गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की जगह बच्चों से श्रम कराए जाने का गंभीर मामला एक बार फिर सामने आया है। कई विद्यालयों में बच्चों से बर्तन धुलवाने, झाड़ू-पोछा जैसे कार्य कराए जाने की शिकायतें पहले भी आती रही हैं, लेकिन हालिया वायरल तस्वीरों ने प्रशासन और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
गरियाबंद ब्लॉक के एक परिषदीय स्कूल में बच्चों द्वारा बर्तन धोते हुए तस्वीरें वायरल होने के बाद विवाद गहराता जा रहा है। मामला इतना बढ़ गया कि स्कूल स्टाफ आपस में ही दोषारोपण करने लगे। प्रधान पाठक से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका मोबाइल फोन बंद मिला।
इसी तरह जिला मुख्यालय से लगभग सात किलोमीटर दूर ग्राम बेंदकुरा स्थित पूर्व माध्यमिक शाला में भी स्कूली छात्राओं द्वारा स्कूल स्टाफ के चाय एवं भोजन के बर्तन धोते हुए फोटो सामने आए हैं। गुरुवार को सामने आए इस मामले ने शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
दरअसल, वर्तमान में रसोइया संघ अपनी विभिन्न मांगों को लेकर हड़ताल पर है, जिसके चलते कई स्कूलों में मध्यान्ह भोजन व्यवस्था चरमरा गई है। रसोइयों की अनुपस्थिति में खाना बनाना और बर्तन साफ करने की जिम्मेदारी अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों पर डाल दी गई है। बेंदकूरा के पूर्व माध्यमिक शाला में भी भोजन तो बनाया जा रहा है, लेकिन बड़े-बड़े खाना पकाने के बर्तन और खाने-पीने की थालियां बच्चों से धुलवाई जा रही हैं, जो नियमों के सर्वथा विपरीत है।
इस संबंध में जब संकुल प्रभारी से चर्चा की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि रसोइया संघ हड़ताल पर है और समूह के कहने पर बर्तन साफ कराए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि एक शिक्षक द्वारा बच्चों को बर्तन धोने के लिए कहा गया और उसी दौरान फोटो ली गई। वहीं, विद्यालय के प्रधान पाठक से जानकारी के लिए कई बार फोन किया गया, लेकिन उनका मोबाइल बंद रहा।
कानूनी पहलू और सामाजिक आक्रोश
शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से किसी भी प्रकार का श्रम कराना गैरकानूनी है। स्कूलों में बच्चों का समय केवल पढ़ाई और सर्वांगीण विकास के लिए निर्धारित है, न कि घरेलू या श्रम कार्यों के लिए। ऐसे मामलों के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने से अभिभावकों में गहरा आक्रोश फैल रहा है और प्रशासनिक जांच की मांग तेज हो गई है।
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गौरतलब है कि बढ़ती जागरूकता के चलते अब ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई की अपेक्षा की जा रही है। सवाल यह है कि रसोइया संघ की हड़ताल का खामियाजा मासूम बच्चों को क्यों भुगतना पड़ रहा है? क्या शिक्षा विभाग इस गंभीर लापरवाही पर ठोस कदम उठाएगा, या फिर नियमों की अनदेखी ऐसे ही जारी रहेगी?
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