50 लाख की सड़क एक साल में तबाह, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा विकास
ठेकेदार–अफसरों की मिलीभगत से सड़क पर गड्ढे, ग्रामीण परेशान – माओवादियों को मिल सकता है फायदा
यदिन्द्रन नायर
बीजापुर (गंगा प्रकाश)। 50 लाख की सड़क एक साल में तबाह : बीजापुर ज़िले में विकास के नाम पर खर्च हुए करोड़ों रुपये एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। विशेष केंद्रीय सहायता (SCA) योजना के तहत हिरौली से कावडगांव तक 50 लाख रुपये की लागत से बनाई गई करीब 2 किलोमीटर लंबी सड़क महज़ एक साल के भीतर ही ध्वस्त हो गई। सड़क पर जगह-जगह गड्ढे बन गए हैं, डामर उखड़कर उखाड़-पछाड़ हो गया है और ग्रामीणों की आवाजाही मुश्किल हो गई है।

सड़क बनी गड्ढों का जाल
जिस सड़क को ग्रामीणों के लिए विकास का रास्ता बताया गया था, वही अब गड्ढों का जाल बनकर खड़ी है।
गांव के बुजुर्ग कहते हैं – “पिछले साल जब सड़क बनी तो हमें लगा कि अब सफर आसान हो जाएगा। लेकिन यह सड़क तो 12 महीने भी नहीं टिक पाई। अब हालत यह है कि बैलगाड़ी तक ले जाना मुश्किल हो गया है। पैदल चलना भी जोखिम भरा हो गया है।”
महिलाओं का कहना है कि खराब सड़क के कारण बीमार लोगों को अस्पताल तक पहुंचाना बड़ा संकट बन चुका है। कई बार गर्भवती महिलाओं को 5–6 किलोमीटर तक पैदल चलकर मुख्य मार्ग तक पहुंचाना पड़ता है।
ठेकेदार–अफसर की मिलीभगत से घटिया निर्माण
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार खुलकर हुआ है। ठेकेदार ने घटिया मटेरियल का इस्तेमाल किया और PWD अधिकारियों ने आंख मूंदकर भुगतान कर दिया।
गांव के एक युवा ने बताया – “अगर 50 लाख रुपये सचमुच सड़क में लगे होते तो यह हाल नहीं होता। यह सड़क तो पहली बारिश में ही खराब हो गई थी। लगता है आधा पैसा जेब में और आधा सड़क पर डाला गया है।”
जवानों और ग्रामीणों दोनों के लिए खतरा
यह मार्ग सिर्फ ग्रामीणों का ही नहीं बल्कि जवानों की आवाजाही का भी प्रमुख रास्ता है। बीजापुर क्षेत्र माओवादी गतिविधियों के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
सुरक्षा जानकारों का कहना है कि खराब सड़कें अक्सर माओवादियों को आईईडी ब्लास्ट करने का मौका देती हैं। क्योंकि गड्ढों और टूटी सड़कों पर विस्फोटक लगाना आसान हो जाता है।
स्थानीय ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि अगर समय रहते इस सड़क की मरम्मत नहीं की गई तो माओवादी इसका भरपूर फायदा उठा सकते हैं और कभी भी जवानों या आम लोगों को निशाना बना सकते हैं।
प्रशासन की चुप्पी सवालों के घेरे में
ग्रामीणों ने कई बार अधिकारियों और नेताओं को इसकी शिकायत दी है लेकिन अब तक किसी ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया।
“सड़क बनने के बाद लोकार्पण हुआ, फोटो खिंचवाई गई और उसके बाद किसी ने पलटकर नहीं देखा। अब जब सड़क टूट गई है तो सब चुप हैं,” ग्रामीण मीना आत्राम ने तंज कसा।
जिला प्रशासन की ओर से अभी तक इस मामले में कोई ठोस बयान नहीं आया है। हालांकि अंदरखाने की चर्चाओं में यह ज़रूर कहा जा रहा है कि अगर गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट निकाली जाए तो कई अफसरों और ठेकेदारों की गर्दन फंस सकती है।
सवालों के घेरे में विकास मॉडल
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वाकई सरकारी योजनाओं के पैसे विकास पर खर्च हो रहे हैं या फिर भ्रष्टाचारियों की जेब भरने में। 50 लाख रुपये कोई मामूली रकम नहीं होती। इससे ग्रामीणों की कई ज़रूरतें पूरी हो सकती थीं, लेकिन नतीजा सिर्फ गड्ढे और परेशानी निकला।
ग्रामीणों की चेतावनी
ग्रामीण अब चेतावनी दे रहे हैं कि अगर प्रशासन ने इस मामले में ठोस कार्रवाई नहीं की तो वे आंदोलन करेंगे।
“हमारे बच्चों की जान रोज़ खतरे में है। जवानों का भी सफर सुरक्षित नहीं है। अगर सरकार और प्रशासन चुप बैठा रहा तो हम चुप नहीं बैठेंगे,” ग्रामीणों ने कहा।
ज़िम्मेदार कौन?
- आखिर 50 लाख की सड़क एक साल में क्यों ध्वस्त हो गई?
- क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच हुई थी?
- PWD ने भुगतान कैसे पास किया?
- ठेकेदार और अफसरों पर कार्रवाई कब होगी?
हिरौली–कावडगांव मार्ग पर ध्वस्त सड़क सिर्फ एक निर्माण की नाकामी नहीं, बल्कि सिस्टम की पोल खोलने वाली कहानी है। भ्रष्टाचार के चलते ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ रहा है और जवानों की सुरक्षा भी खतरे में है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस पर सख्ती दिखाता है या फिर यह मामला भी फाइलों और चुप्पी की परतों में दबा दिया जाएगा।