गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। रायपुर–देवभोग मुख्य मार्ग पर पैरी कॉलोनी से न्यू सर्किट हाउस तक प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण अब विकास का नहीं, बल्कि हरा कत्ल का प्रतीक बनता जा रहा है। जिस सड़क को जनता की सुविधा के नाम पर चौड़ा किया जाना था, उसी की आड़ में दशकों पुराने साल और बीजा जैसे कीमती इमारती पेड़ों को बेरहमी से काट डाला गया। यह कटाई न अंधेरे में हुई, न चोरी-छिपे—बल्कि वन विभाग के कार्यालय के सामने, अधिकारियों की मौजूदगी में और कथित प्रशासनिक दबाव में की गई।

नगरवासियों का कहना है कि यह महज पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ खुला अपराध है। सवाल यह नहीं कि सड़क चौड़ी हो या नहीं, सवाल यह है कि किसके इशारे पर, किस नियम के तहत और किसे फायदा पहुंचाने के लिए चार विशाल पेड़ों की बलि दी गई?

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विकास या दलाली का खेल?

सड़क चौड़ीकरण के लिए छोटे-बड़े झाड़ों की कटाई प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जनपद पंचायत कार्यालय के सामने दुकानों के चबूतरे के पास खड़े साल और बीजा के पेड़ सड़क के लिए सबसे बड़ा अवरोध नहीं थे। इसके बावजूद इन्हें चुन-चुनकर काटा गया। स्थानीय सूत्रों की मानें तो यह कटाई किसी खास व्यक्ति या समूह को राहत देने के उद्देश्य से कराई गई। यदि यह सच है, तो यह विकास नहीं बल्कि निजी स्वार्थ के लिए सार्वजनिक संसाधनों की कुर्बानी है।

‘एक पेड़ मां के नाम’—सिर्फ पोस्टर और फोटो?

छत्तीसगढ़ शासन ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान को भावनात्मक मुद्दा बताकर जनता से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। नेता मंचों से हरियाली बचाने की दुहाई देते हैं, पौधरोपण की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चमकती हैं। लेकिन गरियाबंद जिला मुख्यालय में ही साल-बीजा जैसे पेड़ों की बलि यह साबित करने के लिए काफी है कि यह अभियान जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।

जिले में सत्तारूढ़ दल के कई बड़े पदाधिकारी रहते हैं—फिर भी किसी की जुबान नहीं खुली। क्या पर्यावरण संरक्षण सिर्फ भाषणों के लिए है?

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वन विभाग का दोहरा मापदंड उजागर

यह मामला वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा तमाचा है।

  • गरीब अगर सूखी लकड़ी साइकिल पर ले जाए—तो अपराधी!
  • रसूखदार के कहने पर साल-बीजा कटे—तो सब जायज!

लोगों का कहना है कि अगर यही कटाई किसी आम आदमी ने की होती, तो अब तक एफआईआर, जब्ती और जेल की कार्रवाई हो चुकी होती। लेकिन यहां वन अधिकारियों की आंखों के सामने पेड़ कटे और कानून मौन रहा।

जब इस मामले में वन परिक्षेत्र अधिकारी से सवाल किया गया, तो उनका बयान और भी सनसनीखेज रहा। उन्होंने साफ कहा कि यह कटाई नगर में बैठे एक “जिम्मेदार पदाधिकारी” की मांग पर की गई। यानी कानून नहीं, दबाव सबसे बड़ा नियम बन गया है।

अब जवाब कौन देगा?

चार बहुमूल्य पेड़ों की कटाई ने गरियाबंद में कई सवाल खड़े कर दिए हैं—

  • क्या इस अवैध कटाई की निष्पक्ष जांच होगी?
  • क्या दबाव बनाने वाले जनप्रतिनिधि और अनुमति देने वाले अधिकारी कटघरे में आएंगे?
  • या फिर यह मामला भी फाइलों में दबाकर हरियाली के खून पर पर्दा डाल दिया जाएगा?

आज गरियाबंद पूछ रहा है— अगर ‘एक पेड़ मां के नाम’ के दौर में साल और बीजा भी सुरक्षित नहीं, तो आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने के लिए क्या मिलेगा—विकास की धूल या खोखले नारे?


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