स्वास्थ्य के अधिकार का हनन, मानव अधिकार फाउंडेशन ने सीएमएचओ से की सख्त कार्रवाई की मांग
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। जिले के राजिम विकासखंड में संचालित लक्ष्मी माता हॉस्पिटल का संचालन शासन द्वारा निर्धारित नियमों, छत्तीसगढ़ राज्य उपचरगृह एवं रोगोपचार संबंधी संस्थान (अनुज्ञापन) अधिनियम 2010, नियम 2013 तथा रैम गाइडलाइन के प्रतिकूल पाए जाने पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) गरियाबंद द्वारा अस्पताल प्रबंधन को नोटिस जारी किया गया है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि आम नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय बन गया है।
सीएमएचओ कार्यालय से जारी नोटिस के अनुसार, जिला स्तरीय निरीक्षण दल द्वारा 27 नवंबर 2025 को अस्पताल का निरीक्षण किया गया, जिसमें कई गंभीर खामियां सामने आईं। जिसमे निरीक्षण रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि अस्पताल में रैम गाइडलाइन के अनुसार हॉस्पिटल संचालित नहीं है, वहीं 24×7 स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनाकोलॉजिस्ट) की उपलब्धता भी नहीं थी, इसके बावजूद प्रसव कराए जा रहे थे, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है। इसके साथ ही निरीक्षण के दौरान पैथोलॉजिस्ट अनुपस्थित पाए गए, जबकि मान्यता प्राप्त अस्पताल में उनकी उपस्थिति अनिवार्य है। निरीक्षण में यह भी सामने आया है कि अस्पताल में स्टाफ की तैनाती रैम गाइडलाइन के अनुरूप नहीं है। नर्सिंग होम एक्ट के अंतर्गत अस्पताल को 30 बेड के संचालन की मान्यता प्रदान की गई है, किंतु 30 बेड के अस्पताल के लिए आवश्यक चिकित्सक एवं पैरामेडिकल स्टाफ की नियमानुसार उपलब्धता नहीं पाई गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि अस्पताल संचालन केवल कागजी मान्यता के आधार पर किया जा रहा है, न कि वास्तविक मानकों के अनुरूप।
सीएमएचओ द्वारा अस्पताल प्रबंधन को निर्देशित किया गया है कि वे 30 दिवस यानी 27 दिसंबर के भीतर समस्त कमियों को दूर कर कार्यालय को सूचित करें, अन्यथा नर्सिंग होम एक्ट के तहत लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्यवाही की जाएगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित संस्था की होगी।
इस पूरे मामले को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताते हुए छत्तीसगढ़ मानव अधिकार फाउंडेशन के प्रदेश महासचिव एवं पत्रकार महासंघ छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष सुनील कुमार यादव ने सीएमएचओ गरियाबंद को लिखित आवेदन सौंपकर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि रैम गाइडलाइन और नर्सिंग होम एक्ट औपचारिक नियम नहीं, बल्कि मरीजों के जीवन की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनी प्रावधान हैं। बिना विशेषज्ञ चिकित्सकों के प्रसव कराना सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन है।
श्री यादव ने यह भी कहा कि ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में आम नागरिक मजबूरी में निजी अस्पतालों पर निर्भर होते हैं। ऐसे में यदि अस्पताल बिना मानक सुविधाओं के सेवाएं देता है, तो यह न केवल कानून की अवहेलना है, बल्कि जनता के साथ विश्वासघात और शोषण भी है।
मानव अधिकार फाउंडेशन ने मांग की है कि इस मामले में केवल नोटिस तक सीमित न रहते हुए लाइसेंस निलंबन, आर्थिक दंड तथा जिले के अन्य निजी अस्पतालों का भी रैम गाइडलाइन के तहत पुनः निरीक्षण कराया जाए।
इसी के साथ श्री यादव ने स्वास्थ विभाग के सचिव अमित कटियार को भी पत्र लिखकर संलग्नीकरण समाप्ति के बावजूद गरियाबंद जिले में इसका पालन नहीं किए जाने तथा अन्य विषयों पर शिकायत किया है।
फिलहाल सीएमएचओ कार्यालय द्वारा दी गई 30 दिन की समय-सीमा के बाद अब ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन की निगाहें स्वास्थ्य विभाग की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। यह प्रकरण इस सवाल को भी जन्म देता है कि क्या नियमों का उल्लंघन कर संचालित निजी अस्पतालों पर वास्तव में सख्ती होगी या फिर मामला औपचारिक कार्रवाई तक ही सीमित रह जाएगा। क्योंकि यहां मामला केवल नियमों का नहीं, बल्कि आम नागरिकों की जान, गरिमा और मानवाधिकारों का है।
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