दंतेवाड़ा/रायपुर (गंगा प्रकाश)। नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले से एक बड़ा भ्रष्टाचार कांडसामने आया है। आदिवासी विकास विभाग में पिछले 5 वर्षों से नियमों को ताक पर रखकर जिला खनिज न्यास (DMF) की 18 करोड़ से अधिक राशि का दुरुपयोग किया गया। फर्जी टेंडर और कागजी विज्ञापन के जरिए किए गए इस खेल में विभाग के तत्कालीन दो सहायक आयुक्तों की गिरफ्तारी हुई है, जबकि एक बाबू अभी भी फरार है।
रविवार देर रात हुई इस कार्रवाई में डॉ. आनंद जी सिंह को जगदलपुर से और के.एस. मसराम को रायपुर से गिरफ्तार किया गया है। वहीं, विभागीय लिपिक संजय कोडोपी अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। यह छत्तीसगढ़ गठन के बाद पहला मामला है जब किसी विभाग के दो पूर्व सहायक आयुक्तों पर एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी की गई हो।

कैसे हुआ घोटाले का खुलासा?
मामले की शिकायत कलेक्टर कुणाल दुदावत तक पहुंची थी। कलेक्टर ने जांच बिठाई, जिसमें पाया गया कि 2021 से अब तक विभाग ने 45 फर्जी टेंडर जारी किए। टेंडर प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया, किसी भी समाचार पत्र में वैध विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया गया। इसके बजाय प्रिंटिंग प्रेस से नकली विज्ञापन छपवाकर A-4 पेपर पर हूबहू अख़बार जैसा दिखाकर फाइल में लगाया गया।
इन फर्जी विज्ञापनों के जरिए पसंदीदा ठेकेदारों को करोड़ों के कार्य आबंटित किए गए और विकास कार्यों की राशि का बंटवारा कर लिया गया।
किन-किन कार्यों में हुआ फर्जीवाड़ा?
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, करोड़ों के जिन निर्माण कार्यों के नाम पर टेंडर निकाले गए, उनमें शामिल हैं:
- मुक्तिधाम निर्माण कार्य (भाग 1 से 11) – ₹280.52 लाख,सर्व आदिवासी भवन प्रथम तल निर्माण – ₹48.32 लाख,माता रुकमणी आवासीय विद्यालय कन्या छात्रावास – ₹89.79 लाख,एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय कुआकोंडा में शेड – ₹11.30 लाख,100 सीटर कन्या आश्रम गाटम – ₹212.00 लाख,100 सीटर छात्रावास बालूद – ₹288.59 लाख इनके अलावा भी कई फर्जी निर्माण और सामाग्री आपूर्ति कार्य सामने आए हैं। कुल मिलाकर 18.63 करोड़ रुपये की राशि बंदरबांट की गई।
एफआईआर और धाराएं
वर्तमान सहायक आयुक्त राजू कुमार नाग ने कोतवाली थाने में लिखित शिकायत दी, जिसके आधार पर पुलिस ने धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 61(2) के तहत मामला दर्ज किया।
दोनों आरोपी अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि फरार लिपिक संजय कोडोपी की तलाश जारी है।
के.एस. मसराम पर पुराने आरोप भी गंभीर
30 अप्रैल 2025 को सेवानिवृत्त हुए के.एस. मसराम पर पहले से ही कई गंभीर आरोप हैं:
- 19 करोड़ रुपये की गड़बड़ी (पिछले 3 वर्षों में),सामग्री आपूर्ति मद (54 लाख रुपये) में अनियमितता,बीजापुर में DMF की 3.14 करोड़ की बंदरबांट,13 कार्यों में 10.40 करोड़ रुपये की गड़बड़ी (2021–23) सूत्रों के मुताबिक, पीएमओ तक शिकायत पहुंचने के बाद उनकी पेंशन रोक दी गई है। अब गिरफ्तारी के बाद इन मामलों में भी जांच तेज हो सकती है।
घोटाले का ‘फॉर्मूला’
इस पूरे खेल में अपनाई गई रणनीति थी:
- टेंडर प्रक्रिया को गोपनीय रखना,समाचार पत्र में नकली विज्ञापन प्रकाशित करना,फाइलों में हेराफेरी करना,चहेते ठेकेदारों को काम आबंटित करना,विकास कार्यों को सिर्फ कागजों पर दिखाना
आगे क्या?
जांच एजेंसियां अब ठेकेदारों की भूमिका की भी जांच कर रही हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में और बड़े नाम बेनकाब हो सकते हैं।
फिलहाल दंतेवाड़ा में यह गिरफ्तारी चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गई है। विभागीय महकमे में हड़कंप मचा हुआ है और “DMF की राशि खाने वाले अफसरों की लिस्ट और लंबी हो सकती है” – यह अफसर खुद मान रहे हैं।