छुरा (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा एक बार फिर सुर्खियों में है। कभी गरीब प्रसूता से पैसे वसूलने और आदिवासी महिला से थूकदान साफ करवाने जैसी शर्मनाक हरकत तो कभी प्रशिक्षु डॉक्टर की लापरवाही से 14 वर्षीय बच्ची की मौत – दोनों घटनाओं ने मिलकर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। ग्रामीणों का सवाल साफ है – “आखिर कब तक छुरा अस्पताल की लापरवाहियों की कीमत आम लोगों को अपनी जान और इज़्ज़त से चुकानी पड़ेगी?”

मामला-1: प्रसव के नाम पर वसूली और आदिवासी महिला से थूकदान साफ करवाया गया

15 अगस्त को ग्राम पेंड्रा की तीजन बाई ध्रुव प्रसव के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा पहुँची। आरोप है कि अस्पताल स्टाफ ने उससे खुलेआम पैसे की मांग की। इतना ही नहीं, मरीज के साथ आई एक आदिवासी दाई को सेवा-सुश्रुषा के बजाय अस्पताल का थूकदान साफ करने के लिए मजबूर कर दिया गया।

ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में प्रसव निःशुल्क होना चाहिए, लेकिन यहाँ खुलेआम गरीबों से वसूली की जा रही है। यह घटना जननी सुरक्षा योजना और मुख्यमंत्री सुरक्षित मातृत्व योजना जैसे सरकारी दावों की सच्चाई उजागर करती है।

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मामला-2: 14 वर्षीय जिज्ञासा की मौत – प्रशिक्षु डॉक्टर पर गंभीर आरोप

इसके कुछ ही दिन बाद 15 जुलाई की रात वार्ड नं. 12, झूलेलाल पारा निवासी 14 वर्षीय जिज्ञासा को पेट दर्द और सीने में जलन की शिकायत पर छुरा अस्पताल लाया गया। परिजनों ने आरोप लगाया कि ड्यूटी पर मौजूद प्रशिक्षु डॉक्टर अभिषेक ने बच्ची को गंभीरता से न देखकर सिर्फ प्राथमिक इलाज किया और रायपुर रेफर कर दिया।

इस बीच डॉक्टर ने ऐसी दवाइयाँ दीं जिनके बारे में परिजनों का आरोप है कि – “डॉक्टर ने ओवरडोज़ दवा दे दी, जिससे हालत और बिगड़ गई।”

16 जुलाई की रात 3 बजे परिजन उसे कुर्रा के आयुष्मान हॉस्पिटल ले गए, जहाँ डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

लेकिन विरोधाभास यह था कि गोबरा-नयापारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने कहा – “मौत ओवरडोज़ से हुई है, पोस्टमार्टम जरूरी है।”

जबकि स्थानीय डॉक्टर ने घर पर जाँच कर कहा – “मौत को लगभग 1 घंटा हो चुका है।”

यानी एक ही मामले में अलग-अलग डॉक्टरों के परस्पर विरोधाभासी बयान सामने आए, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई।

परिजनों का दर्द और आक्रोश

जिज्ञासा के पिता प्रकाश कुमार यादव (पत्रकार) का कहना है –” हमारी बेटी अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसकी मौत व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। प्रशिक्षु डॉक्टर की लापरवाही ने उसकी जान ले ली। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और भविष्य में किसी और बेटी को ऐसा दर्द न झेलना पड़े।”

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ग्रामीणों का गुस्सा और सवाल

दोनों घटनाओं के बाद ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आक्रोश उभर कर सामने आया है। उनका कहना है –

  1. अस्पताल स्टाफ गरीब प्रसूताओं से पैसे वसूल रहा है।
  2. आदिवासी महिलाओं को अपमानजनक काम करवाया जा रहा है।
  3. प्रशिक्षु डॉक्टर गंभीर मरीजों का इलाज करने में नाकाम हैं।
  4. जिला स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रबंधन चुप्पी साधे हुए हैं।
  5. ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे उग्र आंदोलन करेंगे।

प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी

अब तक न तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा और न ही जिला स्वास्थ्य विभाग ने इन दोनों घटनाओं पर कोई ठोस कदम उठाया है। बीएमओ का कहना है कि उन्होंने आवेदन जिले के उच्च अधिकारियों को भेज दिया है, लेकिन हकीकत यह है कि आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

 सवालों के घेरे में पूरा स्वास्थ्य तंत्र

  • क्या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा भ्रष्टाचार और लापरवाही का अड्डा बन चुका है?
  • क्यों गरीबों और आदिवासियों को ही सबसे ज्यादा शोषण का शिकार होना पड़ता है?
  • क्या प्रशिक्षु डॉक्टरों पर निर्भर रहना सीधे-सीधे जनता की जान से खिलवाड़ नहीं है?
  • और सबसे बड़ा सवाल – प्रशासन कब जागेगा?

यह रिपोर्ट सिर्फ दो घटनाओं की कहानी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र का आईना है। छुरा अस्पताल की ये लापरवाहियाँ अगर यूँ ही जारी रहीं तो आने वाले दिनों में और भी निर्दोष जानें जाती रहेंगी।


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