छुरा (गंगा प्रकाश)। वन्यजीवों की सुरक्षा के नाम पर सरकार और वन विभाग भले ही करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे करते हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। छुरा वन परिक्षेत्र में महज 15 दिनों के भीतर दो हिरणों की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों के बीच लगातार हो रही ऐसी घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि विभागीय व्यवस्था कितनी लापरवाह और कमजोर हो चुकी है।

ताजा मामला छुरा वन परिक्षेत्र के नवगोई बीट का है, जहां एक हिरण मृत अवस्था में पाया गया। घटना की सूचना मिलने के बाद वन परिक्षेत्र अधिकारी अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे और नियमानुसार पंचनामा तैयार किया गया। इसके बाद मृत हिरण का पोस्टमार्टम कराया गया तथा अंत में उसका दाह संस्कार कर दिया गया। विभाग ने अपनी औपचारिक प्रक्रिया पूरी कर ली, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हिरण की मौत क्यों हुई और इसे रोकने के लिए पहले से क्या इंतजाम किए गए थे।

गौरतलब है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। लगभग 10 दिन पहले ही छुरा वन परिक्षेत्र के नावाडीह बम्हनी बीट में भी एक हिरण की इसी तरह मौत हो चुकी है। इस तरह करीब 15 दिनों के भीतर दो हिरणों की मौत होना वन विभाग की निगरानी और वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर रहा है।

दरअसल मार्च का महीना शुरू होते ही गर्मी का असर दिखने लगा है। ग्रीष्मकाल की शुरुआत के साथ ही जंगलों में पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखने लगते हैं और चारे की भी कमी होने लगती है। ऐसी स्थिति में हिरण सहित कई वन्य जीव अपनी भूख और प्यास मिटाने के लिए जंगलों से निकलकर गांवों की ओर पहुंचने लगते हैं। गांवों की ओर आने के दौरान कई बार वे दुर्घटनाओं, शिकारियों या अन्य खतरों का शिकार हो जाते हैं और अंततः अपनी जान गंवा बैठते हैं।

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स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि हर साल गर्मी के मौसम में ऐसी स्थिति बनती है, लेकिन इसके बावजूद वन विभाग की ओर से जंगलों में पानी की स्थायी व्यवस्था, कृत्रिम जल स्रोतों का निर्माण और वन्यजीवों के लिए चारा उपलब्ध कराने जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता। परिणामस्वरूप वन्य जीवों को जंगल छोड़कर गांवों की ओर जाना पड़ता है, जहां उनका जीवन खतरे में पड़ जाता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी कई मामलों में कुंभकर्णीय नींद में सोए हुए हैं। जंगलों में नियमित गश्त और निगरानी की व्यवस्था कमजोर होने के कारण वन्यजीवों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। जब कोई वन्य जीव मर जाता है, तब विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर पंचनामा, पोस्टमार्टम और दाह संस्कार की औपचारिकता पूरी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।

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सबसे गंभीर बात यह भी सामने आ रही है कि छुरा वन परिक्षेत्र अधिकारी से संपर्क करना भी आम लोगों और पत्रकारों के लिए आसान नहीं है। कई बार कार्यालय में संपर्क करने की कोशिश की जाती है तो अधिकारी नदारद रहते हैं। जब उनके निवास पर मुलाकात के लिए पहुंचा जाता है तो चौकीदार के माध्यम से यह संदेश भिजवा दिया जाता है कि “बाद में मिलेंगे।” वहीं मोबाइल फोन पर संपर्क करने की कोशिश की जाती है तो कॉल तक रिसीव नहीं की जाती। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब जिम्मेदार अधिकारी ही संवाद से बचते नजर आएं तो वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्था आखिर कैसे मजबूत होगी।

ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते जंगलों में जलस्रोतों का संरक्षण, कृत्रिम पानी की व्यवस्था और नियमित निगरानी की जाती, तो शायद इन बेजुबान हिरणों को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती। लोगों ने मांग की है कि हाल के दिनों में हुई हिरणों की मौत के मामलों की गंभीरता से जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और जंगलों में रहने वाले वन्य प्राणियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।


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