ग्राम पंचायत लोहझर के आश्रित ग्राम खट्टी में खसरा नंबर 246 की जमीन का मामला; पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताकर सौदा, सरपंच बोले- पीएम आवास पूरा कराने के लिए जमीन बेचने की बात कही गई थी

छुरा (गंगा प्रकाश)। ग्राम पंचायत लोहझर के आश्रित ग्राम खट्टी में करीब 1000 वर्गफुट जमीन के ₹3 लाख में किए गए इकरारनामे का मामला सामने आने के बाद पंचायत की कार्यशैली और जमीन की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। सामने आए दो पन्नों के दस्तावेज में संबंधित जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताते हुए 3 लाख रु नगद प्राप्त करने, कब्जा सौंपने और भविष्य में पंजीयन कराने का उल्लेख किया गया है। सबसे अहम बात यह है कि इकरारनामे पर ग्राम पंचायत की सील-मोहर के साथ सरपंच यशवंत ठाकुर के हस्ताक्षर भी हैं।

मामले में स्थानीय सूत्रों से यह जानकारी भी सामने आई है कि संबंधित भूमि को वर्षों पहले किसी शासकीय विद्यालय अथवा ITI कॉलेज जैसे शैक्षणिक या सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आरक्षित किया गया हो सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए आरक्षण को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है। पुराने पंचायत प्रस्ताव, राजस्व अभिलेख, खसरा-बी1, नक्शा और सक्षम अधिकारी के आदेशों की जांच से ही भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

इकरारनामे में क्रेता-विक्रेता का पूरा विवरण

सामने आए दस्तावेज में पक्ष क्रमांक-1 लाल सिंह कमार, पिता काबंल सिंह कमार, उम्र 53 वर्ष, जाति कमार, निवासी ग्राम खट्टी, ग्राम पंचायत लोहझर, थाना छुरा, जिला गरियाबंद, छत्तीसगढ़ का उल्लेख है।
वहीं पक्ष क्रमांक-2 विजय कुमार साहू, पिता तिलक राम साहू, उम्र 43 वर्ष, जाति तेली, निवासी ग्राम खरवारा, तहसील छुरा, जिला गरियाबंद, छत्तीसगढ़ का नाम दर्ज दिखाई देता है।
दस्तावेज में संपत्ति का विवरण ग्राम खट्टी, ग्राम पंचायत लोहझर, प.ह.नं. 11, खसरा नंबर 246 से संबंधित बताया गया है। भूमि का क्षेत्रफल करीब 1000 वर्गफुट बताया गया है। दूसरे पृष्ठ पर हाथ से लिखे विवरण में जमीन का आकार 25×40 = 1000 वर्गफुट अंकित है।
इकरारनामे में 3,00, 000 रु यानी तीन लाख रुपये नगद प्राप्त करने का उल्लेख है। दस्तावेज में संबंधित जमीन का कब्जा 19 जनवरी 2026 से दूसरे पक्ष को सौंपने की बात भी दर्ज है।

पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताकर हुआ इकरारनामा

इकरारनामे में संबंधित जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताते हुए उसके लेन-देन की बात कही गई है। दस्तावेज में भविष्य में शासन से अनुमति मिलने के बाद पंजीयन कराने का उल्लेख भी है।
यहीं से मामले में राजस्व और कानूनी सवाल खड़े होते हैं। यदि संबंधित व्यक्ति के पास जमीन का विधिवत स्वामित्व दस्तावेज नहीं था और भूमि को केवल पुश्तैनी कब्जे वाली आबादी भूमि बताते हुए इकरारनामा किया गया, तो यह जांच का विषय होगा कि उसे उक्त भूमि के हस्तांतरण का अधिकार किस आधार पर प्राप्त था।

“पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि” कहना अपने आप जमीन के स्वामित्व अथवा बिक्री के वैधानिक अधिकार का अंतिम प्रमाण नहीं है। जमीन की वास्तविक प्रकृति, स्वामित्व और हस्तांतरण का अधिकार राजस्व अभिलेख, पट्टा, अधिकार दस्तावेज और सक्षम प्राधिकारी के आदेशों से ही निर्धारित होगा।

