छुरा (गंगा प्रकाश)। स्वच्छ भारत मिशन के तहत छुरा विकासखंड के ग्राम पंचायतों में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए सार्वजनिक शौचालय आज भी ताले में कैद हैं। जिन शौचालयों से गांवों में स्वच्छता और सुविधा की उम्मीद थी वे आज बदहाली और लापरवाही की तस्वीर बनकर खड़े हैं।

आप तस्वीर में साफ देख सकते हैं कि शौचालय भवन पर ताला लटका हुआ है आसपास गंदगी फैली हुई है और देखरेख का कोई नामोनिशान नहीं है। यह दृश्य इस बात का प्रमाण है कि निर्माण के बाद इनका उपयोग शुरू ही नहीं किया गया।

वर्ष 2021 में लगभग 3 लाख 50 हजार रुपए प्रति शौचालय की लागत से विकासखंड के कई ग्राम पंचायतों में इनका निर्माण कराया गया था। कागजों में योजना पूरी हो चुकी है और स्वच्छता के बड़े दावे किए गए लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश शौचालय आज तक बंद पड़े हैं।

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स्थिति केवल एक-दो गांव की नहीं, बल्कि कई ग्राम पंचायतों में एक जैसी है। शौचालय भवन बनाकर ताला लगा दिया गया और फिर कभी उसे खोला नहीं गया। न संचालन की कोई व्यवस्था बनाई गई और न ही साफ-सफाई की जिम्मेदारी तय की गई। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ये शौचालय किसके लिए बनाए गए थे।

ग्रामीणों में इस स्थिति को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि जब इन शौचालयों को उपयोग में लाना ही नहीं था, तो करोड़ों रुपए खर्च करने का औचित्य क्या था। यह केवल सरकारी राशि की बर्बादी और योजना का मजाक बनकर रह गया है।

उपयोग के अभाव में कई शौचालय जर्जर होने लगे हैं। दरवाजों पर जंग लग रही है आसपास झाड़ियां उग आई हैं और भवन धीरे-धीरे खराब होता जा रहा है। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो ये निर्माण पूरी तरह बेकार हो जाएंगे।

विडंबना यह है कि एक ओर सरकार खुले में शौच मुक्त भारत का दावा कर रही है वहीं दूसरी ओर इन गांवों के लोग आज भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं जबकि उनके गांव में शौचालय बने हुए हैं लेकिन बंद पड़े हैं।

ग्रामीणों ने सुझाव दिया है कि इन शौचालयों का संचालन शहरों की तर्ज पर किया जाए। प्रत्येक शौचालय में एक कर्मचारी नियुक्त किया जाए जो नियमित साफ-सफाई करे और उपयोग के बदले मामूली शुल्क लेकर व्यवस्था को बनाए रखे। इससे शौचालय चालू रहेंगे और उनकी देखरेख भी बेहतर होगी।

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ग्रामीणों ने समाचार पत्र के माध्यम से प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराई जाए और बंद पड़े शौचालयों को तत्काल चालू कराया जाए। साथ ही, इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा न बने।

तस्वीर में दिख रहा यह नजारा सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे विकासखंड में फैली लापरवाही का आईना है, जो यह बताता है कि जब तक योजनाएं कागजों से निकलकर धरातल पर सही तरीके से लागू नहीं होंगी, तब तक स्वच्छता का सपना अधूरा ही रहेगा।


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