सरपंच की सील-मोहर से इकरारनामे पर गवाही का मामला सप्ताहभर बाद भी ठंडे बस्ते में? विक्रेता का दावा- 3 लाख रु में सौदा, मुझे मिले 1.70 लाख रु, बाकी रकम दलालों ने रख ली

ग्राम पंचायत लोहझर के आश्रित ग्राम खट्टी का मामला, सामने आए नए आरोपों से जांच की जरूरत और बढ़ी

छुरा (गंगा प्रकाश)। ग्राम पंचायत लोहझर के आश्रित ग्राम खट्टी में खसरा नंबर 246 की करीब 1000 वर्गफुट जमीन के 3 लाख रु में किए गए इकरारनामे और उस पर ग्राम पंचायत की सील-मोहर के साथ सरपंच यशवंत ठाकुर के गवाह के रूप में हस्ताक्षर का मामला अब नया मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। इस मामले को लेकर पूर्व में खबर प्रकाशित होने के बाद भी एक सप्ताह गुजर जाने के बावजूद राजस्व विभाग की ओर से अब तक किसी ठोस कार्रवाई अथवा विभागीय आदेश की जानकारी सामने नहीं आई है।

खास बात यह है कि पिछले समाचार में एसडीएम विशाल महाराणा ने स्वयं कहा था कि शासकीय/आबादी भूमि में इस तरह का इकरारनामा वैध नहीं है और सरपंच द्वारा सील-मोहर लगाकर प्रमाणित किया जाना गलत है। इसके बावजूद मामला सामने आने के बाद संबंधित अधिकारियों की ओर से अब तक कोई स्पष्ट कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब प्रशासनिक अधिकारी स्वयं दस्तावेज की वैधानिकता और सील-मोहर के इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर चुके हैं, तो फिर जांच की प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ी?

सप्ताह गुजर गया, कार्रवाई का इंतजार

मामले में सामने आए दस्तावेज में ग्राम खट्टी, प.ह.नं. 11, खसरा नंबर 246 की करीब 1000 वर्गफुट जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताते हुए 3 लाख रु में सौदे का उल्लेख है। दस्तावेज में कब्जा सौंपने और भविष्य में पंजीयन कराने की बात भी दर्ज है।

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इस इकरारनामे पर सरपंच यशवंत ठाकुर के हस्ताक्षर और ग्राम पंचायत की सील-मोहर का इस्तेमाल किया गया है। सरपंच का कहना है कि क्रेता-विक्रेता उनके पास अन्य गवाहों के साथ आए थे और उन्होंने जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताया था। इसी आधार पर उन्होंने गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए।

लेकिन अब सवाल सिर्फ जमीन की खरीदी-बिक्री तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या पंचायत की आधिकारिक सील-मोहर का इस्तेमाल इस तरह के निजी जमीन इकरारनामे में किया जा सकता है? यदि नहीं, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

नया मोड़ : सामने आया दलालों का कथित नेटवर्क

खबर प्रकाशित होने के बाद इसी मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। स्थानीय स्तर पर यह आरोप सामने आया है कि आबादी भूमि की खरीद-बिक्री के लिए भूमाफिया और दलालों का एक नेटवर्क सक्रिय है, जो कथित तौर पर गरीब परिवारों को पहले जमीन पर कब्जा करने के लिए प्रेरित करता है और कुछ समय बाद उसी जमीन को “पुश्तैनी काबिज भूमि” बताकर बिक्री कराने का प्रयास करता है।

आरोप है कि इस कथित खेल में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को जमीन के बदले मिलने वाली पूरी रकम नहीं मिलती। जमीन का सौदा मोटी रकम में कराने के बाद उसमें से एक हिस्सा विक्रेता को दिया जाता है और बाकी रकम कथित रूप से बिचौलियों के बीच बंट जाती है।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसी मामले में विक्रेता की ओर से किए गए दावे ने पूरे प्रकरण की गंभीरता बढ़ा दी है।