सरपंच बोले- पीएम आवास पूरा कराने के लिए जमीन बेचने की बात बताई गई थी

मामले को लेकर ग्राम पंचायत लोहझर के सरपंच यशवंत ठाकुर से संपर्क किया गया। उन्होंने बताया कि क्रेता और विक्रेता दोनों अपने अन्य गवाहों के साथ उनके पास आए थे। दोनों पक्षों ने उन्हें बताया था कि विक्रेता के पास संबंधित जमीन पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि है और उसी भूमि की खरीदी-बिक्री की जा रही है।
सरपंच ने बताया कि लाल सिंह कमार का प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान स्वीकृत हुआ है। उनके अनुसार, पक्षकारों ने यह भी बताया था कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत स्वीकृत मकान को पूर्ण कराने के लिए जमीन बेचने की आवश्यकता है और इसी उद्देश्य से जमीन की खरीदी-बिक्री की जा रही है।
सरपंच के मुताबिक, पक्षकारों द्वारा जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताए जाने के आधार पर उन्होंने गवाह के रूप में दस्तावेज पर सील-मोहर लगाकर हस्ताक्षर किए थे।

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लेकिन बाद में सरपंच को जानकारी मिली कि जिस जमीन की खरीदी-बिक्री का दस्तावेज तैयार किया गया है, वह बताई गई कब्जे वाली जमीन से अलग हो सकती है। इसके बाद उन्होंने क्रेता को उक्त जमीन की खरीदी-बिक्री रद्द करने के लिए कहा।

सरपंच ने यह भी बताया कि उन्हें बाद में जानकारी मिली कि संबंधित जमीन बहुत पहले आरक्षित भूमि रही है।
हालांकि भूमि किस प्रयोजन के लिए आरक्षित थी, किस आदेश से आरक्षित हुई और वर्तमान में उसकी स्थिति क्या है, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

पंचायत की सील-मोहर पर सबसे बड़ा सवाल

मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल ग्राम पंचायत की आधिकारिक सील-मोहर के इस्तेमाल को लेकर उठ रहा है।

  • यदि सरपंच का कहना है कि उन्होंने केवल गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए थे तो सवाल यह है कि पंचायत की आधिकारिक सील-मोहर लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
  • क्या ग्राम पंचायत की बैठक में इस इकरारनामे को लेकर कोई प्रस्ताव पारित हुआ था?
  • क्या पंचायत की कार्यवाही पुस्तिका में खसरा नंबर 246 का उल्लेख है?
  • क्या पंचायत ने जमीन की वास्तविक स्थिति और राजस्व रिकॉर्ड की जांच की थी?
  • क्या सरपंच को निजी व्यक्तियों के बीच जमीन के इकरारनामे पर पंचायत की आधिकारिक मुहर लगाने का कोई अधिकार प्राप्त था?

इन सवालों का जवाब पंचायत रिकॉर्ड और संबंधित नियमों की जांच के बाद ही सामने आएगा।

गवाह के हस्ताक्षर और पंचायत की मुहर अलग-अलग विषय

किसी व्यक्ति का किसी दस्तावेज पर गवाह के रूप में हस्ताक्षर करना और किसी संस्था की ओर से दस्तावेज को प्रमाणित या अनुमोदित करना अलग-अलग विषय हैं।
यदि सरपंच ने व्यक्तिगत हैसियत से गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए हैं तो इससे वह जमीन का स्वामित्व खरीदार के नाम हस्तांतरित करने वाले अधिकारी नहीं बन जाते।
लेकिन यदि ग्राम पंचायत की आधिकारिक सील का इस्तेमाल दस्तावेज को पंचायत द्वारा प्रमाणित अथवा अनुमोदित दिखाने के लिए हुआ है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके पीछे कौन-सा पंचायत प्रस्ताव, आदेश या वैधानिक अधिकार था।
यही पहलू अब सरपंच की कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर रहा है।

पंचायत की अचल संपत्ति पर क्या कहते हैं नियम?

