कभी नक्सलियों का गढ़ रहा इलाका, आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे ग्रामीण — जन समस्या निवारण शिविर की मांग तेज

 

राधे श्याम पटेल

मैनपुर/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। मैनपुर विकासखंड के अंतर्गत आने वाला ग्राम ‘बड़े गोबरा’, जो ग्राम पंचायत छोटे गोबरा का आश्रित गांव है, आज अपने अतीत की भयावह छाया से बाहर निकलकर विकास की ओर बढ़ने की उम्मीदों में जी रहा है। कभी नक्सलियों के खौफ से कांपने वाला यह इलाका अब शांति की राह पर है, लेकिन विकास की रोशनी अब भी यहां पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है। ग्रामीणों की आंखों में आज एक ही सवाल है—क्या अब सरकार उनकी सुध लेगी?

खौफनाक अतीत: जब लाल स्याही में दर्ज था ‘बड़े गोबरा’

बड़े गोबरा का नाम एक समय पुलिस और प्रशासन की फाइलों में अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र के रूप में दर्ज था। नगरी, धमतरी और गोबरा डिवीजन कमेटी के नक्सली वर्षों तक यहां सक्रिय रहे। घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां और दुर्गम रास्ते नक्सलियों के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह बने हुए थे।

सुरक्षाबलों द्वारा चलाए गए कई अभियानों के दौरान इस क्षेत्र से चौंकाने वाले खुलासे हुए। नक्सलियों के पास से करोड़ों रुपये की नकदी बरामद की गई थी। इतना ही नहीं, जंगलों के भीतर हथियार बनाने की फैक्ट्री, विस्फोटक सामग्री और अन्य साजो-सामान मिलने से यह साफ हो गया था कि बड़े गोबरा नक्सली गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था।

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बदलते हालात, लेकिन विकास अब भी अधूरा

समय के साथ सुरक्षाबलों की सख्ती और प्रशासनिक प्रयासों से यह इलाका धीरे-धीरे नक्सल प्रभाव से बाहर निकल रहा है। ग्रामीण अब भयमुक्त होकर जीवन जीने लगे हैं, लेकिन असली चुनौती अब विकास की है, जो अभी भी अधूरा है।

बरसात का मौसम यहां के ग्रामीणों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं होता। बड़े गोबरा सहित आसपास के आधा दर्जन गांव हर साल बाढ़ के पानी से घिर जाते हैं। सड़क संपर्क पूरी तरह टूट जाता है और गांव टापू में तब्दील हो जाते हैं। ऐसे हालात में न तो समय पर इलाज मिल पाता है और न ही जरूरी सामान की आपूर्ति हो पाती है।

 

बिजली की रोशनी अधूरी, योजनाएं अधर में

सरकारी दावों के अनुसार छोटे गोबरा और बड़े गोबरा तक बिजली पहुंच चुकी है, लेकिन यह सुविधा अभी भी सीमित है। आसपास के कई गांव आज भी अंधेरे में जीवन जीने को मजबूर हैं। कई जगहों पर बिजली के खंभे और तार तक नहीं पहुंचे हैं।

इसके अलावा, क्षेत्र में कई विकास कार्य वर्षों से अधूरे पड़े हैं। सड़क निर्माण, पुल-पुलिया, पेयजल व्यवस्था और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहद कमजोर है। ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं कागजों में तो दिखाई देती हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर नजर नहीं आता।

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जन समस्या निवारण शिविर की मांग तेज

हाल ही में जिले के साहेबिन कछार और आमामोरा जैसे नक्सल मुक्त गांवों में प्रशासन द्वारा ‘जन समस्या निवारण शिविर’ आयोजित किए गए थे। इन शिविरों में अधिकारियों ने सीधे ग्रामीणों से संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और मौके पर ही कई मामलों का निराकरण किया। इसी पहल से प्रेरित होकर अब बड़े गोबरा और छोटे गोबरा के ग्रामीण भी अपने गांव में ऐसे शिविर की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि अधिकारी गांव में आकर उनकी समस्याएं सुनें, तो वर्षों से लंबित मुद्दों का समाधान संभव हो सकता है।

ग्रामीणों की पीड़ा: हम भी चाहते हैं विकास

ग्रामीणों का कहना है कि वे भी अन्य गांवों की तरह सामान्य जीवन जीना चाहते हैं। एक ग्रामीण ने भावुक होकर कहा हमने बहुत साल डर में गुजारे हैं। अब जब शांति आई है, तो हमें विकास चाहिए। हमारे बच्चों को शिक्षा, इलाज और रोजगार के अवसर मिलें, यही हमारी सबसे बड़ी मांग है।

प्रशासन के सामने चुनौती और अवसर

बड़े गोबरा आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। एक ओर यह नक्सलवाद के अंधेरे से बाहर निकल चुका है, वहीं दूसरी ओर विकास की रोशनी अभी भी अधूरी है। ऐसे में प्रशासन के पास एक सुनहरा अवसर है कि वह इस क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ठोस कदम उठाए।

यदि समय रहते यहां जन समस्या निवारण शिविर आयोजित कर बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त किया जाता है, तो यह गांव विकास की नई मिसाल बन सकता है। अन्यथा, यह क्षेत्र एक बार फिर उपेक्षा और समस्याओं के दलदल में फंस सकता है।

बड़े गोबरा के ग्रामीण अब सिर्फ एक उम्मीद के सहारे हैं—कि शासन-प्रशासन उनकी आवाज सुनेगा और उनके गांव तक विकास की किरण जरूर पहुंचेगी।


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