2025 के सैकड़ों मामलों पर चुप्पी, 2026 के जश्न में प्रशासन मग्न
छुरा/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना—जिसे गरीब, बेघर और कच्चे मकानों में रहने वाले परिवारों के लिए एक सुरक्षित छत का भरोसा माना जाता है—गरियाबंद जिले के छुरा जनपद में गंभीर अनियमितताओं, कथित संरक्षण और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बनती जा रही है। वर्ष 2025 के दौरान सामने आए सैकड़ों प्रकरण, मीडिया में प्रकाशित खबरें, ग्रामीणों की शिकायतें और RTI आवेदन—सब मिलकर एक ही सवाल खड़ा करते हैं: जब गड़बड़ी सामने है, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरी तस्वीर के केंद्र में ग्राम पंचायत रसेला को रखा जाए, तो परत-दर-परत ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल उठाते हैं।

रसेला: फ्रंट में आया बड़ा मामला
रसेला पंचायत में प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत ऐसे नामों की स्वीकृति के आरोप सामने आए, जिनकी पात्रता संदिग्ध बताई गई। नगर क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों के नाम ग्रामीण योजना में आना, राशि जारी होने के बाद भी निर्माण न होना, और बाद में “दान” या “समिति को सौंपने” जैसे तर्क—इन सबने मामले को और गंभीर बना दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि जांच के नाम पर केवल औपचारिकता हुई, जबकि वास्तविक पात्र आज भी कच्ची छतों के नीचे जीवन बिता रहे हैं।
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सोरिद: सरकारी सेवा के बावजूद आवास!
ग्राम पंचायत सोरिद का प्रकरण जिला भर में चर्चा का विषय बना। कांग्रेस नेता चित्रसेन डड़सेना ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनकी पत्नी हिराबाई डड़सेना, जो प्राथमिक विद्यालय में प्रधान पाठक (हेडमास्टर) हैं, सरकारी सेवा में होने के बावजूद पीएम आवास उनके परिवार के नाम स्वीकृत हो गया और मकान भी बन गया।
बाद में, कथित तौर पर सूची में नाम बदलकर माता–पिता के नाम जोड़ दिए गए। सवाल यह है कि—यदि अपात्रता स्पष्ट थी, तो स्वीकृति किस आधार पर हुई? और नाम परिवर्तन किस दबाव में किया गया?

भरुवामुड़ा–हिराबतर: ‘त्रुटि’ में बदल गई आवास राशि
भरुवामुड़ा (आश्रित ग्राम हिराबतर) में बैशाखू राम पिता फिरतू राम के नाम स्वीकृत आवास की राशि के त्रुटि किए जाने का मामला सामने आया।
गरीबों के लिए आई सरकारी सहायता राशि का “त्रुटि” बन जाना—यह संकेत देता है कि योजना के मूल उद्देश्य से कैसे खिलवाड़ हुआ। बिना प्रशासनिक मिलीभगत के ऐसा संभव नहीं माना जा रहा।
रुवाड: बिना मकान, पूरी राशि आहरण!
रुवाड पंचायत में तो आरोप और भी गंभीर हैं। यहां मकान बनाए बिना ही पूरी आवास राशि निकाल लेने की बात सामने आई।
न तकनीकी सत्यापन, न निर्माण की तस्वीरें—फिर भी भुगतान! यह सवाल उठाता है कि मंजूरी और भुगतान की श्रृंखला में किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत हुई।
जनपद स्तर की भूमिका: सवालों के घेरे में प्रभारी सीईओ
इन सभी मामलों में जनपद पंचायत छुरा के प्रभारी सीईओ सतीश चंद्रवंशी, आवास प्रभारी और क्षेत्रीय आवास मित्रों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आरोप है कि मीडिया में खबरें छपने और शिकायतें दर्ज होने के बावजूद न तो पारदर्शी जांच हुई और न ही दंडात्मक कार्रवाई।
सबसे अहम बात—इन मामलों पर संवाददाताओं को आज तक कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
RTI अधिनियम की अनदेखी
छुरा जनपद पंचायत कार्यालय में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का हाल और चिंताजनक बताया जा रहा है। आवेदक नियमानुसार आवेदन और शुल्क जमा करते हैं, लेकिन समयसीमा में जानकारी नहीं मिलती।
कानून स्पष्ट है—30 दिनों में सूचना देना अनिवार्य है; उल्लंघन पर जुर्माना और विभागीय कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद RTI को “औपचारिकता” बनाकर रखा गया है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस और 2025 की फाइलें
सोमवार को जिला प्रशासन द्वारा 2026 के उपलक्ष्य में कलेक्टर सभा में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। कलेक्टर भगवान दास उईके ने विभिन्न विभागों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। सभी प्रमुख मीडियाकर्मी उपस्थित थे। लेकिन सवाल यह है कि—छुरा जनपद में 2025 के दौरान उजागर सैकड़ों आवास मामलों पर कोई ठोस जवाब क्यों नहीं?
क्या 2025 की फाइलें जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाल दी गईं?
हाईकोर्ट को गुमराह करने के आरोप
सूत्रों का दावा है कि प्रभारी जनपद सीईओ ने हाईकोर्ट को दिए गए जवाबों में तथ्यात्मक स्थिति को पूरी तरह नहीं रखा, जिससे न्यायालय को भ्रमित किया गया।
यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो मामला अवमानना तक जा सकता है।
संरक्षण का आरोप: राजनीतिक छाया?
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि प्रभारी सीईओ को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते वे कार्रवाई से बचे हुए हैं।
हालांकि राजिम विधानसभा के विधायक रोहित साहू की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया, लेकिन यह आरोप कार्रवाई में देरी का प्रमुख कारण बताया जा रहा है।
मैनपुर बनाम छुरा: दोहरा मापदंड?
गरियाबंद जिले के मैनपुर जनपद में इसी तरह के आवास प्रकरण सामने आने पर प्रभारी सीईओ को निलंबित कर दिया गया। वहीं छुरा जनपद में कई मामलों के बावजूद निलंबन नहीं—यह अंतर प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर और जिला प्रशासन ने छुरा मामलों पर आंखें मूंद रखी हैं।
मुख्यमंत्री और पंचायत मंत्री के बयान
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं— आवास योजना में भ्रष्टाचार करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।
पंचायत मंत्री विजय शर्मा का भी स्पष्ट बयान है कि—गड़बड़ी मिलने पर सख्त कार्रवाई होगी।
लेकिन जमीनी हकीकत इन बयानों से मेल नहीं खाती।

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