फुलझर, सरकड़ा और कुरूद पंचायत में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा — फर्जी बिलिंग से लाखों की निकासी, शिकायत के बाद भी विभाग चुप
छुरा (गंगा प्रकाश)। “मेरी पंचायत” ऐप से खुला भ्रष्टाचार का काला खेल — देश की संसद में जब भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की कवायद तेज हो रही है और गृहमंत्री “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” के नारे को कानून का रूप देने की तैयारी कर रहे हैं, उसी समय छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल गरियाबंद जिले के छुरा ब्लॉक की पंचायतें भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा बनी हुई हैं।
ग्राम पंचायत फुलझर, सरकड़ा और कुरूद के सचिवों और सरपंचों की करतूतें अब “मेरी पंचायत” मोबाइल ऐप के जरिए खुलकर सामने आ रही हैं। यह ऐप शासन ने पारदर्शिता लाने के लिए बनाया था, लेकिन अब यही ऐप बता रहा है कि किस तरह विकास की राशि को सचिव–सरपंच और चुनिंदा व्यापारी मिलकर गबन कर रहे हैं।

मेरी पंचायत ऐप से खुला फर्जीवाड़ा
“मेरी पंचायत” ऐप में पंचायतवार भुगतान और विकास कार्यों का रियल टाइम डेटा देखा जा सकता है। यही पारदर्शिता अब भ्रष्टाचार का आईना बन गई है।
- ग्रामीणों ने ऐप के जरिए देखा कि एक ही दुकानदारों से साल दर साल सामान खरीदे जाने के बिल अपलोड किए गए हैं।
- अधिकांश बिल नकली हैं और भुगतान के बाद 3% से 5% कमीशन काटकर दुकानदारों से पैसा वापस लिया जाता है।
- कई योजनाओं के लिए जारी बजट का भुगतान तो हुआ, लेकिन ज़मीन पर कोई काम ही नजर नहीं आता।
आरोपित सचिवों की लंबी फेहरिस्त
शिकायतों और दस्तावेजों के आधार पर पंचायत सचिवों के नाम भी उजागर हो चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं: गीतेश्वरी साहू,ममता साहू,उमा साहू इन सचिवों पर आरोप है कि इन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए फर्जी बिलिंग, बाउचर और कमीशनखोरी के जरिए शासन को लाखों का नुकसान पहुँचाया है।
फर्जी बिल और कमीशन का तंत्र
यह खेल नया नहीं है, बल्कि वर्षों से पंचायतों में इसी तरह “लेन-देन” का सिस्टम बना हुआ है।
- पंचायत सचिव चुनिंदा वेण्डरों को पेमेंट करते हैं।
- तय कमीशन काटकर दुकानदार पैसा वापस लौटा देता है।
- इस खेल में सरपंच और कई बार पंचायत निरीक्षण करने वाले कर्मचारी भी शामिल रहते हैं।
- ऑडिट और जांच टीम भी इस खेल से अनजान नहीं है, लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यही कारण है कि गांवों का विकास कागजों पर दिखता है, लेकिन हकीकत में अधूरे भवन, टूटी सड़कें और बदहाल नालियां नजर आती हैं।
शिकायतें हुईं, कार्रवाई गायब
ग्रामीणों ने इन गड़बड़ियों की लिखित शिकायत पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, इंद्रावती भवन, रायपुर तक भेजी है। लेकिन आज तक किसी भी पंचायत सचिव या सरपंच पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई। इससे सवाल उठता है कि आखिर शिकायतें दब क्यों जाती हैं? क्या पूरा सिस्टम इस मिलीभगत में शामिल है?
गृहमंत्री के बयान से उठे सवाल
गृहमंत्री ने संसद में साफ कहा है कि भ्रष्टाचार की गंगा को उसके श्रोत में ही सुखा देना है। लेकिन छुरा ब्लॉक की पंचायतें बताती हैं कि जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की कोई ठोस व्यवस्था अभी तक नहीं बन पाई है।
ग्राम पंचायत स्तर पर ही जब करोड़ों का गबन हो रहा है तो यह संदेश जाता है कि सरकारी योजनाओं का असली लाभ समाज के निचले तबके तक कभी नहीं पहुँच पाएगा।
ग्रामीणों का गुस्सा और सवाल
- “सड़कें अब भी गड्ढों से भरी हैं, लेकिन कागजों पर लाखों खर्च दिखाए गए।” – ग्रामीण, फुलझर
- “हमने मेरी पंचायत ऐप पर देखा कि नाली निर्माण पर पेमेंट हो चुका है, लेकिन गांव में कोई नाली बनी ही नहीं।” – ग्रामीण, कुरूद
- “शिकायतें करने पर भी कार्रवाई नहीं होती, लगता है अधिकारी भी मिले हुए हैं।” – ग्रामीण, सरकड़ा
क्यों जरूरी है सख्त कार्रवाई?
अगर इस तरह का भ्रष्टाचार रोकना है तो:
- मेरी पंचायत ऐप की निगरानी आम जनता को करनी होगी।
- पंचायतवार विकास कार्यों की स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच हो।
- दोषी सचिव और सरपंच पर एफआईआर दर्ज कर निलंबन की कार्रवाई तुरंत की जाए।
- फर्जी बिलिंग करने वाले व्यापारियों की भी जांच हो, ताकि पूरा नेटवर्क बेनकाब हो सके।
समाज की जिम्मेदारी
भ्रष्टाचार पर सिर्फ सरकार नहीं, समाज को भी निगरानी रखनी होगी। जब तक ग्रामीण अपनी पंचायत की गतिविधियों पर नजर नहीं रखेंगे, सचिव–सरपंच और व्यापारी मिलकर विकास की राशि को लूटते रहेंगे।
छुरा ब्लॉक की पंचायतों में जारी यह फर्जीवाड़ा बताता है कि सरकार का पैसा जनता तक नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों की जेब तक पहुंच रहा है। अगर इस पर जल्द रोक नहीं लगी तो विकास की गाड़ी गांवों तक कभी नहीं पहुंचेगी और पंचायतें भ्रष्टाचार की नर्सरी बनकर रह जाएंगी।