यदि जांच में खसरा नंबर 246 की संबंधित भूमि पंचायत में निहित अथवा पंचायत की अचल संपत्ति पाई जाती है तो मामला सामान्य निजी जमीन के लेन-देन से अलग हो जाएगा।
छत्तीसगढ़ पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 65 पंचायत की अचल संपत्ति के हस्तांतरण से संबंधित प्रावधान रखती है। पंचायत की संपत्ति के हस्तांतरण के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति महत्वपूर्ण होती है।
इसके अलावा छत्तीसगढ़ पंचायत (अचल संपत्ति का अंतरण) नियम, 1994 में पंचायत की अचल संपत्ति के हस्तांतरण की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। ऐसे मामलों में पंचायत का प्रस्ताव, संपत्ति से संबंधित आवश्यक विवरण और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए यदि संबंधित भूमि पंचायत की संपत्ति निकलती है तो केवल सरपंच के हस्ताक्षर या पंचायत की सील-मोहर के आधार पर निजी व्यक्ति के पक्ष में भूमि का वैधानिक हस्तांतरण नहीं माना जा सकता।

राजस्व रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज खसरा नंबर 246 का राजस्व रिकॉर्ड होगा। प्रशासन को जमीन की वर्तमान और पुरानी स्थिति की जांच करनी होगी।
यह देखना होगा कि जमीन किसके नाम दर्ज है, उसका भूमि वर्गीकरण क्या है और क्या वह निजी, आबादी या शासकीय भूमि है।
इसके साथ यह भी जांचना होगा कि लाल सिंह कमार के पास जमीन पर अधिकार किस दस्तावेज के आधार पर था।
यदि राजस्व रिकॉर्ड में संबंधित व्यक्ति का नाम स्वामी के रूप में दर्ज नहीं है और उसके पास कोई वैध पट्टा अथवा अधिकार दस्तावेज भी नहीं है, तो केवल पुश्तैनी कब्जे के आधार पर किए गए इकरारनामे की वैधानिक स्थिति जांच का विषय बन सकती है।

ITI कॉलेज या शासकीय विद्यालय के लिए आरक्षण की बात, पुष्टि बाकी

स्थानीय सूत्रों से संबंधित भूमि को पूर्व में ITI कॉलेज अथवा शासकीय विद्यालय जैसे शैक्षणिक प्रयोजन के लिए आरक्षित किए जाने की बात सामने आई है। सरपंच ने भी बताया है कि उन्हें जानकारी मिली है कि जमीन बहुत पहले आरक्षित की गई थी।
लेकिन भूमि ITI कॉलेज अथवा शासकीय विद्यालय के लिए आरक्षित थी, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

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इसलिए इस संबंध में प्रशासन को पुराने पंचायत प्रस्ताव, राजस्व रिकॉर्ड, संबंधित विभाग के आदेश और अन्य शासकीय अभिलेखों की जांच करनी होगी।
यदि भूमि किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आरक्षित पाई जाती है तो यह भी देखना होगा कि आरक्षण कब हुआ था और क्या बाद में सक्षम अधिकारी द्वारा उसे समाप्त या परिवर्तित किया गया।

पुश्तैनी काबिज होने का दावा भी जांच का विषय

इकरारनामे में जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताया गया है। लेकिन इस दावे की वैधानिक स्थिति भी राजस्व रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होगी।
किस व्यक्ति के नाम जमीन दर्ज है, पूर्व में किसके कब्जे में थी, कब्जा किस आधार पर था और क्या किसी शासकीय रिकॉर्ड में उस कब्जे को मान्यता मिली थी—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी है।
यदि भूमि शासकीय या सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आरक्षित पाई जाती है तो केवल पुश्तैनी कब्जे का दावा जमीन के हस्तांतरण का स्वतः अधिकार प्रदान नहीं करता।