विक्रेता का दावा- 3 लाख रु में हुआ सौदा, मुझे मिले 1.70 लाख रु

इस मामले में विक्रेता लाल सिंह कमार की ओर से दावा किया गया है कि संबंधित जमीन का सौदा 3 लाख रु में हुआ था। उनके अनुसार, उन्हें इस सौदे के एवज में 1 लाख 70 हजार रुपये ही प्राप्त हुए, जबकि शेष राशि उन्हें नहीं मिली।

विक्रेता के अनुसार, जमीन की खरीदी-बिक्री कराने में दलालों की भूमिका रही और बाकी रकम कथित रूप से दलालों ने रख ली।

यदि यह दावा सही पाया जाता है तो जांच का दायरा केवल इकरारनामे और पंचायत की सील-मोहर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जमीन के सौदे में शामिल बिचौलियों, रकम के लेन-देन और संबंधित पक्षों की भूमिका की भी जांच जरूरी होगी।

हालांकि यह विक्रेता का कथन है और इसकी पुष्टि संबंधित दस्तावेजों, भुगतान के प्रमाण तथा स्वतंत्र जांच से होना बाकी है।

क्या गरीबों की जमीन पर नजर रखता है कथित दलाल तंत्र?

ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन से जुड़े मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे जमीन के सौदे कराए जा रहे हैं?

यदि कोई व्यक्ति वर्षों से किसी भूमि पर काबिज है तो उसके अधिकार की वास्तविक स्थिति राजस्व रिकॉर्ड और कानून के अनुसार तय होनी चाहिए। केवल लंबे समय तक कब्जा रहने या उसे “पुश्तैनी काबिज” कह देने से जमीन की वैधानिक बिक्री का अधिकार स्वतः पैदा नहीं हो जाता।

यही कारण है कि इस मामले में प्रशासन को यह जांचना चाहिए कि संबंधित भूमि का इतिहास क्या है और लाल सिंह कमार के पास उक्त जमीन पर अधिकार किस आधार पर था।

आरक्षित भूमि होने की बात भी जांच के घेरे में

इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पूर्व में स्थानीय सूत्रों से यह जानकारी सामने आई थी कि संबंधित भूमि को वर्षों पहले शासकीय विद्यालय अथवा ITI कॉलेज जैसे सार्वजनिक/शैक्षणिक प्रयोजन के लिए आरक्षित किया गया हो सकता है।

हालांकि इस तथ्य की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि खसरा नंबर 246 वास्तव में ITI कॉलेज या शासकीय विद्यालय के लिए आरक्षित था।

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लेकिन यदि जांच में ऐसा कोई पुराना पंचायत प्रस्ताव, राजस्व रिकॉर्ड अथवा शासकीय आदेश सामने आता है तो मामला और गंभीर हो सकता है। ऐसे में यह भी देखना होगा कि आरक्षित भूमि पर निजी कब्जा कैसे हुआ और बाद में उसे पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताकर बिक्री का प्रयास कैसे हुआ।

सरपंच की भूमिका पर फिर उठे सवाल

पूरे प्रकरण में सरपंच यशवंत ठाकुर की भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन गई है।

सरपंच पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उन्होंने गवाह के रूप में दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और पंचायत की सील-मोहर लगाई थी। उनका कहना है कि उन्हें पक्षकारों ने जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताया था।

  • लेकिन अब जब विक्रेता द्वारा जमीन के सौदे में दलालों की भूमिका और रकम में अंतर का दावा सामने आया है, तो सवाल यह उठता है कि क्या इकरारनामे पर हस्ताक्षर और पंचायत की सील लगाने से पहले जमीन की वास्तविक स्थिति की जांच की गई थी?
  • क्या खसरा नंबर 246 का राजस्व रिकॉर्ड देखा गया था?
  • क्या पंचायत के रिकॉर्ड में उक्त जमीन का कोई उल्लेख था?
  • क्या संबंधित जमीन के संबंध में कोई आरक्षण अथवा सार्वजनिक प्रयोजन दर्ज था?
  • यदि कोई जांच नहीं की गई थी तो पंचायत की आधिकारिक सील-मोहर लगाने का आधार क्या था?

