कुछ सपने ऐसे होते हैं जो केवल आँखों में नहीं बसते, वे पूरे घर की दीवारों में, पूरे वातावरण में, पूरे जीवन में रच-बस जाते हैं। मेरी बेटी लाडली जिज्ञासा का सपना भी ऐसा ही था। वह आईएएस बनना चाहती थी। यह शब्द उसके लिए सिर्फ तीन अक्षर नहीं थे, बल्कि आत्मसम्मान, सेवा, संघर्ष और बदलाव का प्रतीक थे। वह देश के लिए कुछ करना चाहती थी, समाज के लिए कुछ बनना चाहती थी, और अपने माता-पिता के लिए गर्व की वजह।

बचपन से ही वह अलग थी। खिलौनों से ज़्यादा उसे किताबें भाती थीं। जब दूसरी बच्चियाँ खेल-कूद में लगी रहतीं, तब जिज्ञासा अपने स्कूल बैग से कोई सामान्य ज्ञान की किताब निकाल लेती। वह सवाल पूछती—बहुत सवाल। पापा, कलेक्टर क्या करता है?, देश कैसे चलता है?, गरीबों के लिए सरकार क्या करती है? उन सवालों में बचपना कम, जिम्मेदारी ज़्यादा होती थी। शायद उसी दिन मुझे समझ आ गया था कि मेरी बेटी सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीना चाहती है।
समय बीतता गया और उसका सपना और स्पष्ट होता गया। आठवीं–नौवीं कक्षा में ही उसने कह दिया था—पापा, मैं आईएएस बनूँगी। यह कोई बाल-सुलभ जिद नहीं थी, यह एक घोषणा थी। उसके बाद उसके जीवन की दिशा ही बदल गई। उसकी दिनचर्या, उसके दोस्त, उसकी बातचीत—सब कुछ उसके लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमने लगा। सुबह जल्दी उठना, अख़बार पढ़ना, नोट्स बनाना, ऑनलाइन लेक्चर देखना, मॉडल प्रश्न हल करना—उसने अपने बचपन को अपने भविष्य में निवेश कर दिया था।

घर में उसकी पढ़ाई सिर्फ उसकी नहीं रही, पूरे परिवार की हो गई थी। कोई उसे चाय देकर जाता, कोई चुपचाप दरवाज़ा बंद करता ताकि आवाज़ न जाए। त्योहारों में भी उसके हाथ में किताब रहती थी। जब कभी हम कहते, थोड़ा आराम कर लो, तो वह मुस्कुरा कर कहती—पापा, आईएएस का रास्ता आसान नहीं होता। उस एक वाक्य में उसकी परिपक्वता झलकती थी।
मुझे आज भी याद है, एक दिन उसने अपनी कॉपी में लिखकर दिखाया था— I will be an IAS officer. और फिर नीचे छोटे अक्षरों में— For my parents and my country. उस काग़ज़ को मैंने आज भी संभाल कर रखा है। वह अब सिर्फ काग़ज़ नहीं, मेरी सबसे कीमती धरोहर है।
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फिर वह समय आया जब सब कुछ अचानक बदल गया। उसकी तबीयत खराब रहने लगी। पहले हमने सोचा, थकान होगी, पढ़ाई का दबाव होगा। डॉक्टर बदले, जाँचें हुईं, दवाइयाँ चलीं। हम सब उम्मीद में थे कि यह दौर भी निकल जाएगा और वह फिर से अपनी किताबों में खो जाएगी। अस्पताल के बिस्तर पर भी वह पूछती— पापा, किताब लाए? यह उसकी जिद नहीं थी, यह उसका जीवन था।
लेकिन नियति ने हमारे हाथों से सब कुछ छीन लिया। इलाज के दौरान ही मेरी बेटी हम सबको छोड़कर चली गई। जिस घर में उसके पढ़ने की आवाज़ गूंजती थी, वहाँ अचानक रोने की आवाज़ भी नहीं बची। सिर्फ एक सुन्न सन्नाटा। ऐसा सन्नाटा, जो कानों से नहीं, आत्मा से सुनाई देता है।
एक पिता के लिए बेटी सिर्फ संतान नहीं होती, वह उसकी कमजोरी भी होती है और उसकी ताकत भी। जिस बेटी को कंधों पर बैठाकर दुनिया दिखाई, आज उसी को कंधा देना पड़ा। उस दिन लगा, जैसे मैंने अपने जीवन का सबसे भारी बोझ नहीं, सबसे कीमती हिस्सा उठाया है। चिता की आग में सिर्फ शरीर नहीं जल रहा था, मेरे सपने, मेरी हँसी, मेरी आने वाली सुबहें सब जल रही थीं।
आज घर में उसकी मौजूदगी नहीं है, लेकिन उसकी कमी हर जगह है। उसकी कुर्सी खाली है, पर लगा है कोई बैठा है। उसकी किताबें रखी हैं, पर हाथ नहीं हैं। उसकी तस्वीर मुस्कुरा रही है, पर आवाज़ नहीं है। कभी-कभी रात में लगता है वह अभी आएगी और कहेगी— पापा, ये समझाइए। और मैं आदतन उठ भी जाता हूँ।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अब कौन पूरा करेगा मेरी बेटी का सपना? कौन बनेगा वो आईएएस, जिसे बनते देखने के लिए मैंने हर भगवान से मन्नत माँगी थी? शायद कोई नहीं। और शायद बहुत से। क्योंकि सपने व्यक्ति के साथ खत्म नहीं होते, अगर उन्हें जिंदा रखा जाए।
आज मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि मेरी बेटी की यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई। उसने जितनी मेहनत की, जितनी लगन दिखाई, जितनी सच्चाई से सपना जिया—वह सब व्यर्थ नहीं जा सकता। अगर उसकी कहानी किसी एक बच्ची को पढ़ने की ताकत दे दे, किसी एक पिता को अपनी बेटी पर भरोसा करना सिखा दे, तो जिज्ञासा का सपना अधूरा नहीं कहलाएगा।
एक पिता होकर मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाया—यह दर्द मेरे साथ रहेगा। लेकिन शायद मैं उसके नाम को, उसके उद्देश्य को, उसके सपने को जिंदा रख सकता हूँ। यही मेरी अंतिम जिम्मेदारी है, यही मेरी श्रद्धांजलि।
बेटी,
तू आईएएस नहीं बन पाई,पर तूने एक पिता को इंसान बना दिया।
तू अफसर नहीं बनी,पर तूने मेरे भीतर की दुनिया का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया।
तेरा सपना अब मेरी सांसों में है।तू चली गई, पर तू खत्म नहीं हुई।
तू अब एक याद नहीं, एक विरासत है।
तेरे दुखी पिता
प्रकाश कुमार यादव

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