स्कूल जतन योजना का उल्टा जतन, टेवारी प्राथमिक शाला में व्यवस्था पर तमाचा
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। राज्य शासन शिक्षा सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कई जगह इन दावों को आईना दिखा रही है। जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर ग्राम टेवारी के प्राथमिक शाला का हाल देखकर यही लगता है कि यहां योजनाएं बच्चों के लिए नहीं, बल्कि सिस्टम की सुविधा के लिए चल रही हैं। यहां बच्चे जर्जर कमरे में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, जबकि लाखों रुपये मोटरसाइकल और सायकल खड़ी करने के लिए टीन शेड बनाने में खर्च कर दिए गए।

जर्जर कमरा, हर दिन हादसे का खतरा
प्राथमिक शाला के एक कक्ष की हालत बेहद खराब है। कमरे का छज्जा टूटने की स्थिति में है, छत से सरिया बाहर निकल चुका है और बरसात के दिनों में लगभग चार महीने तक पानी टपकता रहता है। कमरे की छत पर सीपेज फैला हुआ है। स्थिति इतनी गंभीर है कि शिक्षक बच्चों को उस कमरे में बैठाने से डरते हैं। कई बार बच्चों को बरामदे, खुले स्थान या अन्य कक्षों में ठूंस-ठूंसकर बैठाकर पढ़ाया जाता है। इसके बावजूद मजबूरी में कुछ बच्चों को उसी जर्जर कमरे में बिठाया जाता है, जहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।
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शिक्षकों ने लगाई गुहार, फिर भी नहीं सुधरी हालत
स्कूल स्टाफ ने कई बार उच्च अधिकारियों को इस गंभीर स्थिति से अवगत कराया। लिखित आवेदन देकर कमरे के जीर्णोद्धार और मरम्मत के लिए राशि की मांग की गई। स्कूल जतन योजना के तहत मरम्मत के लिए राशि स्वीकृत भी हुई। शिक्षकों को उम्मीद जगी कि अब बच्चों को सुरक्षित कक्षा कक्ष मिलेगा। लेकिन आगे जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।

8.49 लाख बच्चों पर नहीं, वाहनों पर खर्च
मरम्मत के लिए स्वीकृत 8 लाख 49 हजार रुपये बच्चों के बैठने वाले जर्जर कमरे पर खर्च नहीं किए गए। न छत सुधरी, न दीवारें बनीं, न फर्श ठीक हुआ। इसके बजाय स्कूल परिसर में मोटरसाइकल और सायकल स्टैंड का निर्माण करा दिया गया। टीन शेड लगाकर दोपहिया वाहनों को सुरक्षित करने की व्यवस्था कर दी गई, जबकि बच्चे आज भी असुरक्षित भवन में पढ़ने को मजबूर हैं। इससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या बच्चों की जान से ज्यादा जरूरी मोटरसाइकल और सायकल हो गए हैं?
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ग्रामीणों में आक्रोश, आंदोलन की चेतावनी
इस पूरे मामले को लेकर ग्रामीणों और पालकों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार बच्चों के भविष्य की बात करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकारी अपने स्वार्थ और सुविधा के अनुसार योजनाओं का उपयोग कर रहे हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए और तत्काल जर्जर कमरे की मरम्मत कराई जाए। चेतावनी दी गई है कि यदि जल्द सुधार नहीं हुआ तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
स्टाफ भी असहज, डर के साये में पढ़ाई
स्कूल के शिक्षक और कर्मचारी भी इस स्थिति से बेहद परेशान हैं। उनका कहना है कि वे हर दिन डर के साये में स्कूल चलाते हैं। बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं पर आती है, लेकिन संसाधनों के अभाव में वे खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। यदि कोई हादसा हो गया तो इसका जवाबदेह कौन होगा?
मामले की जांच चल रही है — सहायक आयुक्त
इस संबंध में तत्कालीन सहायक आयुक्त लोकेश चौहान से पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ऐसे कई मामलों की शिकायतें मिली हैं, जिनकी जांच कराई जा रही है। हालांकि जांच की बात कहकर जिम्मेदारी टाल दी गई, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो कमरे की मरम्मत शुरू हुई है और न ही बच्चों के लिए कोई वैकल्पिक सुरक्षित व्यवस्था की गई है।
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टेवारी का सवाल पूरे सिस्टम से
ग्राम टेवारी का यह मामला केवल एक स्कूल की बदहाली नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सीधा सवाल है। जब बच्चे टपकती छत के नीचे बैठें और लाखों रुपये मोटरसाइकल स्टैंड पर खर्च हों, तो यह साफ हो जाता है कि योजनाओं का उद्देश्य कहीं रास्ते में ही बदल दिया गया है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस खबर के बाद भी केवल जांच तक सीमित रहता है या वास्तव में जिम्मेदारों पर कार्रवाई कर बच्चों को उनका हक दिलाता है।

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