गरियाबंद(गंगा प्रकाश)। गरियाबंद पुलिस की बड़ी सफलता: नक्सल मोर्चे पर पुलिस और शासन की आत्मसमर्पण-पुनर्वास नीति को एक और बड़ी सफलता मिली है। शासन की योजनाओं और आत्मसमर्पित साथियों के खुशहाल जीवन से प्रभावित होकर नगरी एरिया कमेटी की सचिव जानसी उर्फ वछेला मटामी (आठ लाख की ईनामी महिला माओवादी) ने हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है।
कौन है जानसी?
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले की रहने वाली जानसी का नक्सल संगठन से जुड़ाव साल 2005 में जनमिलिशिया सदस्य के रूप में हुआ। धीरे-धीरे उसने संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की और 2006 में चातगांव एलओएस कमांडर रनिता द्वारा औपचारिक रूप से संगठन में भर्ती की गई।
- 2007 में नर्मदा (डीव्हीसीएम) के गार्ड के रूप में नियुक्त हुई।
- 2008 में गरियाबंद पहुंचकर एसजेडसी-कार्तिक के साथ प्रेस और प्रचार-प्रसार का कार्य देखा।
- 2011 में कुख्यात डीव्हीसीएम सत्यम गावडे से विवाह कर मैनपुर डिवीजन में सक्रिय रही।
- 2014 से नगरी एरिया कमेटी की अहम जिम्मेदारी संभाली और धीरे-धीरे कमांडर व फिर सचिव के पद तक पहुंच गई।
नक्सल संगठन की असलियत
आत्मसमर्पण के दौरान जानसी ने माओवादी संगठन की खोखली और अमानवीय विचारधारा का खुलासा किया। उसने बताया कि—
- निर्दोष ग्रामीणों को सिर्फ पुलिस मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार दिया जाता है।
- छोटे-छोटे बच्चों और युवाओं को बहला-फुसलाकर जबरन संगठन में भर्ती किया जाता है।
- ग्रामीणों से राशन और सामान की लूट, विकास कार्यों में बाधा और ठेकेदारों से अवैध वसूली अब माओवादियों की पहचान बन चुकी है।
- बड़े माओवादी नेता अपने ही छोटे कैडरों का शोषण करते हैं।
शासन की नीति से प्रभावित
जानसी ने कहा कि शासन की आत्मसमर्पण-पुनर्वास योजना में समर्पित नक्सलियों को— पद के अनुरूप इनाम राशि,हथियार सौंपने पर अतिरिक्त इनाम राशि,स्वास्थ्य सुविधा,आवासरोजगार,जैसी सुविधाएं दी जाती हैं।
यही कारण है कि पहले ही कई माओवादी जैसे—आयतु, संजय, मल्लेश, मुरली, टिकेश, प्रमीला, लक्ष्मी, मैना, क्रांति, राजीव, ललिता, दिलीप, दीपक, मंजुला, सुनीता, कैलाश, रनिता, सुजीता, राजेंद्र—आत्मसमर्पण कर खुशहाल जीवन जी रहे हैं।
पति की मौत से टूटी, जंगल की जिंदगी से थकी
जानसी ने बताया कि उसके पति सत्यम गावडे की मुठभेड़ में मौत के बाद वह मानसिक रूप से टूट गई थी। जंगल की कठिन जिंदगी, माओवादी नेताओं की गुलामी और लगातार होते अत्याचारों ने उसके मन में बदलाव ला दिया। आत्मसमर्पित साथियों का बदला हुआ जीवन देखकर उसने भी आत्मसमर्पण करने का निर्णय लिया।
गरियाबंद पुलिस की बड़ी उपलब्धि
गरियाबंद पुलिस और सुकमा पुलिस की सक्रियता ने इस आत्मसमर्पण में विशेष भूमिका निभाई। लगातार गांव-जंगल में चलाए गए समर्पण नीति के प्रचार अभियान, पोस्टर-पंपलेट और ग्रामीणों से हुई बातचीत ने जानसी जैसे कुख्यात माओवादी को हथियार छोड़ शांति का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित किया।
विशेष बात – एक समय माओवादी संगठन की “सख्त सचिव” मानी जाने वाली जानसी अब शासन की पुनर्वास नीति के तहत नया जीवन शुरू करने जा रही है।
पुलिस का मानना है कि इस आत्मसमर्पण से न केवल माओवादी संगठन को बड़ा झटका लगा है बल्कि और भी सक्रिय नक्सली अब आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित होंगे।
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