CG: शासकीय स्कूल, लेकिन निजी स्कूल जैसी पढ़ाई! गरियाबंद जिले का पी.एम . श्री शासकीय प्राथमिक शाला, धौंराकोट बना शिक्षा का आदर्श मॉडल

 

देवभोग/गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। शासकीय स्कूल लेकिन निजी स्कूल जैसी पढ़ाई! “जहाँ चाह होती है, वहाँ राह निकल ही आती है” — इस कहावत को साकार कर रहा है गरियाबंद जिले का एक सरकारी स्कूल, जो आज निजी स्कूलों को कड़ी टक्कर दे रहा है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पी.एम. श्री शासकीय प्राथमिक शाला, धौंराकोट की, जो विकासखंड देवभोग में स्थित है और अब जिलेभर में एक आदर्श शासकीय स्कूल के रूप में उभरकर सामने आ रहा है।

शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक सरकारी स्कूल, जिसकी छवि वर्षों तक उपेक्षित और साधारण ढांचे से जुड़ी रही, वह इस कदर बदलेगा कि आसपास के निजी स्कूल भी पीछे छूट जाएँगे। धोराकोट की यह शासकीय प्राथमिक शाला अब शिक्षा, अनुशासन, संसाधन और नवाचार के क्षेत्र में मिसाल बन चुकी है।

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निजी नहीं, सरकारी स्कूल में अब ‘प्रीमियम’ पढ़ाई

इस स्कूल में बच्चों को केवल किताबों तक सीमित शिक्षा नहीं दी जा रही, बल्कि उन्हें समग्र विकास की दिशा में तैयार किया जा रहा है। यहाँ न सिर्फ मुफ्त शिक्षा दी जा रही है, बल्कि वह माहौल भी दिया जा रहा है जो आमतौर पर प्राइवेट स्कूलों में भारी फीस लेकर उपलब्ध कराया जाता है।

विद्यालय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • निःशुल्क गणवेश व पाठ्यपुस्तकें: हर बच्चे को वर्ष के शुरुआत में ही पूरी किट दी जाती है ताकि वे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से स्कूल आ सकें।
  • उच्च गुणवत्ता वाला मध्यान्ह भोजन: यहाँ भोजन सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि पोषण से भरपूर और स्वादिष्ट होता है। भोजन में स्थानीय और पौष्टिक व्यंजन शामिल होते हैं।
  • संगीत व बाध्ययंत्र शिक्षा: यहाँ बच्चों को तबला, हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों की भी शिक्षा दी जाती है, जिससे उनमें सांस्कृतिक समझ भी विकसित हो रही है।
  • सामान्य ज्ञान व प्रतियोगिताएं: सप्ताहिक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताएं, प्रश्नोत्तरी, और संवाद सत्र आयोजित किए जाते हैं जिससे बच्चों की बौद्धिक क्षमता में वृद्धि हो रही है।
  • योग व व्यायाम: रोज़ाना योगाभ्यास से बच्चों का शारीरिक और मानसिक संतुलन बना रहता है।
  • खेलकूद प्रतियोगिताएं: कबड्डी, खो-खो, दौड़ प्रतियोगिताएं सहित अन्य खेलों के ज़रिए बच्चों में टीम भावना और नेतृत्व कौशल विकसित किया जा रहा है।
  • जन्मदिन की बधाई संस्कृति: विद्यालय में हर बच्चे के जन्मदिन को पूरे कक्षा में मनाया जाता है, जिससे उनमें विशेष होने की भावना जागती है।
  • पुस्तकालय व वाचनालय: यह सुविधा बच्चों की पढ़ने की आदतों को बढ़ावा देती है। किताबों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।
  • स्वास्थ्य जांच शिविर: साल में दो बार स्वास्थ्य शिविर लगते हैं जहाँ बच्चों की आँख, दाँत, रक्त जांच आदि होती है।
  • आरओ युक्त पेयजल सुविधा: शुद्ध पेयजल से बच्चों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई है।
  • फर्नीचर युक्त कक्षा-कक्ष: अब बच्चे ज़मीन पर नहीं, आरामदायक बेंच और डेस्क पर बैठकर पढ़ते हैं।

प्रशिक्षित शिक्षक और समर्पण का परिणाम

इस अद्भुत परिवर्तन के पीछे शिक्षकों की मेहनत, दूरदर्शिता और प्रशासन का सहयोग है। विद्यालय में कार्यरत शिक्षक सिर्फ किताबें पढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों की ज़िंदगी संवारने की भावना से कार्य कर रहे हैं। वे स्कूल को घर जैसा माहौल देने में विश्वास रखते हैं।

प्रधानपाठक और स्टाफ मिलकर बच्चों की उपस्थिति पर खास ध्यान देते हैं। कम उपस्थिति वाले बच्चों के घर तक जाकर माता-पिता से संवाद किया जाता है। यही कारण है कि यहाँ ड्रॉपआउट रेट लगभग शून्य है।

 गरियाबंद जिले के 7 आदर्श स्कूलों में एक

जिले के शिक्षा विभाग द्वारा चिन्हित 7 विशेष स्कूलों में धोराकोट की शाला भी शामिल है। यह न केवल शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता का उदाहरण बन चुकी है, बल्कि सामाजिक समानता और शिक्षा के अधिकार को भी मज़बूती दे रही है।

विद्यालय में आज अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और गरीब वर्ग के बच्चे एकसाथ बैठकर समान अवसरों के साथ पढ़ाई कर रहे हैं। यह नज़ारा हमारे संविधान की समता और समावेशिता के आदर्शों को जीवंत कर देता है।

जनसहभागिता और जागरूकता की अपील

अब ज़रूरत है कि यह जानकारी गाँव-गाँव, गली-गली पहुँचे ताकि कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। आम नागरिक, जनप्रतिनिधि, पंचायतें और सामाजिक कार्यकर्ता अगर साथ दें तो जिले के हर सरकारी स्कूल को धोराकोट बनाया जा सकता है।

माता-पिता से विशेष अनुरोध है —

अपने बच्चों को शासकीय स्कूल में भर्ती कराएँ। यहाँ उन्हें सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि सुनहरा भविष्य मिल रहा है।

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धौंराकोट का सरकारी स्कूल हमें यह दिखा रहा है कि बदलाव सरकारी तंत्र में भी मुमकिन है, बशर्ते नीयत और मेहनत साफ हो। आज यह स्कूल सिर्फ शिक्षा नहीं दे रहा, बल्कि एक उम्मीद, एक मिशाल और एक नई सोच दे रहा है।

सरकारी स्कूल अब सिर्फ विकल्प नहीं, भविष्य की पहली पसंद बनते जा रहे हैं – और धौंराकोट इसका सबसे जीवंत प्रमाण है।


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