बीस वर्षों से बंद पड़ी दुकानें, करोड़ों की सरकारी संपत्ति बन रही खंडहर
छुरा (गंगा प्रकाश)। छुरा नगर पंचायत क्षेत्र में स्थित अटल व्यावसायिक परिसर आज विकास की उम्मीद नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता की मिसाल बनता जा रहा है। लगभग बीस वर्ष पूर्व स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने और नगर पंचायत की आय बढ़ाने के उद्देश्य से निर्मित यह परिसर वर्षों से बंद पड़ा है। हालत यह है कि परिसर की 25 में से एक भी दुकान अब तक आबंटित नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप नगर पंचायत को हर साल लाखों रुपये के संभावित राजस्व से हाथ धोना पड़ रहा है, जबकि रखरखाव और सुरक्षा पर लगातार खर्च करना पड़ रहा है।
नगर पंचायत के अनुसार, अटल व्यावसायिक परिसर की अधिकांश दुकानें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। बीते कई वर्षों में अलग-अलग समय पर नीलामी की प्रक्रिया कराई गई, लेकिन आरक्षित वर्ग से एक भी आवेदक सामने नहीं आया। नतीजा यह कि सभी दुकानें आज तक बंद हैं और पूरा परिसर धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि करोड़ों की लागत से बनी यह सरकारी संपत्ति आज उपयोग के अभाव में जर्जर हो रही है। दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, शटर जंग खा रहे हैं और परिसर असामाजिक गतिविधियों का अड्डा बनता जा रहा है। नगर पंचायत को न तो किराया मिल रहा है और न ही कोई कर या अन्य राजस्व। इससे नगर में मूलभूत सुविधाओं और विकास कार्यों पर सीधा असर पड़ रहा है।

योजना बनी, तैयारी नहीं हुई
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों का मानना है कि समस्या केवल आरक्षण की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जिसमें आरक्षण के साथ आवश्यक तैयारी और समर्थन नहीं जोड़ा गया। अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लिए दुकानें आरक्षित कर दी गईं, लेकिन उन्हें व्यवसाय के लिए तैयार करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। न व्यवसायिक प्रशिक्षण दिया गया, न पूंजी उपलब्ध कराई गई और न ही बाजार से जोड़ने की प्रभावी व्यवस्था की गई।
एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है यह नहीं कहा जा सकता कि आरक्षण गलत है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि आरक्षण के साथ सशक्तिकरण नहीं हुआ। केवल दुकान देना पर्याप्त नहीं, दुकान चलाने की क्षमता, संसाधन और भरोसा भी देना होता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार क्षेत्र के अधिकांश युवा आज भी सरकारी नौकरी को ही सुरक्षित विकल्प मानते हैं। व्यवसाय को लेकर जोखिम, आर्थिक असुरक्षा और मार्गदर्शन की कमी के कारण वे आगे नहीं आ पा रहे हैं। यही वजह है कि बार-बार नीलामी के बावजूद एक भी दुकान आबंटित नहीं हो सकी।
नगर पंचायत पर बढ़ता आर्थिक बोझ
नगर पंचायत अधिकारियों के मुताबिक, परिसर के रखरखाव, सफाई और सुरक्षा पर हर साल हजारों से लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। यदि दुकानें चालू होतीं, तो इससे नियमित आय होती, जिससे सड़क, नाली, पेयजल और प्रकाश व्यवस्था जैसे विकास कार्यों को गति मिलती। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह परिसर आय का स्रोत बनने के बजाय आर्थिक बोझ बन गया है।
नगरवासियों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में यह भवन पूरी तरह जर्जर हो जाएगा और इसके पुनर्निर्माण पर फिर लाखों रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

नियमों में संशोधन की उठी मांग
इस स्थिति को देखते हुए अब यह मांग तेज हो गई है कि नगरीय प्रशासन विभाग के नियमों में संशोधन किया जाए। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि किसी व्यावसायिक परिसर में वर्षों तक आरक्षित दुकानें नहीं भर पातीं, तो एक निश्चित समय-सीमा के बाद उन्हें अनारक्षित श्रेणी में नीलाम करने का प्रावधान होना चाहिए, ताकि सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग हो सके और राजस्व का नुकसान रोका जा सके।
कुछ जनप्रतिनिधियों ने यह भी सुझाव दिया है कि सांसद और विधायक इस पूरे मामले को मुख्यमंत्री के समक्ष रखें और कैबिनेट स्तर पर निर्णय लेकर प्रदेशभर के नगर निकायों में बंद पड़े ऐसे परिसरों के लिए एक समान नीति बनाई जाए।
आरक्षण का उद्देश्य और ज़मीनी सच्चाई
आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को समान अवसर देना, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करना है। यह सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था है, जिसने लाखों लोगों को शिक्षा और रोजगार में आगे बढ़ने का अवसर दिया है।
लेकिन छुरा का मामला यह भी दर्शाता है कि केवल अवसर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि अवसर को उपयोगी बनाने के लिए आधार तैयार करना भी उतना ही जरूरी है। यदि आरक्षित वर्ग के युवाओं को व्यवसायिक प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, मेंटरशिप और बाजार से जोड़ने की योजनाएं साथ में नहीं दी जाएंगी, तो ऐसी सरकारी परियोजनाएं कागजों में तो सफल होंगी, लेकिन ज़मीन पर असफल।

समाधान की दिशा में क्या जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि अटल व्यावसायिक परिसर को पुनर्जीवित करने के लिए दो स्तरों पर काम करना होगा। पहला, आरक्षित वर्ग के युवाओं को विशेष उद्यमिता प्रशिक्षण, आसान ऋण, सब्सिडी और विपणन सहयोग उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ व्यवसाय शुरू कर सकें। दूसरा, जिन दुकानों पर वर्षों से कोई दावा नहीं आ रहा, उनके लिए नीति में लचीलापन लाकर वैकल्पिक व्यवस्था की जाए।
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