1990 से 2019 और फिर 2020 के राजस्व रिकॉर्ड का हवाला, सीमांकन पंचनामा नहीं बनने और अलग-अलग जांच रिपोर्टों को लेकर शिकायतकर्ता ने उठाए सवाल; 2026 में सीएम हेल्पलाइन तक पहुंचा मामला
गरियाबंद/देवभोग (गंगा प्रकाश)। एक कृषि भूमि का नामांतरण… राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज अलग-अलग नाम… पुलिस जांच में सामने आया एक अलग दावा… और इसके बाद तैयार हुईं जांच रिपोर्टों को लेकर उठते सवाल। गरियाबंद जिले के देवभोग तहसील से जुड़ा जमीन नामांतरण का एक मामला अब शिकायतों के कई पड़ाव पार कर सीएम हेल्पलाइन और कलेक्टर जनदर्शन तक पहुंच चुका है। शिकायतकर्ता ने कलेक्टर गरियाबंद, एसडीएम देवभोग और तहसीलदार देवभोग सहित संबंधित अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए पूरे मामले की जांच और कार्रवाई की मांग की है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस दस्तावेज से नहीं होती है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष इसमें उपलब्ध नहीं है।
मामला ग्राम गाडाघाट, तहसील देवभोग की कृषि भूमि से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार भूमि का खसरा नंबर 165 और रकबा 0.40 है। शिकायतकर्ता सदेश सोनवानी, निवासी ग्राम नाउमुड़ा, तहसील मैनपुर, जिला गरियाबंद ने दावा किया है कि उक्त जमीन उनके नाना स्वर्गीय जगदीश राम के नाम से दर्ज थी। शिकायत में कहा गया है कि उनके नाना को वर्ष 1985 में उक्त भूमि का पट्टा प्राप्त हुआ था।
2019 में रिकॉर्ड खंगाला तो सामने आया नाम का फेरबदल
शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2019 में देवभोग तहसील के राजस्व रिकॉर्ड में जमीन संबंधी पड़ताल करने पर उन्हें कथित रूप से पता चला कि रिकॉर्ड में बदलाव कर जमीन का नामांतरण किसी अन्य व्यक्ति के नाम किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इस प्रक्रिया में कलेक्टर की अनुमति के बिना नामांतरण किया गया।
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शिकायत में वर्ष 2019 के भुइयां सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार खसरा नंबर 165, रकबा 0.40 भूमि बिंबाधर पिता गोपीनाथ, जाति माली, ग्राम गाडाघाट के नाम दर्ज होने का दावा किया गया है। वहीं शिकायतकर्ता ने अपने नाना जगदीश राम को गांडा जाति से संबंधित बताते हुए यह तर्क दिया है कि ऐसी भूमि के नामांतरण के लिए कलेक्टर की अनुमति आवश्यक थी।

पुलिस जांच में भी आया अलग दावा
मामला यहीं नहीं रुका। शिकायतकर्ता ने वर्ष 2020 में 21 जनवरी को पुलिस अधीक्षक गरियाबंद के समक्ष शिकायत देने की बात कही है। इसके बाद मामला देवभोग थाना भेजे जाने और शिकायतकर्ता तथा बिंबाधर पिता गोपीनाथ माली के बयान दर्ज किए जाने का उल्लेख शिकायत में है।
शिकायत के मुताबिक पुलिस जांच के दौरान बिंबाधर ने कथित रूप से थाना देवभोग में बयान दिया कि खसरा नंबर 165, रकबा 0.40 भूमि उनकी स्वयं की जमीन है और वर्ष 1999 के पारिवारिक बंटवारे में उन्हें मिली थी। उन्होंने जमीन पर खेती करने और बैंक संबंधी लेन-देन होने की बात भी कथित रूप से कही थी।
इसके बाद तत्कालीन थाना प्रभारी देवभोग द्वारा 2 मार्च 2020 को तहसीलदार देवभोग को पत्र लिखकर यह जानकारी मांगे जाने का उल्लेख है कि उक्त भूमि बिंबाधर के नाम किस आधार पर नामांतरित हुई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस पत्र का जवाब नहीं दिया गया और भूमि का सीमांकन पंचनामा भी तैयार नहीं किया गया।
एक ही जमीन, अलग-अलग वर्षों में अलग नाम
शिकायतकर्ता का सबसे बड़ा सवाल राजस्व रिकॉर्ड में जमीन के नाम को लेकर है। शिकायत के अनुसार वर्ष 2020 में पुलिस शिकायत के बाद भी तहसीलदार और पटवारी द्वारा दोबारा कथित रूप से रिकॉर्ड में बदलाव कर खसरा नंबर 165 की जमीन को छबी राम पिता ओटी राम के नाम दर्ज कर दिया गया।
इसके बाद वर्ष 2024 में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगने पर शिकायतकर्ता को कथित जांच रिपोर्ट दी गई। शिकायत में दावा किया गया है कि उस रिपोर्ट में जमीन वर्ष 1990 से छबी राम के नाम दर्ज होना बताया गया, जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2019-20 के रिकॉर्ड में यही जमीन बिंबाधर के नाम दर्ज थी और पुलिस जांच के दौरान बिंबाधर ने भी जमीन को अपना बताया था।
