एक ही घर की दो बेटियां… पहले सावित्री बनी मिसाल, अब लक्ष्मी लिख रही सफलता की नई कहानी
छुरा (गंगा प्रकाश)। गरियाबंद जिले के छुरा विकासखंड मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत सेमहरा के आश्रित ग्राम छत्तरपुर से एक बार फिर संघर्ष और सफलता की ऐसी कहानी सामने आई है, जो यह बताती है कि अभाव यदि इरादों से टकराएं तो हार जाते हैं। एक दिन पहले इसी परिवार की बड़ी बेटी सावित्री कमार की संघर्षगाथा चर्चा में थी। अब उसी घर की छोटी बेटी लक्ष्मी कमार अपनी मेहनत और शिक्षा के दम पर नई पहचान बना रही है।
विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज से आने वाली लक्ष्मी कमार के पिता स्वर्गीय धरम सिंह का निधन वर्षों पहले हो चुका है। पिता के जाने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट गहरा गया, लेकिन उनकी मां ने हार नहीं मानी। मजदूरी कर अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई जारी रखी और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का सपना संजोए रखा।
लक्ष्मी ने एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय छुरा से 12वीं बोर्ड परीक्षा में 87 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं। बेहतर भविष्य की दिशा में कदम बढ़ाते हुए उन्होंने नेशनल कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (NCET) की परीक्षा भी दी है। उनका लक्ष्य शिक्षक बनकर अपने समाज के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है।
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लक्ष्मी की बड़ी बहन सावित्री कमार वर्तमान में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में सेवाएं दे रही हैं और नौकरी के साथ अपनी उच्च शिक्षा भी जारी रखे हुए हैं। अब छोटी बहन लक्ष्मी भी उसी राह पर आगे बढ़ते हुए परिवार के संघर्ष को सफलता में बदलने की कोशिश कर रही हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि एक ही घर की दो बेटियों का शिक्षा के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ना पूरे कमार समाज के लिए प्रेरणा है। जिस समाज की बेटियां कभी संसाधनों के अभाव में पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती थीं, वहीं आज यह परिवार नई सोच और नए आत्मविश्वास की मिसाल बन गया है।
संघर्ष की यह कहानी पूछ रही बड़ा सवाल
शासन-प्रशासन विशेष पिछड़ी जनजातियों के उत्थान के लिए अनेक योजनाओं का दावा करता है लेकिन छत्तरपुर की इन बेटियों की सफलता यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या ऐसी मेधावी छात्राओं को प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा और करियर निर्माण के लिए पर्याप्त सहयोग मिल रहा है? यदि समय पर मार्गदर्शन और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो कमार समाज की अनेक बेटियां भी प्रदेश और देश में अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।
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आज लक्ष्मी कमार की कहानी सिर्फ 87 प्रतिशत अंक हासिल करने की नहीं है, बल्कि उस मां के संघर्ष, उस परिवार के आत्मविश्वास और उस सपने की कहानी है, जिसने गरीबी को अपनी मंजिल के बीच कभी नहीं आने दिया। छत्तरपुर की यह बेटी अब अपने हौसलों से बता रही है कि संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही प्रेरणादायक होगी।
