2019 में प्रशासन ने कराया था सील, फिर कश्यपपारा में कैसे शुरू हो गया इलाज का कारोबार?
कथित क्लिनिक में उपचार को लेकर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर उठे सवाल, बीएमओ बोले—जांच कराएंगे, नियम विरुद्ध मिला तो होगी कार्रवाई
गजानंद कश्यप
अमलीपदर (गंगा प्रकाश)। अमलीपदर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत आने वाले उरमाल के कश्यपपारा में संचालित एक कथित क्लिनिक इन दिनों चर्चा में है। क्लिनिक में सुबह से ही मरीजों की भीड़ नजर आने और इलाज, दवा, इंजेक्शन तथा खून की जांच जैसी सुविधाएं उपलब्ध होने के दावों के बीच अब संचालक की चिकित्सकीय योग्यता, पंजीयन और क्लिनिक संचालन की अनुमति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वर्ष 2019 में प्रशासन द्वारा इसी तरह के क्लिनिक पर सील की कार्रवाई की गई थी, तो वर्तमान में संचालित क्लिनिक किन दस्तावेजों और अनुमति के आधार पर चल रहा है?
स्थानीय लोगों के अनुसार कश्यपपारा में यह क्लिनिक पिछले करीब पांच वर्षों से संचालित होने की बात कही जा रही है। यहां आसपास के गांवों के अलावा ओडिशा सीमा से लगे क्षेत्रों से भी मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। खासकर हड्डी एवं जोड़ संबंधी दर्द के उपचार के लिए यहां आने वाले मरीजों की संख्या अधिक होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद ही हो सकेगी।

सुबह से लगती है मरीजों की भीड़
स्थानीय लोगों और कुछ मरीजों के अनुसार क्लिनिक में सुबह से ही मरीज पहुंचने लगते हैं। सामान्य बीमारी से लेकर हड्डी और जोड़ के दर्द तक के उपचार का दावा किए जाने की बात सामने आई है। मरीजों का कहना है कि यहां इलाज अपेक्षाकृत कम खर्च में हो जाता है और उन्हें जल्दी राहत मिलने की उम्मीद रहती है। यही वजह बताई जा रही है कि दूर-दराज के लोग भी यहां पहुंचते हैं।
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हालांकि, किसी भी व्यक्ति द्वारा उपचार किए जाने की वैधता उसकी शैक्षणिक योग्यता, संबंधित पंजीयन और लागू नियमों के अनुरूप अनुमति पर निर्भर करती है। ऐसे में क्लिनिक संचालक के दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
इंजेक्शन और दवाओं को लेकर भी सवाल
क्लिनिक में आने वाले मरीजों को दवाएं देने के साथ इंजेक्शन लगाए जाने और खून की जांच किए जाने की बात सामने आई है। स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि कई बीमारियों में मरीजों को दो से तीन प्रकार के इंजेक्शन तक लगाए जाते हैं।
इलाज, दवा और इंजेक्शन के लिए मरीजों से करीब 200 रुपए से लेकर 1 हजार रुपए तक लिए जाने की बात भी कही जा रही है। हालांकि, यह राशि किस सेवा के लिए ली जाती है और उपचार में उपयोग की जाने वाली दवाएं एवं इंजेक्शन किस अधिकृत व्यवस्था के तहत दिए जा रहे हैं, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग द्वारा मौके पर जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना जरूरी माना जा रहा है।

संचालक ने खुद को बताया पैथोलॉजिस्ट
क्लिनिक संचालक बै लोचन से जब उनकी शैक्षणिक योग्यता और क्लिनिक संचालन की अनुमति के संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने स्वयं को पैथोलॉजिस्ट बताया। उन्होंने कहा कि कई मरीज अपने साथ इंजेक्शन लेकर आते हैं और वे केवल उसे लगाने का काम करते हैं। संचालक ने क्लिनिक के संचालन के लिए अनुमति होने की बात कही, लेकिन पूछे जाने पर संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए।
