मणिकंचन केंद्र से निकलने वाले अपशिष्ट को वन क्षेत्र में फेंके जाने का आरोप, तिलईदादर बीट में गंदगी का पहाड़; नगर पंचायत सीएमओ और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर उठे सवाल, वन विभाग की समझाइश के बाद भी स्थायी समाधान का इंतजार
छुरा (गंगा प्रकाश)। नगर की सड़कों को साफ दिखाने की कवायद यदि शहर से लगे जंगल को कचरे के ढेर में तब्दील कर दे, तो स्वच्छता के दावों की असलियत पर सवाल उठना लाजिमी है। गरियाबंद जिले के पाण्डुका वन परिक्षेत्र अंतर्गत तिलईदादर बीट के कक्ष क्रमांक 101 से सामने आई तस्वीरें छुरा नगर पंचायत की कचरा प्रबंधन व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। वन क्षेत्र में फैले प्लास्टिक, पॉलीथिन, घरेलू अपशिष्ट और अन्य अनुपयोगी सामग्री के विशाल ढेर देखकर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर नगर को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी संभालने वाली व्यवस्था पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति कितनी गंभीर है? आरोप है कि नगर पंचायत छुरा के सफाई कार्य से निकलने वाले कचरे को जंगल में लाकर डाला जा रहा है। यदि यह स्थिति लगातार बनी हुई है, तो इसका खामियाजा वन संपदा, वन्यजीवों और आसपास के रहवासियों को भुगतना पड़ सकता है।
जानकारी के अनुसार, नगर पंचायत के सफाईकर्मी घर-घर से गीला एवं सूखा कचरा एकत्र करते हैं। इसके बाद वाहनों के माध्यम से अपशिष्ट को नगर में संचालित मणिकंचन केंद्र तक पहुंचाया जाता है। वहां छंटाई की प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात शेष बचने वाले कचरे को शहर से लगे वन क्षेत्र में फेंके जाने की बात सामने आई है। मौके पर मौजूद गंदगी के विस्तृत फैलाव और कचरे से भरे भूभाग की तस्वीरें इस समस्या की भयावहता को उजागर करती हैं। हालांकि, किस अधिकारी के निर्देश पर, कितनी मात्रा में और कितने समय से यहां अपशिष्ट डाला जा रहा है, इसकी आधिकारिक पुष्टि तथा जांच आवश्यक है।
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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिस जंगल को प्राकृतिक संपदा, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन का आधार माना जाता है, वही अब कचरा निस्तारण का ठिकाना बनता नजर आ रहा है। खुले में बिखरे प्लास्टिक एवं अन्य अपशिष्ट मिट्टी और आसपास के प्राकृतिक परिवेश को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बारिश के दौरान कचरे से निकलने वाले दूषित तत्व बहकर दूसरे हिस्सों तक पहुंचने की आशंका भी बनी रहती है। खाद्य पदार्थों के अवशेषों की तलाश में पहुंचने वाले मवेशियों के लिए भी यह स्थान जोखिम भरा हो सकता है। तस्वीरों में गायों को कचरे के बीच विचरण करते देखा जा सकता है। प्लास्टिक निगलने की स्थिति में पशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कचरे के ढेर से उठती दुर्गंध और धुएं का दृश्य भी चिंता बढ़ाने वाला है। तस्वीरों में कचरा वाहन के समीप धुआं उठता दिखाई दे रहा है, हालांकि इसके स्रोत और आग लगने के कारण की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि अपशिष्ट जलाया जा रहा है, तो उससे निकलने वाला धुआं आसपास के वातावरण को दूषित कर सकता है। मच्छर, मक्खियों और दूसरे हानिकारक जीवों के पनपने के अनुकूल परिस्थितियां बनने से जनस्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ सकते हैं। जंगल के समीप से गुजरने वाले राहगीरों को दुर्गंध के चलते आवागमन में कठिनाई होने की बात कही जा रही है।

वन विभाग की समझाइश, फिर भी समाधान कहां?
इस प्रकरण में वन विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि नगर पंचायत के संबंधित जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को कई बार मौखिक रूप से अवगत कराया जा चुका है। उनसे शहर के अपशिष्ट के निपटान हेतु उपयुक्त स्थल की व्यवस्था करने की बात कही गई, लेकिन समस्या का स्थायी निराकरण अब तक नहीं होने की बात सामने आ रही है। यदि संबंधित विभाग को पहले से जानकारी थी, तो इस विषय पर अब तक ठोस पहल क्यों नहीं हुई? क्या केवल समझाइश देकर जिम्मेदारी पूरी मान ली गई, अथवा इस दिशा में कोई लिखित कार्रवाई भी की गई है? इन बिंदुओं पर प्रशासनिक जवाब आवश्यक है।

सीएमओ और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर सवाल
नगर पंचायत के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) से यह अपेक्षा की जाती है कि निकाय की स्वच्छता व्यवस्था, कचरा संग्रहण, पृथक्करण तथा अंतिम निस्तारण की प्रक्रिया नियमानुसार संचालित हो। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मणिकंचन केंद्र से निकलने वाले अवशिष्ट के सुरक्षित निपटान की अधिकृत व्यवस्था क्या है? यदि वन क्षेत्र में कचरा पहुंच रहा है, तो उसके परिवहन, निगरानी और रोकथाम के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या कचरा उठाने वाले वाहनों की आवाजाही का रिकॉर्ड, केंद्र का निरीक्षण रजिस्टर और निस्तारण संबंधी दस्तावेजों की जांच की जाएगी?
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नगर पंचायत के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। नागरिकों से स्वच्छता की अपेक्षा करने वाले जिम्मेदार प्रतिनिधियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक धन से संचालित सफाई अभियान किसी अन्य क्षेत्र के लिए पर्यावरणीय संकट न बने। शहर की स्वच्छता केवल सड़कों पर झाड़ू लगवाने, कचरा वाहन चलाने अथवा सफाई के प्रचार तक सीमित नहीं हो सकती। वास्तविक कसौटी यह है कि घरों से उठाया गया अपशिष्ट आखिरकार जाता कहां है और उसका अंतिम निस्तारण किस तरीके से होता है। इस विषय पर नगर पंचायत नेतृत्व की चुप्पी या अस्पष्टता नागरिकों की चिंता को और बढ़ा सकती है।

अब कार्रवाई की बारी किसकी?
इस मामले में प्रशासन, नगर पंचायत और वन विभाग के बीच समन्वय स्थापित कर तत्काल स्थल निरीक्षण, कचरा डंपिंग की जांच, जिम्मेदारी निर्धारण तथा नियमानुसार कार्रवाई की आवश्यकता है। वनभूमि में अपशिष्ट डालने की पुष्टि होने पर संबंधित नियमों के अंतर्गत कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, जमा कचरे का सुरक्षित निष्पादन, प्रभावित स्थल की सफाई, भविष्य में रोकथाम और नियमित निगरानी की व्यवस्था भी जरूरी है। नगर पंचायत को कचरे के पृथक्करण, पुनर्चक्रण तथा शेष अवशिष्ट के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए व्यावहारिक योजना सार्वजनिक करनी चाहिए।
अब देखना यह है कि छुरा नगर पंचायत के सीएमओ और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मुद्दे पर जवाबदेही स्वीकार कर समाधान की पहल करते हैं या तिलईदादर बीट का कक्ष क्रमांक 101 यूं ही गंदगी का बोझ उठाता रहेगा। शहर की स्वच्छता के नाम पर जंगल की बर्बादी किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकती।




