गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। जिले की राजनीति में लंबे समय से चल रही अटकलों, अंदरूनी खींचतान और समीकरणों की रस्साकशी पर आखिरकार कांग्रेस हाईकमान ने विराम लगा दिया है। संगठन सृजन अभियान के तहत कांग्रेस ने देवभोग-बिंद्रानवागढ़ क्षेत्र के लोकप्रिय और जमीनी नेता सुखचंद बेसरा को गरियाबंद जिला कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त कर एक बड़ा और चौंकाने वाला राजनीतिक दांव खेला है। यह फैसला सामने आते ही जिले की सियासत में जबरदस्त हलचल, नई चर्चाएं और संभावनाओं का तूफान खड़ा हो गया है।
इस निर्णय के साथ ही राजिम-फिंगेश्वर-गरियाबंद क्षेत्र से जिला अध्यक्ष पद के दो मजबूत दावेदारों युगल किशोर पांडे और भवानी शंकर शुक्ला की दावेदारी सिरे से खारिज हो गई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच संतुलन साधने और संगठन में नए सिरे से ऊर्जा भरने के उद्देश्य से कांग्रेस हाईकमान ने तीसरे और अपेक्षाकृत संतुलित विकल्प के रूप में सुखचंद बेसरा पर भरोसा जताया है। यह दांव कितनी दूर तक सफल होगा, यह आने वाला वक्त तय करेगा, लेकिन फिलहाल यह फैसला जिले की राजनीति की दिशा बदलने वाला जरूर माना जा रहा है।
संगठन सृजन अभियान का परिणाम
कांग्रेस द्वारा यह नियुक्ति पार्टी के महत्वाकांक्षी “संगठन सृजन अभियान” के तहत की गई फीडबैक रिपोर्ट के आधार पर की गई है। पार्टी नेतृत्व ने बीते महीनों में संगठन की जमीनी स्थिति, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, लोकप्रियता और नेतृत्व क्षमता को लेकर व्यापक फीडबैक लिया था। इसी प्रक्रिया के बाद बिंद्रानवागढ़ विधानसभा क्षेत्र के देवभोग निवासी सुखचंद बेसरा को जिले की कमान सौंपने का निर्णय लिया गया।
घोषणा होते ही देवभोग, बिंद्रानवागढ़ और आसपास के क्षेत्रों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। जगह–जगह आतिशबाजी हुई, मिठाइयां बांटी गईं और समर्थकों ने सुखचंद बेसरा को फूल-मालाओं से लादकर बधाई दी। यह दृश्य साफ संकेत दे रहा था कि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच इस फैसले को व्यापक समर्थन मिल रहा है।
पहली बार बिंद्रानवागढ़ से जिला अध्यक्ष
गरियाबंद जिला कांग्रेस के इतिहास में यह पहला मौका है, जब बिंद्रानवागढ़ विधानसभा क्षेत्र से किसी जमीनी कार्यकर्ता को जिला अध्यक्ष बनने का अवसर मिला है। अब तक जिले की कमान प्रायः राजिम क्षेत्र के नेताओं के हाथ में ही रही है। इससे पहले बालूलाल साहू, बैशाखू राम साहू और भाव सिंह साहू जैसे नेता लगातार कई वर्षों तक जिला अध्यक्ष पद पर रहे।
राजनीतिक दृष्टि से यह बदलाव बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि वर्षों तक भाजपा का गढ़ रहे बिंद्रानवागढ़ क्षेत्र में हाल ही में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास रचा था। जनक ध्रुव की ऐतिहासिक जीत के बाद अब उसी क्षेत्र से जिला अध्यक्ष की नियुक्ति को कांग्रेस की रणनीतिक मजबूती के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं का मानना है कि इससे आदिवासी अंचल में कांग्रेस का जनाधार और मजबूत होगा।
सुखचंद बेसरा का राजनीतिक सफर
सुखचंद बेसरा छात्र राजनीति से लेकर संगठन और पंचायत स्तर तक एक लंबा और सक्रिय राजनीतिक सफर तय कर चुके हैं। वे एनएसयूआई, युवा कांग्रेस, सरपंच, जनपद सदस्य, जनपद उपाध्यक्ष और ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए संगठन को मजबूती देते रहे हैं। जमीनी स्तर पर उनकी पकड़, कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद और संगठनात्मक निष्ठा ही उन्हें हाईकमान का भरोसेमंद चेहरा बनाती है। पार्टी का मानना है कि उनके नेतृत्व में गरियाबंद जिले में कांग्रेस को नई दिशा और नई ऊर्जा मिलेगी।
भाजपा संगठन में बढ़ता असंतोष
एक ओर कांग्रेस में नए नेतृत्व को लेकर उत्साह का माहौल है, वहीं दूसरी ओर भाजपा संगठन गरियाबंद में अंदरूनी घमासान खुलकर सामने आ गया है। जिला संगठन के पदाधिकारियों की हाल ही में जारी सूची ने असंतोष को और भड़का दिया है। इससे पहले जिले से भागीरथी मांझी, डॉ. राम कुमार साहू और राजेश साहू जैसे नेता जिला अध्यक्ष रह चुके हैं, जबकि वर्तमान में अनिल चंद्राकर यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
सूची जारी होते ही कई वरिष्ठ और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने खुलकर आपत्ति जताई है। नाराज कार्यकर्ताओं ने प्रदेश संगठन, प्रदेश अध्यक्ष और क्षेत्रीय संगठन मंत्री तक शिकायतें भेजी हैं। बावजूद इसके अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है, जिससे असंतोष और गहराता जा रहा है।
आने वाले दिनों में सियासी मुकाबला और तेज
कांग्रेस में नए नेतृत्व का उत्साह और भाजपा में संगठनात्मक खींचतान—ये दोनों ही हालात इस ओर साफ संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में गरियाबंद की राजनीति और अधिक रोचक, तीखी और प्रतिस्पर्धात्मक होने जा रही है। जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते ही सुखचंद बेसरा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं में विश्वास बनाए रखना और आगामी चुनावी रणनीति को मजबूत करना होगी।
फिलहाल इतना तय है कि कांग्रेस का यह बड़ा सियासी दांव केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि आगामी राजनीतिक लड़ाई की बुनियाद भी साबित हो सकता है।
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