गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। कांग्रेस संगठन सृजन अभियान के तहत नवनियुक्त ब्लॉक अध्यक्ष अमित मिरी के स्वागत में तिरंगा चौक से कांग्रेस भवन तक रैली तो निकली, ढोल-नगाड़े भी बजे, फूल-मालाएं भी उड़ीं, लेकिन इस पूरी चकाचौंध के बीच कांग्रेस संगठन के भीतर पसरा सन्नाटा साफ महसूस किया गया। यह आयोजन स्वागत से ज्यादा संगठन की वास्तविक स्थिति का सार्वजनिक प्रदर्शन बन गया।
बिंद्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव की मौजूदगी ने कार्यक्रम को औपचारिक गरिमा जरूर दी, लेकिन मंच के सामने बिखरी खाली कुर्सियां और वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी ने पूरे कार्यक्रम की दिशा ही बदल दी। नारे गूंजते रहे, पर भीड़ कमजोर रही। उत्साह दिखा, पर संगठन शक्ति नदारद नजर आई।

रैली से कांग्रेस भवन तक, पर जोश रास्ते में ही दम तोड़ गया
तिरंगा चौक में कार्यकर्ताओं ने नवनियुक्त ब्लॉक अध्यक्ष का फूल-मालाओं से स्वागत किया और रैली के रूप में कांग्रेस भवन पहुंचे। रास्ते में नारे लगाए गए, ढोल बजे और माहौल बनाने की कोशिश हुई। लेकिन जैसे ही कार्यक्रम कांग्रेस भवन में पहुंचा, माहौल की असल तस्वीर सामने आ गई। विशाल हॉल में सैकड़ों कुर्सियां खाली पड़ी थीं। भीड़ की जगह खालीपन और चर्चा की जगह खुसर-पुसर दिखाई दे रही थी।
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मंच से संगठन मजबूती की बातें, सामने कमजोर हकीकत
कांग्रेस भवन में आयोजित बैठक को संबोधित करते हुए विधायक जनक ध्रुव ने कहा कि कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होकर काम करने की अपील की।
वरिष्ठ नेता युगल किशोर पांडेय ने कहा कि कांग्रेस की असली ताकत उसका जमीनी कार्यकर्ता है, जिसे फिर से सक्रिय करना होगा। रामकुमार वर्मा ने संगठन सुदृढ़ीकरण, अनुशासन और निरंतर जनसंपर्क पर जोर दिया। नवनियुक्त ब्लॉक अध्यक्ष अमित मिरी ने प्रदेश नेतृत्व, जिला संगठन और विधायक के प्रति आभार जताते हुए भरोसा दिलाया कि वे सभी को साथ लेकर चलेंगे।
लेकिन मंच से बोली गई हर बात मंच के नीचे मौजूद सच्चाई से टकरा रही थी।

बड़े चेहरों की गैरहाजिरी ने खोल दी गुटबाजी की फाइल
कार्यक्रम में पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ल, जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुखचंद बेसरा, पूर्व विधायक प्रत्याशी संजय नेताम, नवनियुक्त शहर अध्यक्ष प्रेम सोनवानी सहित कई प्रमुख नेता नदारत रहे। जिला मुख्यालय के शहर अध्यक्ष का नहीं पहुंचना कार्यकर्ताओं के बीच सबसे बड़ी चर्चा बन गया। कई वरिष्ठ और पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता भी आयोजन से दूर नजर आए।
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खुलकर उठता रहा कि जब नवनियुक्त ब्लॉक अध्यक्ष के पहले ही सार्वजनिक कार्यक्रम में पार्टी के बड़े चेहरे नजर नहीं आए, तो संगठन की एकजुटता के दावे कितने मजबूत हैं?
खाली कुर्सियां बनीं सबसे मुखर वक्ता
कार्यक्रम की सबसे बड़ी और सबसे तीखी तस्वीर कांग्रेस भवन में दिखी खाली कुर्सियों की कतारों में। विधायक की मौजूदगी के बावजूद हॉल आधा भी नहीं भर पाया। कई पंक्तियों में कुर्सियां ऐसे खामोश खड़ी रहीं, जैसे वे खुद कांग्रेस की हालत पर बयान दे रही हों।
जबकि कागजों में गरियाबंद ब्लॉक में 16 सेक्टर, 8 मंडल अध्यक्ष और करीब 92 बूथ अध्यक्ष हैं। अगर संगठन जमीनी तौर पर सक्रिय होता, तो यह आयोजन कार्यकर्ताओं से पट जाना चाहिए था। लेकिन गिने-चुने चेहरों की मौजूदगी ने संगठन की निष्क्रियता और असंतोष को उजागर कर दिया।
संगठन सृजन के बाद बढ़ा असंतोष, पुराने कार्यकर्ता खफा
कार्यक्रम में मौजूद कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम रही कि संगठन सृजन अभियान के बाद कांग्रेस में संतुलन नहीं, बल्कि असंतोष बढ़ा है। कई पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार किए जाने की भावना खुलकर सामने आ रही है। नए चेहरों की नियुक्ति को लेकर भीतर ही भीतर विरोध और गुटबाजी मजबूत होती जा रही है।
अमित मिरी का पहला सार्वजनिक कार्यक्रम ही यह संकेत दे गया कि संगठन अंदर से एक नहीं है। मंच पर एकता की बातें और नीचे बिखरा असंतोष — यही इस आयोजन की सबसे बड़ी पहचान बन गई।
कांग्रेस के लिए स्वागत नहीं, चेतावनी समारोह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्यक्रम कांग्रेस के लिए स्वागत से ज्यादा चेतावनी साबित हुआ है। अगर समय रहते संगठन के भीतर चल रही खींचतान, उपेक्षा और गुटबाजी पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले चुनावों में कांग्रेस को विरोधियों से पहले अपनी अंदरूनी कमजोरियों से लड़ना पड़ेगा।
पहला ही शो बता गया — राह आसान नहीं
कुल मिलाकर, नवनियुक्त ब्लॉक अध्यक्ष अमित मिरी का स्वागत जरूर हुआ, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जोरदार स्वागत उन सवालों का हुआ, जो खाली कुर्सियों, गैरहाजिर नेताओं और कमजोर भीड़ ने खड़े किए। यह आयोजन कांग्रेस की ताकत का प्रदर्शन कम और उसकी अंदरूनी दरारों का सार्वजनिक प्रदर्शन ज्यादा बन गया। पहला ही शो बता गया कि गरियाबंद कांग्रेस के लिए आगे की राह आसान नहीं, और अगर संगठन को समय रहते नहीं संभाला गया, तो राजनीतिक नुकसान तय माना जा रहा है।

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