इन सभी सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकता है।

एसडीएम के बयान के बाद कार्रवाई की उम्मीद

पिछली खबर में एसडीएम विशाल महाराणा ने स्पष्ट कहा था कि शासकीय/आबादी भूमि में इस तरह का इकरारनामा वैध नहीं है। उन्होंने सरपंच द्वारा सील-मोहर लगाकर प्रमाणित किए जाने को भी गलत बताया था।

एसडीएम ने मामले की जांच कराए जाने और जांच में खामियां सामने आने पर संबंधित के खिलाफ उचित कार्रवाई किए जाने की बात कही थी।

  • अब एक सप्ताह बीतने के बाद सवाल यह है कि जांच शुरू हुई या नहीं? यदि शुरू हुई है तो अब तक किन दस्तावेजों की जांच की गई? क्या खसरा नंबर 246 का रिकॉर्ड मंगाया गया? क्या पंचायत से इकरारनामे के संबंध में जवाब मांगा गया? क्या जमीन के पूर्व आरक्षण की जांच की गई? और क्या कथित दलालों की भूमिका को भी जांच में शामिल किया गया?

सिर्फ इकरारनामा नहीं, पूरे नेटवर्क की जांच जरूरी

इस मामले में यदि विक्रेता का यह दावा सही पाया जाता है कि 3 लाख रु के सौदे में उसे केवल 1.70 लाख रु मिले और शेष राशि दलालों के पास चली गई, तो यह केवल जमीन की वैधता का मामला नहीं रहेगा।

प्रशासन को यह भी देखना होगा कि जमीन का सौदा किसने कराया, खरीदार और विक्रेता के बीच संपर्क किसने कराया, भुगतान किस माध्यम से हुआ, कितनी रकम किसे दी गई और दस्तावेज तैयार कराने में किन लोगों की भूमिका रही।

साथ ही यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि क्या इसी तरह के अन्य जमीन सौदों में भी वही लोग सक्रिय रहे हैं।

यदि जांच में एक संगठित तरीके से गरीब परिवारों की जमीन के सौदे कराने का कोई पैटर्न सामने आता है तो प्रशासन को केवल इस एक मामले तक सीमित रहने के बजाय पूरे मामले की विस्तृत जांच करनी चाहिए।

अब बड़ा सवाल—क्या खुलेगा जमीन के सौदों का पूरा राज?

ग्राम खट्टी के खसरा नंबर 246 का मामला अब केवल एक जमीन के इकरारनामे का मामला नहीं रह गया है। एक तरफ दस्तावेज में जमीन को पुश्तैनी काबिज आबादी भूमि बताया गया है, दूसरी तरफ सरपंच की सील-मोहर और गवाही सामने आई है। फिर एसडीएम ने ऐसे इकरारनामे को वैध नहीं माना और सील-मोहर लगाकर प्रमाणित करने को गलत बताया।

अब विक्रेता की ओर से 3 लाख रु के सौदे में 1.70 लाख रु मिलने और शेष रकम कथित दलालों द्वारा रखे जाने का दावा सामने आने से जांच के नए दरवाजे खुल गए हैं।

हालांकि भूमाफिया, दलालों की भूमिका और विक्रेता द्वारा बताए गए रकम के बंटवारे संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। इसलिए इन आरोपों को जांच के निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित पक्ष के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।

अब नजर राजस्व विभाग की अगली कार्रवाई पर है। सवाल यही है कि जब दस्तावेज सामने है, सरपंच की सील-मोहर सामने है, विक्रेता का बयान सामने है और एसडीएम जांच की बात कह चुके हैं, तो आखिर विभागीय कार्रवाई का फरमान कब जारी होगा?

एक सप्ताह बीतने के बाद भी यदि फाइलों में सन्नाटा है, तो क्या इस मामले में भी जांच शुरू होने का इंतजार ही चलता रहेगा—या फिर खसरा नंबर 246 से जुड़े पूरे सच की परतें जल्द खुलेंगी?

नोट – खबर में तस्वीर लगाया गया है वह तस्वीर फाइल फोटो (कार्टून) है।

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