CG news: कुटेशर नगोई पंचायत में 15वें वित्त आयोग की राशि में करोड़ों के भ्रष्टाचार की बानगी: मुरुमीकरण के नाम पर 2.20 लाख की बंदरबांट, अफसरों की मिलीभगत से हुआ लूट का खेल!
कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा(गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ की ग्राम पंचायतों में किस हद तक भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा ली हैं, इसकी एक झलक पोड़ी उपरोड़ा विकासखंड की ग्राम पंचायत कुटेशर नगोई से सामने आए ताजा मामले में देखने को मिली है। यहां पंचायत प्रतिनिधियों और अधिकारियों की मिलीभगत से 15वें वित्त आयोग से प्राप्त राशि का नियम विरुद्ध ढंग से उपयोग करते हुए लाखों रुपये का गबन किया गया। विकास के नाम पर जारी की गई राशि किस तरह निजी स्वार्थ के लिए ठिकाने लगाई गई, इसकी परतें एक-एक कर खुल रही हैं।
फर्जी कार्य और झूठा भुगतान – कैसे खेला गया 2.20 लाख का खेल?
जानकारी के मुताबिक, ग्राम पंचायत कुटेशर नगोई की तत्कालीन सरपंच श्रीमती अनीता ओड़े और पंचायत सचिव जयरतन कंवर ने मिलकर 15वें वित्त आयोग की केंद्रीय सहायता मद से “अमलडीहा से कुटेशर नगोई तक पहुँच मार्ग के मुरुमीकरण” के नाम पर फर्जी तरीके से कुल 2 लाख 19 हजार 978 रुपए का आहरण किया। 22 नवंबर 2022 को 88,000 रुपए और 6 जनवरी 2023 को 1,31,978 रुपए की राशि भुगतान की गई, जबकि इस मार्ग पर मुरुमीकरण कार्य वास्तविकता में हुआ ही नहीं।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह मार्ग लगभग पांच वर्ष पूर्व मनरेगा योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायत अमलडीहा द्वारा निर्मित किया गया था, और उसके बाद से इस पर किसी भी प्रकार का मुरुमीकरण या मरम्मत कार्य पंचायत कुटेशर नगोई द्वारा नहीं कराया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह फर्जी भुगतान किस आधार पर किया गया?

15वें वित्त आयोग के दिशा-निर्देशों की खुली धज्जियाँ
सरकार द्वारा 15वें वित्त आयोग की राशि का उपयोग तय नियमों और गाइडलाइन के अंतर्गत किया जाना अनिवार्य है। इसके तहत मिलने वाली राशि का उपयोग 60:40 के अनुपात में स्वच्छता, शिक्षा, और अधोसंरचना जैसे क्षेत्रों में किया जाना है। मुरुमीकरण जैसे कार्य इस योजना के तहत शामिल ही नहीं हैं। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने भुगतान को मंजूरी देकर न सिर्फ नियमों को दरकिनार किया बल्कि खुद को भ्रष्टाचार के घेरे में भी खड़ा कर लिया।
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तकनीकी स्वीकृति और जियो टैग से बचने के लिए तोड़ निकाल लिया भ्रष्टाचारियों ने!
सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि किसी भी कार्य के लिए 50,000 रुपये से अधिक की राशि आहरण की जानी है, तो उसके लिए तकनीकी स्वीकृति और जियो टैगिंग अनिवार्य होती है। लेकिन इस बाध्यता से बचने के लिए सरपंच और सचिव ने राशि को दो हिस्सों में विभाजित कर लिया — एक 88,000 और दूसरा 1.31 लाख — और दोनों बार नियमों की अनदेखी करते हुए भुगतान पास करवा लिया गया। यह एक योजनाबद्ध साजिश को दर्शाता है, जहां सरकारी पोर्टल पर फर्जी कार्य दर्ज कर रकम को हड़प लिया गया।

जनपद अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल
इस फर्जीवाड़े की सबसे गंभीर बात यह है कि संबंधित जनपद अधिकारियों ने बिना जांच किए इस अवैध कार्य पर भुगतान की स्वीकृति दे दी। यह न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि भ्रष्टाचार में उनकी संलिप्तता की ओर भी संकेत करता है। क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर एक सुनियोजित भ्रष्टाचार का हिस्सा?
क्या यह मामला सिर्फ एक पंचायत का है?
यदि इस तरह के मामलों की व्यापक जांच की जाए तो पूरे जिले में 15वें वित्त आयोग से प्राप्त राशि के उपयोग में करोड़ों का गबन सामने आ सकता है। क्योंकि यही तरीका अपनाकर कई पंचायतें 50,000 की सीमा से नीचे रहकर बिना तकनीकी अनुमोदन के फर्जी भुगतान दिखा रही हैं।
अब सवाल यह है कि जांच करेगा कौन?
आज जरूरत है कि इस तरह के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए, ताकि दोषियों को सजा मिले और जनता की गाढ़ी कमाई से आए पैसे का सही उपयोग हो सके। स्थानीय प्रशासन, जिला कलेक्टर, एवं लोकायुक्त जैसे संस्थानों को इस पर संज्ञान लेना चाहिए। साथ ही आम जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी जागरूक होकर इस मामले को आगे बढ़ाना चाहिए।
क्या आप भी चाहते हैं कि इस मामले की जड़ तक जाया जाए?
तो आइए, आरटीआई लगाकर सच सामने लाएं, जनहित याचिका दायर करें, और लोकतंत्र की नींव — ग्राम पंचायत — को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की दिशा में पहला कदम बढ़ाएं।

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