छुरा (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखंड छुरा में शासकीय शिक्षा व्यवस्था की हालत लगातार चिंताजनक होती जा रही है। सरकारी नियमों और शासनादेशों को ताक पर रखकर कई स्कूलों में मनमाने ढंग से शाला संचालन की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन अब डूमरडीह प्राथमिक शाला का मामला व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।
छुरा विकासखंड मुख्यालय से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित ग्राम डूमरडीह की शासकीय प्राथमिक शाला में पदस्थ प्रधान पाठक संतोषी टांडे पर आरोप है कि वे वर्षों से शासन द्वारा निर्धारित समय-सारिणी का पालन नहीं कर रहीं। जहां प्रदेश भर के शासकीय स्कूलों में वर्तमान में सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक शाला संचालन का आदेश लागू है, वहीं डूमरडीह प्राथमिक शाला में स्कूल कथित तौर पर सुबह 11 बजे खुलता है और दोपहर 3 बजे ही छुट्टी कर दी जाती है।
पांच साल से ‘अपने नियमों’ पर चल रहा स्कूल
ग्रामीणों का आरोप है कि बीते करीब पांच वर्षों से यह स्कूल वास्तव में “एक शिक्षकीय शाला” बनकर रह गया है, जहां केवल प्रधान पाठक संतोषी टांडे का ही कानून चलता है। बताया गया कि शिक्षिका का निवास छुरा नगर में है और वे अपने निजी जीवन की सुविधा के अनुसार स्कूल का संचालन करती हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, संतोषी टांडे सुबह अपने बच्चों को तैयार करने, उन्हें निजी स्कूल भेजने और घर के काम निपटाने के बाद ही गांव के स्कूल पहुंचती हैं। इसके चलते वे अक्सर 11 बजे या उससे भी देर से स्कूल आती हैं। वहीं दोपहर 3 बजे स्कूल की छुट्टी कर पुनः छुरा लौट जाती हैं ताकि अपने बच्चों को निजी स्कूल से समय पर घर ला सकें।

सड़क बनेगी, तब समय पर स्कूल आएंगे
ग्रामीणों और पालकों का कहना है कि जब भी उनसे समय पर स्कूल आने की बात की जाती है, तो प्रधान पाठक का एक ही जवाब होता है — जब तक गांव में पक्की सड़क नहीं बनेगी, तब तक समय पर स्कूल नहीं आ सकती। मैं अकेली रहती हूं, मेरे भी बच्चे हैं, उनका भविष्य मुझे देखना है। समय पर आना-जाना संभव नहीं है, मेरा तबादला करवा दो।
यह बयान न केवल शिक्षक की जिम्मेदारी पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आदिवासी अंचल के बच्चों के भविष्य के प्रति प्रशासनिक उदासीनता को भी उजागर करता है।
अर्धवार्षिक परीक्षा में भी वही हाल
इस समय प्रदेश भर में शासकीय स्कूलों में अर्धवार्षिक परीक्षाएं संचालित की जा रही हैं। इसके बावजूद डूमरडीह प्राथमिक शाला में स्थिति में कोई सुधार नहीं है। जानकारी के अनुसार, प्रधान पाठक के चार दिनों के अवकाश पर होने के कारण वैकल्पिक व्यवस्था के तहत एक अन्य शिक्षिका की ड्यूटी लगाई गई है, लेकिन वे भी 11 बजे स्कूल पहुंचती हैं और 3 बजे छुट्टी कर वापस लौट जाती हैं।

बच्चों की कॉपियां तक नहीं जांची गईं
सबसे गंभीर स्थिति तब सामने आई जब बच्चों ने अपनी कॉपियां दिखाई। ग्रामीणों और पालकों के अनुसार, कई बच्चों की कॉपियों में महीनों से कोई जांच नहीं हुई है। न तो शिक्षकों के हस्ताक्षर हैं, न कोई सुधार, न मूल्यांकन। इससे साफ जाहिर होता है कि पढ़ाई केवल कागजों में चल रही है, जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है।
पुराने नेताओं के नाम और तस्वीरों वाली कॉपियां
एक और चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि स्कूल में बच्चों को जो कॉपियां वितरित की गई हैं, उनमें अब भी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, तत्कालीन शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम और पाठ्यपुस्तक निगम के तत्कालीन अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी का नाम और चित्र अंकित हैं। जबकि प्रदेश में सरकार बदले काफी समय हो चुका है। यह शिक्षा विभाग की आपूर्ति व्यवस्था और अद्यतन निगरानी पर भी सवाल खड़े करता है।
अधिकारियों के जवाब गोलमोल
मामले पर प्रतिक्रिया के लिए जब बीआरसी मार्कंडेय से संपर्क किया गया तो उन्होंने स्कूल समय के संबंध में जानकारी बीईओ से लेने की बात कही। वहीं बीईओ मतावले से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि वे रायपुर में किसी पेशी में हैं। यानी स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी तत्काल स्थिति स्पष्ट करने से बचते नजर आए।
उधर, प्रधान पाठक संतोषी टांडे से उनका पक्ष जानने के लिए फोन किया गया, लेकिन उनका मोबाइल बंद मिला।
आदिवासी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़
डूमरडीह जैसे सुदूर आदिवासी गांवों में शिक्षा ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद होती है। लेकिन यदि शासकीय स्कूल ही निजी सुविधाओं और मनमाने नियमों के आधार पर चलेंगे, तो गरीब और आदिवासी बच्चों का भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह गंभीर चिंता का विषय है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, समय पर स्कूल संचालन सुनिश्चित किया जाए और लापरवाह शिक्षकों पर कठोर कार्रवाई हो, ताकि आदिवासी अंचल के बच्चों को उनका संवैधानिक अधिकार — गुणवत्तापूर्ण और नियमित शिक्षा मिल सके।

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