3 लाख रु का इकरारनामा मालिकाना हक नहीं देता

संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54 के तहत अचल संपत्ति की बिक्री से संबंधित वैधानिक प्रावधान हैं। ₹100 से अधिक मूल्य की मूर्त अचल संपत्ति की बिक्री पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से की जाती है। केवल बिक्री का अनुबंध अपने आप संपत्ति में कोई हित या अधिकार पैदा नहीं करता।
इसलिए सामने आया ₹3 लाख का इकरारनामा अपने आप खरीदार को जमीन का मालिकाना हक प्रदान नहीं करता।
दस्तावेज में भविष्य में पंजीयन कराने की बात भी दर्ज है। ऐसे में यह जांचना जरूरी होगा कि क्या संबंधित जमीन का बाद में कोई पंजीकृत विक्रय विलेख हुआ या मामला केवल इकरारनामे तक सीमित है।

पीएम आवास योजना का उल्लेख, लेकिन जमीन की वैधता अलग सवाल

सरपंच द्वारा बताया गया है कि लाल सिंह कमार का प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान स्वीकृत हुआ है और मकान पूरा कराने के लिए जमीन बेचने की बात पक्षकारों ने कही थी।
इस जानकारी के बाद प्रशासन के लिए यह भी जांच का विषय हो सकता है कि लाल सिंह कमार के नाम वास्तव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास स्वीकृत है या नहीं और आवास निर्माण के लिए संबंधित भूमि का क्या संबंध है।
हालांकि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास स्वीकृत होना अपने आप किसी व्यक्ति को शासकीय, सार्वजनिक अथवा ऐसी आबादी भूमि को बेचने का अधिकार नहीं देता, जिस पर हस्तांतरण संबंधी वैधानिक प्रतिबंध लागू हों। जमीन का स्वामित्व और हस्तांतरण का अधिकार राजस्व रिकॉर्ड एवं वैध दस्तावेजों से ही निर्धारित होगा।

प्रशासन को इन बिंदुओं पर करनी चाहिए जांच

पूरे मामले में निष्पक्ष जांच के लिए प्रमुख रूप से इन बिंदुओं की पड़ताल जरूरी है—

  1. खसरा नंबर 246 की वर्तमान राजस्व स्थिति क्या है?
  2. जमीन किसके नाम दर्ज है?
  3. भूमि की प्रकृति क्या है?
  4. क्या यह निजी, आबादी अथवा शासकीय भूमि है?
  5. लाल सिंह कमार के पास जमीन पर वैध अधिकार किस दस्तावेज से आया?
  6. पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि होने का आधार क्या है?
  7. क्या जमीन कभी ITI कॉलेज, शासकीय विद्यालय अथवा अन्य
  8. सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आरक्षित की गई थी?
  9. यदि आरक्षित की गई थी तो क्या बाद में आरक्षण समाप्त किया गया?
  10. ग्राम पंचायत की कार्यवाही पुस्तिका में उक्त भूमि का क्या उल्लेख है?
  11. क्या इकरारनामे को लेकर पंचायत का कोई प्रस्ताव पारित हुआ था?
  12. सरपंच ने पंचायत की आधिकारिक सील-मोहर किस अधिकार के तहत लगाई?
  13. 3 लाख रु के लेन-देन का क्या प्रमाण है?
  14. क्या जमीन का पंजीकृत विक्रय हुआ है?
  15. इकरारनामे में दर्शाई गई जमीन और मौके की जमीन एक ही है या अलग?
  16. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लाल सिंह कमार के आवास की स्वीकृति और निर्माण से संबंधित रिकॉर्ड क्या कहते हैं?

अब प्रशासन के जवाब पर टिकी नजर

मामले में एसडीएम विशाल महाराणा से खरीदी-बिक्री संबंधी दस्तावेज व्हाट्सऐप संदेश के माध्यम से भेजकर पक्ष जानने का प्रयास किया गया।
एसडीएम विशाल महाराणा ने स्पष्ट कहा कि शासकीय/आबादी भूमि में कहीं भी इस प्रकार का इकरारनामा वैध नहीं है। उन्होंने सरपंच द्वारा सील-मोहर लगाकर दस्तावेज को प्रमाणित किए जाने को भी गलत बताया।
एसडीएम ने कहा कि इस मामले की जानकारी उन्हें मीडिया के माध्यम से मिली है और पूरे मामले की जांच की जाएगी। जांच में जिसके खिलाफ जो खामियां सामने आएंगी, उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।

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