गरियाबंद/फिंगेश्वर (गंगा प्रकाश)। फिंगेश्वर-राजिम अनुविभाग के एसडीएम विशाल महाराणा ने अंचल के किसानों से अपील की है कि फिंगेश्वर-राजिम एक कृशि प्रधान क्षेत्र है। जिसकी 80 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या कृशि कार्य पर निर्भर है। यद्यपि क्षेत्र में वर्शा सामान्य होती है। इसके बावजूद अंचल का भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। वर्तमान में हमारा क्षेत्र सेमी क्रिटिकल जोन में शामिल है। धान की फसल में अन्य फसलों की तुलना में अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है, 01 किग्रा. धान उत्पादन के लिए औसतन 3000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। श्री महाराणा ने कहा कि ग्रीश्मकालीन धान के लिए कृशक मुख्य रूप से भूमिगत जल का उपयोग करते है। वृहद क्षेत्र में ग्रीश्मकालीन धान की फसल लिये जाने से कई ग्रामों में जल संकट की स्थिति निर्मित हो जाती है तथा पीने के पानी के लिये जुझना पड़ता है। रबी में धान की फसल लेने से न केवल जल स्तर प्रभावित होता है, बल्कि बिजली की खपत भी अधिक होती है। पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है व भूमि की उपजाऊ क्षमता में कमी आती है। एसडीएम विशाल महाराणा ने कहा कि शासन की मंशा अनुरूप ग्रीश्मकालीन धान के रकबे को कम कर कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को कृशकों को अपनाना चाहिए। क्षेत्र में इस बार रबी क्षेत्र विस्तार हेतु तिवड़ा, चना, सरसों, कुसुम का बीज कृशकों को अनुदान में वितरित किया जा रहा है। ग्रीश्मकालीन धान के बदले कृशकों का रूझान मक्का फसल में बढ़ रहा है, भविश्य में इस हेतु मक्का प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की योजना है। इस स्थिति को देखते हुए सभी कृशकों से अपील की जाती है ग्रीश्मकालीन धान की बुवाई न करें। धान के स्थान पर मूंग, उड़द, चना, मक्का, सूरजमुखी, गन्ना, सब्जियों, जैसी फसलें अपनाएं, ये कम पानी में भी सफलतापूर्वक ली जा सकती हैं और आर्थिक दृश्टि से लाभकारी है। श्री महाराणा ने कहा कि जल संरक्षण हेतु माइक्रो-इरीगेशन, मल्चिंग और फसल चक्र अपनाने पर विशेश ध्यान दें। ग्रामीण जल स्त्रोतों (कुए, तालाब, नाला बंधान, नाला विस्तार) के संरक्षण में सामूहिक भागीदारी निभाएं।
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