पत्रकारों पर हमले के बाद गरियाबंद में गरमाया माहौल — प्रशासन को मिला अल्टीमेटम, 7 दिन में कार्यवाही नहीं हुई तो चक्काजाम तय

 

“जब कलम पर हमला होता है, तो लोकतंत्र कांपता है” — गरियाबंद में पत्रकारों का गरजता विरोध

गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के पितईबंद रेत खदान में पत्रकारों के साथ हुई बर्बर मारपीट की घटना ने पूरे छत्तीसगढ़ को झकझोर दिया है। घटना के बाद पत्रकारों का आक्रोश फूट पड़ा और जिलेभर से सैकड़ों पत्रकारों ने एकजुट होकर जिला कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया। सैकड़ों की संख्या में पत्रकारों का जमावड़ा सिर्फ आक्रोश नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था — अब खामोश नहीं रहेंगे।

धरना स्थल पर पत्रकारों ने कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग की। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि यदि सात दिवस के भीतर ठोस कार्यवाही नहीं हुई, तो पूरे जिले में उग्र आंदोलन और चक्काजाम किया जाएगा।

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घटना की पृष्ठभूमि: पत्रकारिता के मैदान में लाठी-डंडों से स्वागत

9 जून 2025 को गरियाबंद के पितईबंद इलाके में स्थित एक रेत खदान पर कुछ पत्रकार रिपोर्टिंग करने गए थे। उन्हें सूचना मिली थी कि वहां बड़े पैमाने पर अवैध रेत उत्खनन हो रहा है। लेकिन जैसे ही वे मौके पर पहुँचे, वहां मौजूद खनन माफियाओं ने पत्रकारों पर जानलेवा हमला कर दिया।

पत्रकारों के कैमरे छीन लिए गए, मोबाइल तोड़ दिए गए, और उन्हें रेत खदान की दौड़ाया गया जान से मारने की कोशिश किया गया ये हमला केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार था।

कलेक्टर से मिला आश्वासन, पर शर्त के साथ आंदोलन समाप्त

प्रदर्शनकारियों की मांगों को लेकर पत्रकार प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर से मुलाकात की। कलेक्टर ने आश्वस्त किया कि:

“मामले को गंभीरता से लिया गया है। दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही होगी। सात दिनों के भीतर जांच पूरी कर आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाएगी।”

कलेक्टर के इस आश्वासन के बाद पत्रकारों ने आंदोलन को स्थगित तो कर दिया, लेकिन साथ में एक कड़ा अल्टीमेटम भी दे डाला — “यदि तय समय-सीमा में कार्यवाही नहीं होती, तो जिले में चक्काजाम होगा और आंदोलन और तीव्र रूप लेगा।”

सिर्फ हमले का नहीं, व्यवस्था का भी विरोध

ज्ञापन में सिर्फ हमले के दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग ही नहीं की गई, बल्कि पूरे जिले में चल रहे अवैध रेत खनन पर रोक लगाने की मांग भी जोरशोर से उठाई गई।

पत्रकारों का कहना है कि:

“अगर खनिज विभाग की मिलीभगत न होती, तो ये खनन संभव ही नहीं था। खनिज अधिकारी को तत्काल हटाया जाना चाहिए और पूरी विभागीय जांच होनी चाहिए।”

प्रदेश स्तर पर समर्थन: पत्रकार महासंघ छत्तीसगढ़ हुआ सक्रिय

पत्रकार महासंघ छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष सुनील यादव ने गरियाबंद के पत्रकारों के इस आंदोलन को समर्थन देते हुए कहा कि:

“यह हमला केवल गरियाबंद के पत्रकारों पर नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा पर है। अगर 7 दिनों में कार्यवाही नहीं हुई, तो हम राज्यभर में आंदोलन की चिंगारी फैलाएंगे।”

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पुलिस अधीक्षक ने क्या कहा?

पुलिस अधीक्षक निखिल राखेचा ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि:

“हमने कुछ संदिग्ध वाहनों और खदान संचालकों पर तत्काल कार्यवाही की है। आरोपियों की पहचान की जा चुकी है और जांच के आधार पर गिरफ्तारियां जल्द की जाएंगी।”

हालांकि, पत्रकारों की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि सख्ती नहीं बरती गई, तो यह मामला भी अन्य घटनाओं की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

धरना स्थल बना मीडिया की एकजुटता का मंच

धरना स्थल पर जुटे पत्रकार सिर्फ स्थानीय नहीं थे। राजिम, देवभोग, मैनपुर, छुरा, फिंगेश्वर और रायपुर से भी पत्रकार साथी पहुंचे। कई युवा पत्रकारों ने खुले मंच पर कहा:

“हम डरे नहीं हैं। हम टूटेंगे नहीं। और अब रुकेंगे भी नहीं। ये सिर्फ विरोध नहीं, बदलाव की शुरुआत है।”

क्या सच में कार्रवाई होगी या फिर…?

अब निगाहें जिला प्रशासन की कार्यवाही पर टिकी हैं। यदि 7 दिन की समयसीमा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह मान लेना चाहिए कि लोकतंत्र में पत्रकारिता अब माफिया और मिलीभगत के बीच घुट रही है।

गरियाबंद की रेत से उठी है आवाज, क्या रायपुर तक पहुंचेगी?

यह सवाल सिर्फ गरियाबंद का नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ और भारत के लोकतांत्रिक चरित्र का है। क्या प्रशासन और सरकार इस चेतावनी को समझेगी?

या फिर पत्रकारों को अगली बार रेत में दबे सच के साथ अपने जख्म भी खुद ही ढंकने होंगे?

अब निर्णय प्रशासन के हाथ में है — और कलमें इंतजार में।


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