यही विरोधाभास शिकायत का मुख्य आधार बनता दिखाई देता है—यदि जमीन वर्ष 1990 से छबी राम के नाम थी तो बाद के रिकॉर्ड में बिंबाधर का नाम कैसे आया और किस आधार पर नामांतरण हुआ? इस सवाल का स्पष्ट जवाब शिकायतकर्ता ने संबंधित अधिकारियों से मांगा है।

कलेक्टर के पत्र के बाद भी मामला आगे बढ़ा
शिकायत के अनुसार वर्ष 2024 में कलेक्टर गरियाबंद के समक्ष भी आवेदन प्रस्तुत किया गया। इसके बाद 4 सितंबर 2024 को पत्र क्रमांक 4219 के माध्यम से मामला अनुविभागीय अधिकारी राजस्व देवभोग को भेजे जाने का उल्लेख है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद जमीन का सीमांकन पंचनामा तैयार नहीं किया गया और कथित फर्जी नामांतरण की जांच नहीं हुई।
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शिकायत में आगे कहा गया है कि तहसीलदार देवभोग द्वारा 15 जून 2026 को पत्र क्रमांक 534 के माध्यम से कलेक्टर को ज्ञापन भेजा गया, जिसमें कथित रूप से प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन होने की बात कही गई। शिकायतकर्ता ने इस दावे को गलत बताया है और कहा है कि तहसीलदार के स्तर पर ऐसा कोई प्रकरण दर्ज नहीं था तथा मामला किसी न्यायालय में विचाराधीन नहीं था।
एसडीएम की रिपोर्ट पर भी सवाल
मामले में एसडीएम देवभोग की कार्रवाई को लेकर भी शिकायत में सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार 10 अगस्त 2026 को पत्र क्रमांक 433 और 19 अगस्त 2026 को पत्र क्रमांक 442 जारी किए गए। शिकायत में आरोप है कि इन रिपोर्टों में जमीन को वर्ष 1990 से छबी राम के नाम दर्ज बताया गया, जबकि शिकायतकर्ता ने पूर्व राजस्व रिकॉर्ड और पुलिस बयान का हवाला देते हुए इसे विरोधाभासी बताया है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच के दौरान न तो जमीन का सीमांकन पंचनामा तैयार किया गया और न ही नामांतरण की मूल प्रक्रिया की पर्याप्त जांच की गई। इन आरोपों की पुष्टि या खंडन संबंधित विभागीय अभिलेखों और स्वतंत्र जांच से ही हो सकेगा।
सीएम हेल्पलाइन में भी दर्ज हुई शिकायत
मामले ने जुलाई 2026 में एक और मोड़ लिया। शिकायतकर्ता के अनुसार 4 जुलाई 2026 को सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसका क्रमांक WP260700071672 है। शिकायत को राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग से संबंधित अधिकारियों के पास भेजे जाने का उल्लेख दस्तावेज में है।
सीएम हेल्पलाइन से जुड़े दस्तावेज में शिकायतकर्ता द्वारा कृषि भूमि के कथित गलत नामांतरण और जमीन से वंचित किए जाने के संबंध में कार्रवाई की मांग दर्ज दिखाई देती है। रिकॉर्ड में शिकायत की प्रक्रिया के विभिन्न स्तर भी दर्ज हैं, जिनमें तहसीलदार, उपखंड अधिकारी और कलेक्टर स्तर की गतिविधियों का उल्लेख है।
दस्तावेज के अनुसार शिकायत बाद में ‘विशेष क्लोजर’ की स्थिति तक पहुंची। शिकायतकर्ता ने इस कार्रवाई पर भी आपत्ति जताई है और आरोप लगाया है कि जांच वास्तविक तथ्यों के आधार पर नहीं की गई।
अब जांच से साफ हो सकता है पूरा सच
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब यही है कि खसरा नंबर 165, रकबा 0.40 की भूमि का वास्तविक और वैधानिक नामांतरण किस आधार पर हुआ? वर्ष 1985 के पट्टे, वर्ष 1990 से संबंधित कथित रिकॉर्ड, वर्ष 2019-20 में दर्ज नाम, पुलिस जांच में सामने आए बयान और वर्ष 2024 तथा 2026 की कथित जांच रिपोर्ट—इन सभी दस्तावेजों का आपस में मिलान किए बिना विवाद का अंतिम निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
शिकायतकर्ता ने मामले में संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच, जमीन का सीमांकन पंचनामा तैयार कराने, राजस्व रिकॉर्ड की जांच तथा कथित फर्जी नामांतरण और जांच रिपोर्टों की सत्यता की जांच कराने की मांग की है। साथ ही शिकायत में अधिकारियों पर दो लाख रुपये रिश्वत लेने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। यह आरोप शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए हैं और उपलब्ध दस्तावेज से इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती।
अब देखना यह होगा कि राजस्व विभाग के मूल रिकॉर्ड, नामांतरण आदेश, पट्टा दस्तावेज, सीमांकन अभिलेख, पुलिस जांच की केस डायरी और संबंधित अधिकारियों द्वारा तैयार रिपोर्टों की निष्पक्ष जांच होती है या नहीं। क्योंकि इस पूरे मामले में असली तस्वीर कागजों के अलग-अलग पन्नों में दर्ज नामों को एक साथ देखने के बाद ही सामने आ सकती है।