ऐसे में सवाल उठता है कि संचालक के पास कौन सी शैक्षणिक योग्यता है, किस संस्था में उनका पंजीयन है और क्लिनिक संचालन के लिए किस विभाग से अनुमति प्राप्त है? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
2019 की कार्रवाई ने बढ़ाया रहस्य
इस पूरे मामले में वर्ष 2019 का घटनाक्रम सबसे अहम कड़ी के रूप में सामने आ रहा है। स्थानीय जानकारी के अनुसार उस समय तत्कालीन कलेक्टर श्याम धावड़े को क्लिनिक को लेकर शिकायत मिली थी। शिकायत के बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की गई और तत्कालीन स्थल पर संचालित क्लिनिक को कलेक्टर की मौजूदगी में सील कराया गया था।
बताया जा रहा है कि उस समय क्लिनिक उरमाल की मुख्य बस्ती में संचालित था। कार्रवाई के करीब डेढ़ वर्ष बाद कश्यपपारा में दोबारा क्लिनिक शुरू किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, पुराने क्लिनिक और वर्तमान स्थल पर संचालित संस्थान के बीच कानूनी एवं प्रशासनिक स्थिति क्या है, यह संबंधित रिकॉर्ड की जांच के बाद ही सामने आएगी।
ओडिशा से भी पहुंचने का दावा
स्थानीय स्तर पर संचालक को ‘उड़िया डॉक्टर’ के नाम से भी संबोधित किए जाने की बात सामने आई है। दावा है कि उड़ीसा के आसपास के क्षेत्रों से भी मरीज यहां उपचार के लिए पहुंचते हैं। हड्डी एवं जोड़ संबंधी समस्याओं के उपचार को लेकर विशेष रूप से मरीज आने की बात कही जा रही है।
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यदि बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों से भी मरीज यहां पहुंच रहे हैं, तो क्लिनिक के पंजीयन, चिकित्सकीय सेवाओं और दवाओं की वैधता की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
छोटे कमरे में संचालन, मानकों पर भी सवाल
स्थानीय लोगों के अनुसार क्लिनिक का संचालन अपेक्षाकृत छोटे कमरे में किया जा रहा है। ऐसे में मरीजों के उपचार, दवा रखने की व्यवस्था, स्वच्छता, जांच सुविधा, चिकित्सकीय उपकरण तथा अन्य आवश्यक मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यदि क्लिनिक किसी अधिनियम या स्वास्थ्य विभाग के निर्धारित मानकों के तहत आता है, तो उसके लिए आवश्यक पंजीयन और अनुमतियों की जांच किया जाना जरूरी होगा। वहीं यदि यहां पैथोलॉजी जांच की सुविधा दी जा रही है तो संबंधित जांच करने वाले व्यक्ति की योग्यता, पंजीयन और जांच की वैधता भी जांच का विषय हो सकती है।
बीएमओ बोले—जांच के बाद होगी स्थिति स्पष्ट
मामले को लेकर बीएमओ मैनपुर गजेंद्र ध्रुव ने कहा कि उन्हें अब तक इस संबंध में कोई लिखित शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। उन्होंने मामले को दिखवाने की बात कही है। साथ ही कहा कि यदि क्लिनिक का संचालन नियम विरुद्ध पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब जांच से खुलेंगे कई सवालों के जवाब
कश्यपपारा में चल रहे कथित क्लिनिक को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों से मरीजों का उपचार किए जाने के बावजूद इसकी वैधता और दस्तावेजों की जांच अब तक क्यों नहीं हुई? क्या संचालक के पास उपचार से संबंधित आवश्यक योग्यता और पंजीयन है? क्लिनिक संचालन की अनुमति किस विभाग से मिली है? मरीजों को लगाए जा रहे इंजेक्शन और दी जा रही दवाओं की खरीद एवं उपयोग किस नियम के तहत हो रहा है? वर्ष 2019 में हुई सील कार्रवाई के बाद वर्तमान संचालन की प्रशासनिक स्थिति क्या है?
इन तमाम सवालों का जवाब फिलहाल स्वास्थ्य विभाग की जांच पर टिका है। यदि दस्तावेज और संचालन नियमों के अनुरूप पाए जाते हैं तो स्थिति स्पष्ट होगी, वहीं किसी प्रकार की अनियमितता सामने आने पर विभागीय स्तर पर आगे की कार्रवाई का रास्ता खुलेगा।





