जिसके नाम पर पहचान पत्र, उसे ही नहीं खबर! गांव-गांव पहुंची कथित प्रतियों के बाद बढ़ा रहस्य, जांच में खुलेगा पूरा राज
रायपुर (गंगा प्रकाश)। चुनावी गतिविधियों के बीच सामने आए एक कथित डुप्लीकेट वोटर आईडी मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि जिन मतदाताओं के नाम से ये कथित पहचान पत्र तैयार किए गए, उनमें से कुछ लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं होने का दावा किया जा रहा है। मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक एवं निर्वाचन अधिकारियों के स्तर पर जांच शुरू होने की जानकारी है।
कथित तौर पर तैयार किए गए डुप्लीकेट मतदाता पहचान पत्रों को गांव-गांव ले जाने की बात भी सामने आ रही है। ऐसे में अब सवाल सिर्फ इतना नहीं रह गया है कि कार्ड किसने प्रिंट किए, बल्कि यह भी जांच का विषय बन गया है कि मतदाताओं के नाम और उनसे जुड़ी जानकारी आखिर किसके पास पहुंची?
कार्ड तैयार हुए, लेकिन मतदाता बेखबर?
मामले की पड़ताल के दौरान कुछ ऐसे मतदाताओं से संपर्क किए जाने की बात सामने आई है, जिनके नाम से कथित रूप से डुप्लीकेट वोटर आईडी तैयार की गई थी। दावा है कि संबंधित लोगों ने ऐसे किसी कार्ड के तैयार होने की जानकारी से अनभिज्ञता जताई।
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यदि जांच में यह बात सही साबित होती है तो मामला और गंभीर हो सकता है। क्योंकि तब यह सवाल उठेगा कि संबंधित व्यक्ति की जानकारी के बिना उसके नाम से मतदाता पहचान पत्र की प्रति तैयार करने के लिए आवश्यक जानकारी किस माध्यम से हासिल की गई।
ओटीपी से लेकर ऑनलाइन रिकॉर्ड तक… सवालों के घेरे में प्रक्रिया
डुप्लीकेट वोटर आईडी को लेकर ऑनलाइन प्रक्रिया भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। पहचान पत्र की प्रति प्राप्त करने अथवा प्रिंट करने में किस प्रकार का प्रमाणीकरण हुआ, क्या किसी स्तर पर ओटीपी अथवा अन्य सत्यापन की आवश्यकता पड़ी और यदि पड़ी तो उसका उपयोग किसने किया—इन सवालों के जवाब जांच में तलाशे जा रहे हैं।
यही वजह है कि अब पूरे मामले में सिर्फ प्रिंट किए गए कार्ड ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड और प्रक्रिया की भी जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
किसने दिए नाम? किसने कराया प्रिंट?
मामले में सबसे बड़ा रहस्य यही है कि कथित कार्ड तैयार कराने के लिए मतदाताओं के नाम और संबंधित विवरण कहां से मिले। कार्ड किसने तैयार करवाए और उन्हें किसके निर्देश पर प्रिंट किया गया? तैयार कार्ड किसके पास पहुंचे और फिर उन्हें गांव-गांव ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही पूरे घटनाक्रम की तस्वीर साफ हो सकेगी।
क्या चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा है मामला?
मामला ऐसे समय सामने आया है जब संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। इसलिए इसकी राजनीतिक और चुनावी प्रक्रिया से संभावित कड़ी को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि अभी तक यह पुष्टि नहीं हुई है कि कथित डुप्लीकेट वोटर आईडी का इस्तेमाल किसी चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया गया।
ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच रिपोर्ट का इंतजार करना जरूरी है।
अब जांच खोलेगी बंद लिफाफे का राज
फिलहाल प्रशासनिक और निर्वाचन स्तर पर जांच जारी होने की बात कही जा रही है। जांच में यह सामने आना बाकी है कि कितने कार्ड तैयार किए गए, किन लोगों के नाम का इस्तेमाल हुआ, कार्ड कहां प्रिंट हुए और उन्हें किस उद्देश्य से तैयार किया गया।
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मतदाताओं के नाम से बने कथित डुप्लीकेट कार्ड आखिर किसके इशारे पर तैयार हुए? क्या यह महज प्रिंटिंग का मामला है या इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है?
इन सवालों का जवाब जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल इस पूरे मामले ने चुनावी माहौल में एक ऐसा सवाल छोड़ दिया है, जिसका जवाब तलाशना अब जांच एजेंसियों के लिए सबसे अहम होगा।
