Cgnews: सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति की खुली पोल: चाकाबुड़ा पंचायत में लाखों की लूट, गिनती भर लाइट के नाम पर 3.21 लाख हज़म!
सचिव-सर्पंच की मिलीभगत से पंचायत को लगाया गया बड़ा चूना, ग्रामीणों ने खोला भ्रष्टाचार का काला चिट्ठा
कटघोरा/कोरबा (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत चाकाबुड़ा से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल ग्रामीण विकास योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सरकार की “भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस”नीति की भी हवा निकाल दी है। मामला है पंचायत में स्ट्रीट लाइट के नाम पर भारी भ्रष्टाचार का — जहां केवल 15-20 लाइट लगाने के बावजूद पूरे 3 लाख 21 हजार रुपए का भुगतान कर दिया गया।
चौंकाने वाली बात यह है कि यह राशि तीन अलग-अलग किस्तों में जारी की गई — 1.07 लाख की राशि 3 फरवरी, 12 फरवरी और 17 फरवरी 2021 को 15वें वित्त आयोग मद से आहरित की गई। ग्रामीणों का आरोप है कि ये लाइटें घटिया क्वालिटी की थीं जो कुछ ही हफ्तों में बंद हो गईं। वहीं सचिव और तत्कालीन सरपंच की सांठगांठ से इन योजनाओं में मनमाना फर्जी बिल प्रस्तुत कर भुगतान किया गया।
बोगस बिलिंग का भंडाफोड़: न जांच, न प्रमाण, केवल भुगतान
ग्राम पंचायत चाकाबुड़ा में वर्षों से पदस्थ सचिव रजनी सूर्यवंशी पर ग्रामीणों ने कई बार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका आरोप है कि सचिव ने पूर्व सरपंच पवन सिंह कमरों, रोजगार सहायक और तत्कालीन उपसरपंच के साथ मिलकर पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर जमकर बंदरबांट की। जिन कार्यों का जिक्र पंचायत रिकॉर्ड में किया गया है, वे आज भी जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में न पक्की सड़कें बनीं, न नालियां और न ही सफाई व्यवस्था ठीक से संचालित हुई, जबकि इन सभी मदों में लाखों रुपए स्वीकृत किए गए और आहरित भी हो गए। ये सभी घोटाले पंचायत के भीतर लंबे समय से दबे पड़े थे, लेकिन हाल ही में नवनिर्वाचित सरपंच, उपसरपंच, पंचगण और ग्रामीणों की सक्रियता से इन्हें उजागर किया गया है।

ग्रामीणों की एकजुटता ने खोल दिया घोटालों का काला पिटारा
पंचायत में व्याप्त घोटालों से आजिज आकर ग्रामीणों ने कलेक्टर कार्यालय में एक विस्तृत शिकायत दर्ज करवाई थी। इस शिकायत के आधार पर जांच हुई, और प्राथमिक तौर पर स्ट्रीट लाइट घोटाले में अनियमितता प्रमाणित भी हुई है। जांच में जियोटैगिंग का सहारा लिया गया, जिसमें पता चला कि जिन खंभों पर लाइट लगाने का दावा किया गया था, वहां कुछ जगह लाइट थी ही नहीं, और जहां लगी थी, वहां घटिया किस्म की थी।
ग्रामीणों का कहना है कि सचिव और सरपंच ने मिलकर पंचायत की मूलभूत सुविधाओं को बेचकर खुद की जेबें भरीं। यहां तक कि पंचायत भवन, आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्कूलों के मरम्मत कार्यों और नाली निर्माण तक के लिए फर्जी बिल प्रस्तुत किए गए, जबकि मौके पर कुछ भी निर्माण नहीं हुआ।
प्रशासन की उदासीनता से बढ़ा हौसला
इस घोटाले की एक बड़ी वजह जनपद पंचायत और जिला प्रशासन की निष्क्रियता भी रही। कार्यों की स्वीकृति और राशि के भुगतान तो हुए, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने धरातल पर जांच करना उचित नहीं समझा। इसका सीधा फायदा पंचायत के भ्रष्ट अधिकारियों को मिला और उन्होंने बेलगाम होकर योजनाओं की लूट मचा दी।
अब ग्रामीणों की निगाहें कार्रवाई पर टिकी
ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो, दोषियों की संपत्तियों की जांच कर उन्हें जब्त किया जाए और सस्पेंड या बर्खास्त करने जैसी सख्त कार्रवाई हो। उनका कहना है कि अगर दोषियों को सजा नहीं मिली तो यह और पंचायतों को भ्रष्टाचार के लिए प्रोत्साहित करेगा।
अंतिम सवाल: क्या “जीरो टॉलरेंस” केवल नारेबाजी है?
चाकाबुड़ा जैसे मामले ये दर्शाते हैं कि ग्राम स्तर पर हुए घोटाले अक्सर चर्चा में नहीं आते, जबकि इन्हीं योजनाओं से आम जनता को सीधे लाभ मिलना था। जब लाखों की राशि कुछ खंभों और फर्जी बिलिंग में गायब हो जाती है, तो यह सरकार की नीति और उसके क्रियान्वयन पर बड़ा सवाल है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और राज्य सरकार इस रिपोर्ट पर किस हद तक कार्रवाई करती है। क्या दोषियों को संरक्षण मिलेगा या वाकई “जीरो टॉलरेंस” नीति का पालन करते हुए जनता को न्याय मिलेगा — यह आने वाला समय बताएगा।