Brekings: कमार जनजाति के नाम पर ‘जिओ ट्रैकिंग’ से ठगी का खेल! धरमपुर गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना में खुली शोषण की परतें, “दत्तक पुत्र” कहलाने वाली जनजाति बनी ठेकेदारों की बंधक

छुरा (गंगा प्रकाश) । “सरकारी मकान मिला है… पर उसमें दरवाज़ा नहीं है, खिड़की नहीं है, छत भी अधूरी है। हमने पूछा तो बोले – ‘काम हो जाएगा, चुपचाप रहो, नहीं तो पैसा वापस चले जाएगा।’” यह दर्द है धरमपुर गांव के कमर जनजाति के एक गरीब हितग्राही का, जो प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम पर ठगे जाने के बाद भी आज लाचार है, बेबस है।

गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड से महज 5 किलोमीटर दूर बसा धरमपुर गांव, जो ग्राम पंचायत खरखरा का आश्रित ग्राम है, वहां की कमर जनजाति, जिन्हें भारत सरकार ने “दत्तक पुत्र” घोषित किया है, आज भी सरकार की योजनाओं का वास्तविक लाभ लेने के बजाय भ्रष्टाचार और शोषण के कुचक्र में फंसे हुए हैं।

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प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) की मंशा थी कि देश के हर गरीब को सिर पर छत मिले, लेकिन यहां यह योजना ठेकेदारों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय “बुद्धिजीवियों” की लूट की मशीन बनकर रह गई है।

कागजों में पक्का मकान, जमीन पर कच्चा शोषण!

योजना के अंतर्गत प्रत्येक हितग्राही को ₹2 लाख की राशि स्वीकृत की गई थी, जिसमें चरणबद्ध तरीके से निर्माण कार्य होना था। शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि मकान का निर्माण हितग्राही स्वयं करे, मनरेगा श्रमिकों के माध्यम से श्रम सहायता मिले, तकनीकी सहायक दिशा-निर्देश दें और ठेका पद्धति को प्रोत्साहित नहीं किया जाए।

लेकिन धरमपुर गांव की सच्चाई यह है कि कोई भी मकान हितग्राही के नियंत्रण में नहीं है। सारे काम ठेकेदारों द्वारा किए जा रहे हैं, वो भी बिना किसी गुणवत्ता नियंत्रण के।

“किस्त कब आई, कितनी आई, किसने साइन करवाया — हमें कुछ नहीं बताया गया,” — यह बात लगभग हर हितग्राही ने कही।

‘जिओ ट्रैकिंग’ के नाम पर वसूली, ‘पेट्रोल खर्च’ के लिए भी पैसा!

शुरुआती प्रक्रिया में ही ‘जिओ ट्रैकिंग’ के नाम पर ₹200-300 की वसूली की गई। फिर “चाय-पानी”, “दौड़-भाग”, “बिल बनवाना है” जैसे बहानों पर ₹2000 से ₹3000 तक जबरन वसूले गए।

खिलेश्वर साहू, जिनका नाम ग्रामीणों ने मुख्य ठेकेदार के रूप में लिया, उन्होंने खुलेआम स्वीकार किया कि

“हां, हमने पैसे लिए हैं – जिओ ट्रैकिंग का खर्चा, पेट्रोल का खर्चा होता है, कोई मुफ्त में थोड़ी काम करेगा।”

चौंकाने वाली बात यह है कि साहू की नियुक्ति दस्तावेजों से पहले ही वह निर्माण कार्य कर रहे थे। मतलब – सरकारी व्यवस्था के पहले ही ठेकेदारी शुरू!

मकान की हालत देखिए — खिड़की नहीं, रोशनदान नहीं, दरवाजों की चौखट भी गायब

सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, मकान में कम से कम एक कमरा, एक हॉल, एक रसोई, रोशनदान व खिड़कियां होनी चाहिए, लेकिन धरमपुर के कई मकानों में सिर्फ दो अधूरी दीवारें खड़ी हैं।

एक मकान तो ऐसा मिला जिसमें न तो दरवाजे लगे थे, न खिड़कियां, और छत के लिए सिर्फ टीन की चादर रख दी गई थी। “ये सरकारी मकान है,” हितग्राही ने शर्माते हुए कहा — उसे यह भी नहीं पता था कि मकान अधूरा है।

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‘बुद्धिजीवी’ की छाया में जनजाति का भविष्य बंधक

धरमपुर में “बुद्धिजीवी ठेकेदार” और “आवास सहायक” ही योजना का नियंत्रण कर रहे हैं। गरीब, अनपढ़ हितग्राही उनके आदेशों पर दस्तखत कर देते हैं, किसी कागज को पढ़ने या समझने की कोई गुंजाइश नहीं होती।

“हमसे साइन करवा लेते हैं, हम पूछें तो कहते हैं – सरकारी काम है, मत पूछो ज्यादा।”

ये शब्द उस तंत्र को उजागर करते हैं जिसमें कमर जनजाति का आवाज़ उठाने का अधिकार भी छीन लिया गया है।

प्रशासन मौन, समझौते में दबा दिया गया अन्याय

एक बार पंचायत में शिकायत की गई, तो उसे ग्राम सभा में समझौते के नाम पर रफा-दफा कर दिया गया। न कोई जांच, न कोई कार्रवाई।

जनपद पंचायत छुरा के CEO सतीश चन्द्रवसी ने कहा:

“अगर शिकायत लिखित में आती है या समाचार माध्यमों से जानकारी मिलती है, तो जांच कर जिला स्तर पर कार्यवाही की जाएगी।”

परंतु यह बयान तब बेमानी हो जाता है जब कई महीने बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

फरियाद की आवाज़: “हमें पक्का मकान नहीं चाहिए, न्याय चाहिए”

यह रिपोर्ट सिर्फ एक गांव की नहीं है — यह पूरे राज्य में योजनाओं की स्थिति का प्रतिनिधि चेहरा हो सकती है। अगर “दत्तक पुत्र” कहे जाने वाले समाज के साथ यह होता है, तो बाकी समाज का क्या हाल होगा?

  • कमर जनजाति को न्याय कौन दिलाएगा?
  • जिओ ट्रैकिंग के नाम पर हो रही लूट के दोषी कौन हैं?
  • प्रशासन की नींद कब खुलेगी?

जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह योजना “प्रधानमंत्री आवास योजना” नहीं, बल्कि “ठेकेदार आवास योजना” बनकर रह जाएगी।


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