए आवश्यक वैधानिक स्वीकृति एक ही बात नहीं हैं। भूमि की प्रकृति और लागू नियमों के अनुसार सक्षम प्राधिकारी की अनुमति, निर्धारित शर्तों का पालन तथा रॉयल्टी संबंधी प्रावधानों की पूर्ति जरूरी हो सकती है।
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ऐसे में यह जानना जरूरी है कि संबंधित उत्खनन स्थलों के लिए कौन-सी अनुमति जारी की गई है, कितनी मात्रा में मुरम निकालने की स्वीकृति है और निर्माण कार्य में उपयोग की जा रही सामग्री का हिसाब विभागीय अभिलेखों से मेल खाता है या नहीं।

मशीनें चलने की चर्चा, विभागीय निगरानी कहां?
यदि दिन-रात खुदाई किए जाने के आरोप सही हैं, तो खनिज विभाग की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या अधिकारियों ने संबंधित स्थलों का निरीक्षण किया? क्या मुरम की मात्रा, रॉयल्टी भुगतान और परिवहन दस्तावेजों की जांच हुई? यदि जांच की गई है, तो उसका निष्कर्ष क्या है?
राजस्व विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संबंधित भूमि की स्थिति और वहां खुदाई की वैधानिकता का सत्यापन कर प्रशासन को वास्तविक स्थिति सामने लानी चाहिए।
विकास कार्य जरूरी, लेकिन नियमों का पालन भी अनिवार्य
छुरा–राजिम सड़क चौड़ीकरण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन विकास कार्यों के साथ पारदर्शिता और नियमों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। निर्माण सामग्री वैध स्रोत से प्राप्त की जा रही है तो संबंधित दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं, यदि जांच में बिना आवश्यक अनुमति उत्खनन या रॉयल्टी संबंधी अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
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अब निगाहें जिला प्रशासन और खनिज विभाग पर टिकी हैं। क्या संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचकर जांच करेंगे? क्या पंचायत से लेकर खनिज विभाग तक जारी अनुमतियों की पड़ताल होगी? या फिर सड़क निर्माण के बीच उठ रहे ये सवाल जवाब का इंतजार करते रहेंगे?
फिलहाल असली तस्वीर जांच के बाद ही साफ होगी। लेकिन सवाल बरकरार है—सड़क निर्माण के लिए मुरम की जरूरत तो समझ में आती है, पर उस मुरम के स्रोत, अनुमति और रॉयल्टी का हिसाब कौन सामने रखेगा?





