थारघाट की बेशकीमती जमीन पर उठे सवाल, सरकारी निर्माण 70 फीसदी पूरा होने के बाद वन विभाग ने रोका; फिर कथित अतिक्रमण पर कार्रवाई क्यों नहीं?
छुरा (गंगा प्रकाश)। नगर से लगे थारघाट की बेशकीमती जमीन को लेकर अब कई गंभीर सवाल सामने आने लगे हैं। कभी बड़े झाड़ और जंगल से घिरे इस क्षेत्र में पहले मंदिर निर्माण और अलग-अलग स्थानों पर मूर्तियां स्थापित किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद धीरे-धीरे आसपास की जमीन के उपयोग का दायरा बढ़ने लगा। अब यहां भैंसों का तबेला बनाए जाने और अधूरे सरकारी भवन के आसपास भी कथित कब्जे की स्थिति सामने आने की चर्चा है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नगर पंचायत द्वारा इसी क्षेत्र में शासकीय राशि से देशी एवं अंग्रेजी शराब दुकान के लिए भवन का निर्माण कराया जा रहा था। बताया जाता है कि भवन का करीब 70 प्रतिशत निर्माण पूरा हो चुका था। इसी बीच वन विभाग ने संबंधित जमीन को वन भूमि बताते हुए निर्माण कार्य रुकवा दिया।
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यहीं से पूरे मामले ने नया सवाल खड़ा कर दिया है—जब सरकारी भवन का निर्माण वन भूमि पर होने की बात सामने आते ही विभाग ने काम रुकवा दिया, तो उसी क्षेत्र में कथित रूप से बढ़ते अतिक्रमण पर विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ी?
सरकारी निर्माण दिखा, कथित कब्जा क्यों नहीं?
थारघाट मामले में सबसे बड़ा सवाल विभागीय निगरानी को लेकर उठ रहा है। यदि जमीन वन विभाग की है, तो उस पर किसी भी तरह के अनधिकृत निर्माण या उपयोग को रोकने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की होती है।
स्थानीय स्तर पर सामने आ रही जानकारी के अनुसार क्षेत्र में मंदिर, अलग-अलग स्थानों पर मूर्तियां, तबेला और अन्य अस्थायी उपयोग की स्थिति बनी है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि इन गतिविधियों की शुरुआत कब हुई और संबंधित विभागों ने उस समय क्या कार्रवाई की।
खंडित मूर्तियां भी छोड़ गईं कई सवाल
थारघाट में कुछ मूर्तियां खंडित अवस्था में पड़े होने की बात भी सामने आई है। इससे धार्मिक आस्था के नाम पर की गई मूर्ति स्थापना और बाद में उनके रखरखाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
यदि मूर्तियां धार्मिक आस्था के उद्देश्य से स्थापित की गई थीं तो उनकी देखरेख क्यों नहीं हुई? अलग-अलग स्थानों पर मूर्तियां स्थापित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या इसके लिए संबंधित विभाग से अनुमति ली गई थी?
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इन सवालों का वास्तविक उत्तर जांच के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन खंडित अवस्था में पड़ी मूर्तियां अब पूरे मामले को लेकर एक अलग ही सवाल खड़ा कर रही हैं।
मंदिर से तबेले तक… आखिर कितना बढ़ा दायरा?
स्थानीय चर्चा के अनुसार शुरुआत मंदिर और मूर्ति स्थापना से हुई और बाद में आसपास की जमीन का उपयोग बढ़ता गया। अब खाली जमीन पर तबेला बनाए जाने की बात सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि जमीन शासकीय या वन भूमि है तो कथित कब्जे का दायरा आखिर कितना बढ़ चुका है।
जानकारों के अनुसार किसी भी अतिक्रमण का विस्तार सामान्यतः धीरे-धीरे होता है। पहले छोटी संरचना बनती है, उसके आसपास जमीन का उपयोग शुरू होता है और समय के साथ कब्जे का क्षेत्र बढ़ सकता है। थारघाट में भी यदि ऐसा हुआ है तो शुरुआती स्तर पर कार्रवाई नहीं होना अपने आप में जांच का विषय है।
शराब दुकान का भवन अधूरा, जमीन का मालिक कौन?
सरकारी राशि से शराब दुकान भवन का निर्माण शुरू होना और 70 प्रतिशत काम पूरा होने के बाद वन विभाग द्वारा उसे रुकवाया जाना प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है।
यदि भूमि वन विभाग की थी तो निर्माण से पहले भूमि की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई? निर्माण की स्वीकृति किस आधार पर दी गई? और जब निर्माण रोक दिया गया तो सरकारी जमीन की सुरक्षा के लिए आगे क्या कार्रवाई की गई?
इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
सीमांकन हुआ तो खुल सकता है पूरा राज
थारघाट की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए राजस्व एवं वन विभाग की संयुक्त टीम से सीमांकन कराए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। रिकॉर्ड में भूमि की स्थिति क्या है और मौके पर उसका उपयोग किस प्रकार हो रहा है, इसका मिलान होने के बाद ही तस्वीर साफ हो सकती है।
मंदिर, मूर्तियों, तबेले, अधूरे सरकारी भवन और अन्य कथित निर्माणों की स्थिति भी जांच के दायरे में लाए जाने की आवश्यकता है।
अब सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, जवाबदेही का भी
थारघाट की जमीन को लेकर अब सवाल एक-दो नहीं बल्कि कई हैं—यदि जमीन वन विभाग की है तो कथित अतिक्रमण कैसे बढ़ा? यदि शासकीय भूमि है तो उसकी निगरानी कौन कर रहा था? सरकारी भवन का निर्माण क्यों रोका गया? और यदि विभाग को जमीन की जानकारी थी तो कथित कब्जों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन आस्था की आड़ में सरकारी अथवा वन भूमि पर अनधिकृत कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अब निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। क्या थारघाट का सीमांकन होगा? क्या भूमि की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक होगी? और यदि अतिक्रमण पाया गया तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
थारघाट में खंडित पड़ी मूर्तियां, अधूरा सरकारी भवन और कथित बढ़ता कब्जा फिलहाल प्रशासन से यही सवाल पूछ रहा है—आखिर जमीन की हद कौन तय करेगा और जवाबदेही किसकी होगी?
