CG: शिक्षक ने शासकीय भवन को छोड़ा खंडहर बना कर – टीन, छप्पर उखाड़ ले गया, अब बीईओ दर-दर की ठोकरें खाने मजबूर
हाउसिंग बोर्ड में मिला निजी आवास तो उजाड़ गया आदिम जाति कल्याण विभाग का सरकारी क्वार्टर, प्रशासन मौन

छुरा/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। शिक्षक ने शासकीय भवन को छोड़ा खंडहर बना कर – गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड में एक शिक्षक द्वारा की गई सरकारी संपत्ति की खुल्लमखुल्ला बर्बादी ने न केवल सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह मामला भ्रष्ट मानसिकता और विभागीय अनदेखी का ज्वलंत उदाहरण बनकर सामने आया है।
मामला आदिम जाति कल्याण विभाग के उस शासकीय आवास से जुड़ा है, जो ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) के लिए आरक्षित था। लेकिन इस भवन पर शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल, छुरा में पदस्थ शिक्षक केशव प्रसाद साहू ने वर्षों से कब्जा कर रखा था। इस दौरान संबंधित विभाग ने न तो कभी पूछताछ की और न ही भवन वापसी की कोई प्रक्रिया अपनाई।
शिक्षक केशव प्रसाद साहू को जब हाल ही में हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में उनके नाम से आवास आवंटित हुआ, तब उन्होंने विभागीय भवन को खाली किया। परंतु खाली करने की प्रक्रिया में जो काम उन्होंने किया, वह न सिर्फ शासकीय नियमों की धज्जियां उड़ाने वाला था, बल्कि आपराधिक कृत्य के दायरे में भी आता है।
सूत्रों के मुताबिक, साहू ने शासकीय भवन की छप्पर, खपरैल, टीन, तक उखाड़ लिए और अपने नए मकान में उसे ले गया। खाली किया गया भवन अब बरसात के दिनों में खण्डहर का रूप ले चुका है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जानबूझकर भवन को उपयोग लायक स्थिति में नहीं छोड़ा गया।
बीईओ को नहीं मिला आरक्षित आवास – रोज महासमुंद से करना पड़ रहा अप-डाउन
जिस भवन को श्री साहू ने वर्षों तक कब्जे में रखा और अब खंडहर बना कर छोड़ दिया, वह मूलतः ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) के लिए आरक्षित था। बीईओ महासमुंद से प्रतिदिन मुख्यालय तक अप-डाउन करने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके नाम पर आरक्षित भवन को पहले अवैध कब्जे और अब खंडहर की शक्ल में छोड़ दिया गया है।
एक ओर जहां राज्य सरकार “हर कर्मचारी को आवास” की नीति पर कार्य कर रही है, वहीं दूसरी ओर विभागीय अधिकारियों की इस तरह की चुप्पी व अनदेखी सवालों के घेरे में है।

शासकीय संपत्ति को नुकसान – कार्रवाई की ज़रूरत
यह मामला सीधे-सीधे शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का है। छत्तीसगढ़ लोक सेवक आचरण नियम, और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत इस प्रकार की लापरवाही व संपत्ति हानि के लिए सख्त दंड का प्रावधान है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि:
“शासकीय भवन से कोई भी संरचनात्मक सामग्री जैसे टीन, खपरैल, निकालना चोरी या तोड़फोड़ की श्रेणी में आता है और इसके लिए एफआईआर दर्ज की जा सकती है। इसके साथ ही संबंधित व्यक्ति से सरकारी नुकसान की वसूली भी संभव है।”
प्रशासन की चुप्पी – क्या मिलीभगत का मामला?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब कुछ विभाग की आंखों के सामने हुआ और आज तक न तो कोई विभागीय जांच बैठाई गई और न ही कोई प्राथमिकी दर्ज हुई। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि कहीं यह पूरा मामला प्रशासनिक मिलीभगत तो नहीं है?
एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा:
“अगर आम नागरिक एक ईंट भी सरकारी ज़मीन से उठा ले तो पुलिस कार्रवाई कर देती है, लेकिन यहां एक शिक्षक ने पूरा भवन उघाड़ लिया और कोई पूछने वाला नहीं। इससे बड़ा प्रशासनिक मज़ाक और क्या हो सकता है?”
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जनता और जनप्रतिनिधियों से उठी कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों, अभिभावकों और कई जनप्रतिनिधियों ने इस पूरे प्रकरण में उच्चस्तरीय जांच और संबंधित शिक्षक पर सख्त विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की मांग की है। यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला विभागीय भ्रष्टाचार और शासकीय लापरवाही के बड़े उदाहरणों में शामिल होगा।
शिक्षक जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह की हरकत न केवल सरकारी संपत्ति की बर्बादी है, बल्कि यह व्यवस्था और भरोसे पर भी चोट है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि प्रशासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करे और दोषियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करे, ताकि शासकीय संपत्ति की सुरक्षा और नियमों की मर्यादा बनी रहे।

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